अमरीका में 'शाहिद अफ़रीदी डे' मनाने का एलान

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Image caption मोदी ने किया तीसरे मोर्चे का विरोध

पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में जहां तालिबान से सरकार की बातचीत का मुद्दा छाया हुआ है, वहीं भारतीय उर्दू मीडिया में आम चुनाव के मद्देनज़र राजनीतिक सरगर्मियां सुर्खियों में हैं.

कथित इशरत जहां फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह को क्लीन चिट मिलने पर ‘हमारा समाज’ ने सवाल उठाया है कि सीबीआई ने इस मामले में मुक़दमा दर्ज करने में इतनी जल्दबाज़ी क्यों दिखाई और यहां तक कि क़ानून मंत्रालय तक की इजाज़त नहीं ली.

अब अमित शाह को क्लीन चिट दे गई है जो सोहराबुद्दीन मामले में भी अभियुक्त हैं. अख़बार कहता है कि क्लीन चिट इस समय दिया जाना अहम है क्योंकि हर सरगर्मी को प्रशासन हो या राजनेता, सभी चुनावों की ऐनक से देखते हैं.

कांग्रेस बीजेपी का फ़र्क़

‘हिंदुस्तान एक्सप्रेस’ ने सांप्रदायिक दंगा विरोधी बिल ठंडे बस्ते में चले जाने पर लिखा है कि वैसे तो केंद्र सरकार ने इस बिल को संसद में पेश कर चुनावी फ़ायदा हासिल करने की कोशिश की लेकिन एकजुट विपक्ष ने उसे कामयाब नहीं होने दिया.

इसे सरकार की हार बताते हुए अख़बार कहता है कि ये ज़िम्मेदारी तो सरकार और विपक्ष दोनों की है कि सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए प्रभावी क़दम उठाए जाएं, लेकिन राज्य सरकारों के काम में हस्तक्षेप का बहाना बना कर इसे कामयाब नहीं होने दिया गया.

दैनिक ‘सहाफ़त’ का संपादकीय है नरेंद्र मोदी और तीसरा मोर्चा. मोदी ने अपनी कोलकाता की रैली में लोगों से तीसरे मोर्चे में शामिल पार्टियों को ख़ारिज करने के लिए कहा था.

अख़बार के अनुसार मोदी के बयान का ये भी मतलब निकलता है कि सियासत के लिए दो ही मोर्चे काफ़ी हैं. एक कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए और दूसरा बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए जबकि अख़बार के मुताबिक़ लोग ख़ूब जानते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है.

कश्मीर मुद्दा

रुख़ पाकिस्तानी अख़बारों का करें तो ‘जंग’ ने पाकिस्तान में हर साल मनाए जाने वाले कश्मीर एकजुटता दिवस पर संपादकीय लिखा है- कब हल होगी कश्मीर समस्या.

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Image caption कश्मीर में भारत के लाखों सैनिक तैनात हैं

अख़बार ने इस मौक़े पर दिए गए प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के भाषण का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि क़ायदे आज़म चाहते थे कि भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते अमरीका-कनाडा जैसे हों जबकि गांधी जी ने भी पाकिस्तान को हिस्सा देने की आवाज़ उठाई थी, लेकिन कश्मीर समस्या हल न होने के कारण ऐसी उलझनें पैदा हुईं जिनमें दोनों देश आज तक फंसे हुए हैं.

अख़बार ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के मुताबिक़ कश्मीरियों को जनमत संग्रह के ज़रिए अपने भविष्य का फ़ैसला करने का मौक़ा न देने के लिए भारत की आलोचना की है.

ड्रोन और अमरीकी मजबूरी

‘नवाए वक़्त’ ने सरकार और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच शुरू हुई बातचीत के मद्देनज़र अमरीका की तरफ़ से दिए गए इन संकेतों को सकारात्मक बताया है कि वो ड्रोन हमलों को सीमित करेगा.

अख़बार कहता है कि ड्रोन हमलों को रोकने के लिए पाकिस्तान न जाने कब से कह रहा है, अब अगर अमरीका ऐसा करने का संकेत दे रहा है तो वो पाकिस्तान के आग्रह पर नहीं बल्कि अपनी ज़रूरतों के हिसाब से ऐसा कर रहा.

अख़बार लिखता है कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले सप्ताह अपने 'स्टेट ऑफ़ यूनियन' भाषण के दौरान कहा कि ड्रोन हमलों के चलते अमरीका का विरोध बढ़ रहा है और यह स्थिति अमरीका की सुरक्षा के लिए हानिकारक हो सकता है इसलिए ड्रोन हमले सीमित करने का फ़ैसला किया गया है.

वहीं ‘क़ौमी ख़बर’ ने हेडलाइन लगाई- तालिबान से बातचीत और अमरीका परेशान. अख़बार के मुताबिक़ बातचीत का सिलसिला शुरू होते ही अमरीकी राजनयिकों ने पाकिस्तानी राजनेताओं और सांसदों से ख़ुफ़िया मुलाक़ातें करनी शुरू कर दी हैं.

उधर ‘औसाफ़’ की ख़बर है कि तालिबान से सरकार की बातचीत के मद्देनज़र पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने सैन्य कमांडरों की बैठक बुलाई जिसमें इस बातचीत से जुड़े सभी पहुलओं पर ग़ौर किया जाएगा.

‘आजकल’ ने अपने कार्टून में बातचीत को एक गाड़ी के तौर पर पेश किया है जिसे तालिबान और सरकार के प्रतिनिधि धक्का मार कर आगे ले जाने में जुटे हैं.

‘शाहिद अफ़रीदी डे’

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Image caption इन दिनों अफ़रीदी अमरीकी दौरे पर हैं

दैनिक ‘एक्सप्रेस’ में एक दिलचस्प ख़बर है- अमरीकी राज्य टेक्सस में पोर्ट आर्थर शहर की मेयर पाकिस्तान के हरफ़नमौला क्रिकेटर शाहिद अफ़रीदी से इतनी प्रभावित हैं कि उन्होंने अपने शहर में हर साल पांच फ़रवरी को ‘शाहिद अफ़रीदी डे’ मनाने का एलान किया.

यही नहीं, मेयर डेलोरिस बॉबी प्रिंस ने एक कार्यक्रम में शहर की सांकेतिक चाबियां भी शाहिद अफ़रीदी को सौंप दीं. अख़बार के मुताबिक़ अपनी आक्रामक बल्लेबाज़ी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर शाहिद अफ़रीदी पर पाकिस्तान में एक फ़िल्म भी बन चुकी है.

‘अम्मी घर चलो, घर सूना सूना है’, जी हां, कुछ ऐसा ही गाना भरी अदालत में गा कर एक छह साल के बच्चे ने अपने मां बाप में सुलह करा दी.

दैनिक ‘वक़्त’ की ख़बर के मुताबिक़ मामला लाहौर का है जहां मियां बीवी तलाक़ की ख़्वाहिश लिए अदालत में पहुंचे तो मां को देख बच्चा उसकी तरफ़ लपका और रोते हुए गाने वाले अंदाज़ में बताने लगा कि घर कितना सूना है.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़ मां ने भी बच्चे को गले से लगाया और फिर बाप भी उनकी तरफ़ दौड़ा. और फिर गिले शिकवे सब दूर हुए, और एक घर उजड़ने से बच गया.

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