कितनी कारगर होती हैं ऑफ़िस की मीटिंग

  • 12 फरवरी 2014
20वीं सदी के ऑफिस का एक दृश्य

यह तस्वीर नीदरलैंड्स में 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों के दौरान ली गई थी और इसमें एक ऑफ़िस में तीन लोग चुस्त-दुरुस्त पोशाक में काम करते हुए दिखाई दे रहे हैं.

इसमें से सबसे बाएं बैठे व्यक्ति मेरी पत्नी के दादा हैं. उनके पिता जी की देखरेख में कारोबार चलता था. उनकी एक सफल टेक्सटाइल कंपनी थी, जिसमें क़रीब 1,000 लोग काम करते थे.

'जॉनसन एंड टिलाउंस' नाम की ये कंपनी एक मशहूर ब्रांड के अंडरवियर बनाती थी और कंपनी अपने पायजामों के लिए एक जाना-पहचाना नाम था.

कंपनी का संचालन इसी कमरे से किया जाता था. फ़टाफ़ट निर्णय लिए जाते थे. विचार-विमर्श थोड़ा सा ही होता था.

तीनों निदेशक मुश्किल से ही कभी एक दूसरे से निगाह मिलाते थे और ज्यादातर काम नोट्स के लेनदेन के ज़रिए ही हो जाता था. पारिवारिक फ़र्मों के कामकाज का तरीक़ा ऐसा ही था.

दूसरी ओर 19वीं सदी में लंदन के बैंक नए प्रयोग कर रहे थे. ये बैंक साझेदारी पर आधारित थे और पार्टनर पार्लर में बैठकर लंबी चर्चाएं करते थे. सभी एक दूसरे को देख सकते थे.

प्रत्येक सुबह फ़र्म के पत्रों को उनके पार्टनर के सामने खोला जाता था. इस फ़र्मों के कामकाज में बहुत ज्यादा पारदर्शिता थी.

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घर जैसा माहौल

आज इंटरनेट युग में भी कई संगठन फ़ैसले करने के लिए इसी तरह की प्रक्रिया को अपनाने की कोशिश करते हैं, हालांकि लगता है कि उन्हें पता ही नहीं कि ऐसा करना कैसे है.

समस्या तब अधिक स्पष्ट हो जाती है जब आप कार्यस्थलों के बारे में विचार करते हैं.

18वीं सदी में कार्यलय वैसे ही होते थे, जैसा कि सबसे पहली तस्वीर में दिखाई दे रहा है. ये घरों का ही थोड़े बदले हुए रूप थे.

पहली बार 20वीं सदी में हेनरी फ़ोर्ड ने कामकाज का आधुनिक ढंग शुरू किया, जहां एक बड़ी छत के नीचे सैकड़ों लोग सैकड़ों डेस्क पर बैठकर काम करते थे.

20वीं सदी के अंत तक ज्यादातर कॉर्पोरेशन पीटर ड्रकर की "नॉलेज वर्कर" की अवधारणा को स्वीकार करने लगे. इन लोगों को अपने ज्ञान पर काम करने के लिए थोड़ी निजता की ज़रूरत थी.

निजता का सम्मान करते हुए कंपनियों ने कार्यस्थल को इकाइयों में बांटते हुए केबिन बनाए. हालांकि ज़ाहिर तौर पर निजता की अपनी सीमा थी.

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बदला नज़रिया

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इस बीच नेटवर्क कंप्यूटरों ने कार्यस्थलों पर एक नई क्रांति की शुरुआत कर दी. अब लॉगिंग का मतलब था कि प्रबंधक को ये पता चल गया है कि आप कहां हैं, और ईमेल ने छपे हुए मेमो और पत्रों को टाइप करने वाले सेक्रेटरी की ज़रूरत को ख़त्म कर दिया. बेहतर इंटरनेट कनेक्शन और मोबाइल जैसे उपकरणों की मदद से लोग घर से या किसी भी जगह से काम करने में सक्षम हो गए.

परंपरावादी कंपनियों को इस बदलाव से सबसे अधिक परेशानी हुई. उन्हें इस बात की चिंता थी कि वो अपने कर्मचारियों पर भरोसा कैसे करें!

उन्हें ये भी चिंता थी कि उनके कार्यस्थलों का क्या होगा. आख़िर 21वीं सदी की कंपनियों के कार्यस्थल कैसे होंगे?

इस सवाल पर काफ़ी विचार-विमर्श किया गया है. आख़िर इस तेज़ी से बदलते और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी कारोबारी माहौल में कोई कंपनी अपने कार्यस्थल को विविधतापूर्ण और इनोवेटिव कैसे बनाए रखेगी?

