पाकिस्तान: 'हज़ारा शिया मुसलमान हैं निशाने पर'

हज़ारा शिया, पाकिस्तान

पाकिस्तान में हज़ारा शिया समुदाय के लोग चरमपंथियों के निशाने पर हैं.

जनवरी में बलूचिस्तान में हज़ारा शिया ज़ायरीन से भरी बस पर हुए एक हमले के बाद देश के प्रमुख शहरों में शिया और हज़ारा समुदाय के लोगों ने कई शहरों में विरोध किया.

ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले साल जनवरी और फ़रवरी में हमलों के बाद किया गया था. पिछले साल हुए इन दो हमलों में ही सौ से अधिक लोग मारे गए थे.

इस्लामाबाद में हुए एक ऐसे ही एक प्रदर्शन में हमारी मुलाकात फ़ातिमा आतिब से हुई. फ़ातिमा से इससे पहले भी हमारी एक मुलाकात साल भर पहले ऐसे ही एक प्रदर्शन के दौरान हुई थी.

बीबीसी ने फ़ातिमा से जानने की कोशिश की कि इस एक साल के दौरान क्या बदला है.

ख़ौफ़

फ़ातिमा बताती हैं कि धमाके में उनकी एक करीबी सदफ़ नाम की युवती भी मारी गई. वह कहती हैं कैंसर से सात-आठ साल तक जूझने के बाद सदफ़ ने उससे मुक्ति पाई थी और फिर हज करने गई थीं.

लेकिन वापस आईँ तो यहां मौत उनका इंतज़ार कर रही थी.

हज़ारा अल्पसंख्यक समुदाय है और पाकिस्तान की आबादी में इनका हिस्सा सिर्फ़ 0.25 फ़ीसदी है.

पिछले साल फ़ातिमा ने बीबीसी संवाददाता से बात करते हुए कहा था कि उनके समुदाय का हर-एक व्यक्ति चरमपंथियों के निशाने पर है.

चरमपंथी हमला

वह बताती हैं कि पिछले साल जनवरी में हुए चरमपंथी हमले में दो साल की एक एक बच्ची भी मारी गई थी.

फ़ातिमा कहती हैं, "मैंने फ़ेसबुक पर उस बच्ची की दोनों तस्वीरें देखीं- एक ज़िंदा और दूसरी कफ़न में लिपटी हुई. और उस वक्त दिमाग़ में ख़्याल आया कि अगर इसकी जगह मेरी बच्ची होती तो क्या होता. आप कल्पना नहीं कर सकते कि क्या हो रहा है और हम ज़ुल्म और अत्याचार की किस सीमा तक पहुंच गए हैं."

हज़ारा समुदाय में डर इस कदर समा गया है कि फ़ातिमा के दोनों भाइयों को देश से बाहर भेज दिया गया है और अब उनकी मां और 20 साल की बहन अकेले रह गए हैं.

फ़ातिमा यह बताने से इनकार कर देती हैं कि उनके भाई किस देश में गए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उन्हें वहां भी निशाना बनाया जा सकता है.

मानसिक यातना

इस बयान के एक साल बाद फ़ातिमा जब फिर एक दुख और गुस्से से भरे प्रदर्शन में मिलीं तो उन्होंने कहा कि कुछ नहीं बदला है सिर्फ़ कब्रों की संख्या बढ़ गई है.

उन्होंने कहा, "2013 हमारे लिए एक रक्तरंजित साल रहा है, जिसमें हमने सिर्फ़ लाशें समेटी हैं."

उन्होंने बताया, "पिछली ईद मैंने अपनी मां के घर क्वेटा में गुज़ारी है, उस ईद के नज़ारे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी. मैं तो क्या हमारे समुदाय का हर व्यक्ति उसी मानसिक यातना से गुज़र रहा है. उस दिन पूरे समुदाय का हर व्यक्ति अपने घर से निकलकर कब्रिस्तान पहुंचा हुआ था. घरों में सन्नाटा था और कब्रिस्तान आबाद थे."

मानवाधिकार

वह कहती हैं, "ये मानवाधिकार वाले बड़ी-बड़ी परिभाषाएं देते घूमते हैं कि ज़िंदा रहने के लिए फलां-फलां चीज़ें चाहिएं..."

"लेकिन हमें तो सिर्फ़ ज़िंदा रहने का हक़ भी नहीं मिल रहा. बाकी सारी चीज़ें तो दूर की बात हैं."

हज़ारा बिरादरी के अनुसार करीब एक दशक में उनके समुदाय के 1,500 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं.

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