शरणार्थी कैंपों से क़ाबुल तक: अफ़गान क्रिकेट की कहानी

  • 4 फरवरी 2014
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पिछले अक्टूबर में अफ़ग़ानिस्तान के शहरों की गलियों में लोग एक खेल में जीत खुशियाँ मनाते बाहर निकले थे. यह जीत पिछले सितंबर की तरह फुटबॉल में नहीं थी,बल्कि क्रिकेट में थी.

इस वक्त अफ़ग़ानिस्तान ने पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई किया था. अब अफ़ग़ानिस्तान 2015 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में होने वाले क्रिकेट वर्ल्ड कप में शामिल होगा.

यह अफ़ग़ानिस्तान जैसे देश के लिए छोटी बात नहीं है जहाँ के लोग अभी भी दशकों से चले आ रहे युद्ध से जूझ रहे हैं. तो फिर सवाल यह उठता है कि इस सब के बीच अफ़ग़ानिस्तान खेलों में अपना स्थान बनाने में कैसे क़ामयाब हुआ?

'शरणार्थी कैंप'

इसका जवाब अफ़ग़ानिस्तान के आधुनिक इतिहास में है. 1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में रूस के साथ चल रही लड़ाई से बचने के लिए बहुत से अफ़ग़ानियों ने पाकिस्तान में शरण ली थी. यहीं के शरणार्थी कैंपों में अफ़ग़ानिस्तान में खेलों के कामयाब बनने का जवाब है.

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अफ़ग़ानिस्तान की क्रिकेट टीम के बल्लेबाज़ों में से एक क़रीम सादिक का बचपन पकिस्तान के शरणार्थी कैंप, काचा कारा में गुज़रा था और यहीं से इन्हें क्रिकेट का 'कीड़ा' लगा.

वह रात में माचिस बनाने की एक फैक्ट्री में काम करते थे और दिन में क्रिकेट खेलते थे. इन कैंपों में रहने वाले युवाओं के बीच इस नए खेल के लिए ऐसा ही उत्साह था.

अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट के पिता कहे जाने वाले ताज मलूक को 1990 के दशक में ऐसे ही जूनून की तलाश रहती थी. उन्होंने ही अफ़ग़ानिस्तान की अपनी क्रिकेट टीम बनाने का सपना देखा था.

ताज मलूक याद करते हुए बताते हैं, "काचा कारा के कैंप में मैंने अपने तीन भाइयों के साथ मिलकर अफ़गानी क्रिकेट टीम बनाई थी. हम लोग क्रिकेट के पीछे पागल थे. हम हर अंतर्राष्ट्रीय पर नज़र रखा करते थे."

वह बताते हैं, "जब मैंने अफ़ग़ानी क्रिकेट टीम बनाने के बारे में सोचा तो मैं क्रिकेट खेलने वाले हर उस अफ़ग़ानी खिलाड़ी के पास गया जिसे मैं जानता था. मैंने उन्हें क़ाबुल आने के लिए प्रोत्साहित किया. उनके पिता मेरे पास आए और मुझे ऐसा करने से मना किया. उनका कहना था कि क्रिकेट उनके बच्चों का समय खराब करता है."

'कमाने का दबाव'

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बल्लेबाज़ क़रीम सादिक की भी यादें इससे मिलती हुई ही हैं.

वह बताते हैं, "हमारे पास खाने को पैसे नहीं थे. मुझ पर अपने परिवार कि तरफ से कमाने का दबाव था."

1995 में ताज मलूक के प्रयासों से अफ़ग़ान क्रिकेट फेडरेशन की स्थापना हुई.

इस दौरान देश में इस्लामी तालिबान का प्रभाव बढ़ने के बाद भी यह हुआ. तालिबान ने सार्वजनिक तौर पर खेल खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया था.

लेकिन जहाँ फुटबॉल खेलने के लिए पहने जाने वाले शॉर्ट्स पर तालिबान की टेढ़ी नज़र थी वहीं क्रिकेट के पहने जाने वाली पूरी पैंट की वजह से क्रिकेट को अधिक विरोध नहीं झेलना पड़ा.

इसके साथ ही पकिस्तान के कैंपों में समय गुज़ारने वाले कुछ तालिबान भी क्रिकेट को पसंद करते थे और कुछ मैंचों में मेरे सामने तालिबान अधिकारियों ने खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया.

'छवि बदल रही है'

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ताज मलूक बताते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट को कम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा. सरकार ने क्रिकेट को विदेशी खेल बताते हुए उसे पैसा देने से भी मना कर दिया."

अब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट टीम को संसाधन उपलब्ध करवा रही है और अब देश के अधिक से योग्य युवा अफ़ग़ानिस्तान में अपने कौशल को निखार रहे हैं.

पाकिस्तान की सीमा से अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट पश्तून बहुत इलाके के रास्ते से होता हुआ आया. अब अफ़ग़ानिस्तान में इस खेल की पहचान एक पश्तून खेल के तौर पर है. लेकिन अब अफ़ग़ानिस्तान में क्रिकेट की यह छवि भी बदल रही है. अब अलग-अलग समुदाय के लोग मिलकर एक राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में शामिल हो रहे हैं.

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