अगर लोगों को वाई-फ़ाई की मदद से अपनी मनपसंद जगह जैसे घर या कॉफ़ी शॉप से काम करने की इजाज़त दे दी जाए तो कार्यालयों के लिए नई व्यवस्थाएं और नए डिज़ाइन तैयार करने की ज़रूरत होगी.

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विचारों का महत्व

आजकल विचार-विमर्श के स्थान को लेकर एक ख़ास तरह की सनक देखने को मिल रही है. जैसे अचानक घटी किसी घटना पर चर्चा या फिर स्टैंड-अप बैठकों के स्थान पर रंग, रोशन और बैठने का इंतज़ाम ऐसा होना चाहिए कि लगे ये ऐसा कार्यस्थल है जहां विचारों का महत्व है.

मुझे नहीं लगता कि ये सही है.

ब्रेन स्टॉर्मिंग (दिमागी माथा-मच्ची) की तकनीक का विकास सबसे पहले न्यूयार्क में एलेक्स ओस्बॉर्न ने 1939 में की. एलेक्स विज्ञापन जगत से जुड़े हुए थे.

उन्होंने अपने निष्कर्षों को 1948 में एक किताब की शक्ल में प्रकाशित किया. ब्रेन स्टॉर्मिंग के बारे में 'हाउ टू आर्गनाइज़ ए स्क्वाड टू क्रिएट आइडियाज़' नामक अध्याय में चर्चा की गई.

उन्होंने कहा कि विचारों के सृजन पर ख़ासतौर से फ़ोकस करने के साथ ही आलोचनाओं को सहज रूप से स्वीकार करना चाहिए.

उन्होंने अचानक आए विचारों का स्वागत किया और कई प्रस्तावों पर एक साथ काम करने की बात कही, ताकि अधिक बेहतर विकल्प को अपनाया जा सके.

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रोचक अवधारणा

उनकी अवधारणा काफ़ी रोचक, मज़ेदार और फ़ायदेमंद दिखती है. इसलिए आश्चर्य नहीं कि कई संगठनों ने उनकी ब्रेन स्टॉर्मिंग की तकनीक को अपना लिया, जहां कर्मचारी अपने विचारों के साथ बड़े समूहों में एक साथ आते.

लेकिन कई अकादमिक अध्ययनों में इस प्रक्रिया को लेकर संदेह ज़ाहिर किया गया और इन आपत्तियों को समझना कठिन नहीं था. उदाहरण के लिए बड़े समूहों में कुछ वक्ताओं का ही प्रभुत्व होता है.

किसी समस्या के बारे में किए गए एकाकी चिंतन के दौरान बेहतर और अधिक तार्किक सृजनात्मक सोच देखने को मिलती है. समूह में काम करने से ख़ास तरह के रोमांच का माहौल बनता है और समूह को लगता है कि उसने काफ़ी उपलब्धियाँ हासिल कर ली हैं.

उसके बाद वो लोग अपने डेस्क पर लौट आते हैं और बहुत अधिक नतीजा नहीं निकलता है. संतुष्टि के लिए समूह चर्चा के दौरान मिले आदर-सत्कार को ही पर्याप्त मान लिया जाता है.

क्या हैं कमियां

1958 में येल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पाया गया कि समूह के बजाए अकेले की गई ब्रेन स्टॉर्मिंग अधिक कारगर होती है.

मुझे पक्का यक़ीन है कि कॉरपोरेट संगठनों ने ब्रेन स्टॉर्मिंग का मूल्यांकन वास्तविकता से अधिक किया क्योंकि कार्यस्थलों की चमक धूमिल हो रही थी, जबकि इन कार्यालयों में ही लोग अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा गुज़ार देते हैं.

ब्रेन स्टॉर्मिंग पढ़ने, लिखने और विश्लेषण का विकल्प नहीं है... और ये किसी समस्या के बारे में उचित तरीक़े से विचार करने की जगह नहीं ले सकता है.

चिंतन एक व्यक्तिगत और विचारशील प्रक्रिया है. विचारों के इस आदान-प्रदान के लिए ईमेल काफ़ी अच्छा ज़रिया हो सकता है. ट्विटर नहीं.

आख़िरकार इसी वजह से नीदरलैंड्स के मेरे संबंधी एक ही कार्यालय में होने के बावजूद एक दूसरे के लिए नोट लिखते थे.

चिंतन एक श्रमसाध्य काम है. ब्रेन सटॉर्मिंग के मुक़ाबले अधिक कठिन.

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