क्या इसराइल को मिलेगा यहूदी देश का दर्जा

  • 8 फरवरी 2014
इसराइली अरब इमेज कॉपीरइट Getty Images

ज़ाफ़ा के बंदरगाह पर अरब इसराइल के मछुआरे हरे रंग की जालों से मारी गई अंतिम मछलियों को आसपास के रेस्टोरेंट को देते हैं, क्योंकि वो पर्यटकों और स्थानीय लोगों को रात्रिभोज में सी-फूड परोसते हैं.

साल 1948 में इसराइल बनने तक यह एक प्रमुख अरब शहर था. साल 1950 में यह तेलावीव का हिस्सा बना और अब यह मुख्यरूप से यहूदियों का शहर है. ज़ाफ़ा की आबादी का क़रीब एक तिहाई मुसलमान और ईसाई हैं.

जाड़ों की गुनगुनी धूप में यहां के बहुत से निवासी या तो आराम कर रहे हैं काम कर रहे हैं और स्वाभिक रूप से इसराइल-फ़लस्तीन शांति वार्ता पर चर्चा कर रहे हैं.

यहूदी देश

हालांकि जब वेइसराइली प्रधानमंत्री के देश को यहूदी देश के रूप में मान्यता देने की मांग पर ज़ोर देते हैं, वहाँ एक स्पष्ट विभाजन दिखता है.

एक यहूदी ज़ैनी कहते हैं,'' मुझे लगता है कि बीबी (बेन्यामिन नेतन्याहू) से यह पूरी तरह इसलिए पूछा जाना चाहिए, क्योंकि महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यह एक धार्मिक लड़ाई है, यह ज़मीन के लिए नहीं है.''

वो कहते हैं, '' इस देश में रहने के अधिकार के साथ कट्टर मुसलमान यहूदियों को इंसान समझ पाने में सक्षम नहीं है. पश्चिमी दुनिया को लगता है कि इस बिंदु को समझना अच्छा रहेगा. लेकिन आप यह नहीं कर सकते हैं.''

पास के टेबल पर मौज़ूद मोहम्मद नेतन्याहू के दृष्टिकोण से पूरी तरह असहमत हैं. उन्हें लगता है कि इसका उन पर और इसराइल के अन्य अरब अल्पसंख्यकों पर इसका प्रभाव पड़ेगा.

वो कहते हैं, ''हर हफ़्ते हम ऐसी नई रिपोर्ट सुनते हैं कि यह एक यहूदी राष्ट्र है और अरब लोगों को वापस भेज दिया जाएगा, हम लोगों को निर्वासित कर दिया जाएगा. हम इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं. हम अपनी ज़ीमन पर वफ़ादार बनकर रह रहे हैं.''

वो कहते हैं, ''इसराइली प्रधानमंत्री फ़लस्तीनियों पर दबाव बनाने की एक रणनीति पर काम कर रहे हैं, क्योंकि वो इस ठप्पे को स्वीकार नहीं करेंगे. इस बीच उन्होंने यह कहकर कि वे शांति के लिए प्रयास कर रहे हैं, पश्चिमी देशों पर अच्छा प्रभाव जमा लिया है.''

अमरीका की उम्मीद

इमेज कॉपीरइट AFP

अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी से उम्मीद है कि जल्द ही वो दोनों पक्षों के साथ एक शांति समझौते की रूपरेखा के साथ सामने आएंगे.

अपुष्ट ख़बरों में कहा गया है कि इसमें जॉर्डन घाटी में विशेष सुरक्षा प्रबंधों के बीच पश्चिमी किनारे से चरणों में इसराइल की वापसी शामिल होगी.

हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि फ़लस्तीन से कुछ यहूदी बस्तियों को नहीं हटाया जाएगा और इसके बदले में उन्हें इसराइली इलाक़े का प्रस्ताव दिया जाएगा.

इस प्रस्ताव में पूर्वी यरुशलम में फ़लस्तीनी राज्य के लिए राजधानी बनाने की बात भी शामिल है. लेकिन फ़लस्तीनी शरणार्थियों को इसराइल लौटने का कोई अधिकार नहीं होगा. इस समझौते के लागू हो जाने के बाद फ़लस्तीन इसराइल को यहूदियों के देश के रूप में मान्यता देगा.

तेलावीव में पिछले हफ़्ते आयोजित एक इसराइली रक्षा सम्मेलन ने इसराइल और फ़लस्तीन के नेताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का एक और अवसर दिया था.

शांति वार्ता

नेतन्याहू ने यहूदी देश की मान्यता की बात को वास्तविक शांति के प्राथमिक घटक के रूप में पेश किया था.

उन्होंने कहा, ''यह विवाद की जड़ में था, इसे ज़ाफ़ा में साल 1921 में हुए दंगों में भी देखा जा सकता है, उसम समय उनके दादा जी पोलैंड से आए थे.''

वो कहते हैं, ''वहाँ कोई नई आबादी नहीं थी, जैसा की आज बताया जा रहा है. वहाँ कोई क्षेत्र (पश्चिमी किनारा और गज़ा) नहीं था.वहाँ केवल यहूदियों की मौज़ूदगी को लेकर ही विवाद था, जो कि बढ़ता गया.''

इस तरह इसराइली प्रधानमंत्री ने यहूदी लोगों की इस ज़मीन से जुड़ाव की जानकारी दी.

वो कहते हैं, ''हम यहां 3,800 से 4,000 साल से रहते आए हैं. यह वह ज़मीन है, जहाँ हमारी पहचान को प्रभावित किया गया. यह हमारी जन्मभूमि है. यहाँ हमारे देश का पुनर्जन्म हुआ था. फ़लस्तीनियों को इसे स्वीकार करना चाहिए.''

विवाद का अंत

इमेज कॉपीरइट Getty Images

वह कहते हैं इस स्वीकृत के बाद इस विवाद का अंत होगा. इससे फ़लस्तीनी शरणार्थियों की वापसी का अधिकार और क्षेत्र पर दावा निष्प्रभावी हो जाएगा.

यह ध्यान देने योग्य बात है कि ठीक इस समय राष्ट्रीय रणनीतिक अध्ययन केंद्र (आईएलएसएस) में दिखाए गए फ़लस्तीनी राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास के एक साक्षात्कार में इस तरह के यहूदी या इसराइली देश को मान्यता देने की बात नहीं थी.

हालांकि अब्बास ने शांति के फ़ायदों पर चिंता जताई. उन्होंने कहा, '' एक समाधान 57 अरब और मुस्लिम देशों में इसराइल की मान्यता देगा. यह एक पूर्ण मान्यता होगी, जो कि राजनयिक समझौते लेकर आएगी.''

फ़लस्तीनी ख़ुद फ़लीस्तीनी लिबरेशन ऑर्गेनाइजेश (पीएलओ) का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसराइल भी इसे दो दशक से भी अधिक समय से मान्यता दे रहा है.

इस समझौतो को लागू करने में सबसे बड़ी चिंता 1948 और 1967 में हुए अरब-इसराइली युद्ध के बाद इसराइल में शरणार्थियों के रूप में रह रहे फ़लस्तीनियों को लेकर है, जो कि वहाँ की आबादी के क़रीब 20 फ़ीसदी हैं.

इसराइली चाल

फ़लस्तीनी अधिकारियों का कहना है कि यहूदी राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की मांग हाल के सालों और महीनों में बढ़ी है, यह शांति समझौते को और कठिन बनाने की इसराइलियों की चाल है.

अभी हाल में रामल्ला में विदेशी पत्रकारों से पूर्व वार्ताकार नाबिल साथ ने शिकायत की थी कि कैरी इस मुद्दे को और कठिन बना रहे हैं, इसमें पहले हुई बातचीत या कोई भी हस्ताक्षरित समझौता इसराइल-फ़लस्तीन के बीच हुआ कोई समझौता शामिल नहीं है.

वो ज़ोर देते हुए कहते हैं कि मिस्र और ज़र्डन जब शांति समझौते पर दस्तख़त करेंगे तो वो इसराइल को एक यहूदी देश की मान्यता नहीं देंगे.

वो पूछते हैं, '' क्या आपको लगता है कि कोई फ़लस्तीनी नेता कभी इस समझौते को सही मन से स्वीकार करेगा या क्या यह फ़लस्तीनी नेताओं के इसराइल के साथ कोई शांति समझौते करने को असंभव बनाने का प्रयास है ? ''

वो कहते हैं कि यह दोष लगाने के खेल का नया हथियार है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार