युद्ध में बिछड़ीं, 29 साल बाद मिलीं मां-बेटी

होज़ाफ़िना फोरेस्ट और उनकी बेटी स्यामारा, एल साल्वाडोर

लातिनी अमरीकी देश एल साल्वाडोर में 1980 के दशक में गृह युद्ध के दौरान बिछड़ी एक मां-बेटी 29 साल बाद मिलीं.

1984 में एल साल्वाडोर में सैनिकों ने होज़ाफीना फोरेस्ट को अपनी तीन साल की बेटी स्यामारा को मौत की धमकी देकर छोड़ने पर मजबूर किया. होज़ेफ़ीना को लगा था कि अब वे कभी अपनी बेटी से नहीं मिल पाएंगी.

लेकिन एक संस्था की कोशिशों के चलते अब मां-बेटी 29 साल बाद एक-दूसरे से मिल पाई हैं. प्रोबूसकेडा नाम की ये संस्था एल साल्वाडोर में 12 साल तक चले गृह युद्ध के दौरान बिछड़े लोगों की तलाश करती है.

उस दिन को याद कर होज़ाफ़िना आज भी भावुक हो उठती हैं. वे बताती हैं, "जब सैनिक आए तो मेरे पति ने मुझे और हमारे तीन बच्चों को उस गढ्ढे में छुपा दिया जिसे उन्होंने पहले से खोदा था. मेरी ननद और कुछ बच्चे पहले ही उस गढ्ढे में मौजूद थे. शायद किसी बच्चे की रोने की आवाज़ से सैनिकों को हमारी मौजूदगी के बारे में पता चला होगा. और सैनिक हमें पकड़ कर सैन विसेंटे ले गए. वो एक सैन्य तख्तापलट था और उन लोगों ने हमें लगभग 15 दिन तक सैन विसेंटे में रखा. वे हमें लगातार धमकी दे रहे थे कि वे हमें मार डालेंगे."

ज़िंदगी दांव पर

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. होज़ाफ़िना आगे बताती हैं, "एक सैनिक ने मुझे अलग ले जाकर कहा कि मैं तुम्हारी बेटी को नहीं मारूंगा बल्कि उसे अपने साथ ले जाउंगा. क्योंकि हालात बहुत ही ख़तरनाक थे इसलिए मैं उस सैनिक की बात मान गई."

होज़ाफ़िना को डर था कि अगर उन्होंने स्यामारा को उस सैनिक को नहीं सौंपा तो उन्हें और उनके बाकी बच्चो को मार दिया जाएगा.

वे कहती हैं, "मैं वो हालात बयान नहीं कर सकती. मैं बहुत भावुक और दुखी हो गई थी और लगातार रोती रहती थी. वो बहुत मुश्किल लम्हा होता है जब आपकी बेटी को आपके हाथों से खींच कर कोई ले जाए."

वे आगे कहती हैं, "मुझे कुछ नहीं पता था कि वो स्यामारा को कहां ले जाएंगे. उसने मुझे सिर्फ़ ये बताया कि वो एक दंपति को जानता था जिसका कोई बच्चा नहीं है और वो मेरी बेटी को उन्हें देगा और वो दंपति उसकी देखभाल करेंगे. और मैं मान गई क्योंकि मेरे बाकी बच्चों को मारने की धमकी दी गई थी. मुझे उन धमकियों पर यक़ीन करना पड़ा क्योंकि उस वक्त किसी की भी ज़िदंगी का महफ़ूज़ नहीं थी. किसी को भी नही बख्शा जा रहा था.....न बच्चे, न औरतें और न ही गर्भवती महिलाएं."

लगभग पंद्रह दिन बाद होज़ाफ़िना को छोड़ दिया गया और वे अपनी बहन के पास रहने चली गईं. इस बीच उनके पति गुरिल्ला लड़ाकों के गुट में शामिल हो गए. लेकिन सेना ने उन्हें घात लगाकर मार दिया.

Image caption होज़ाफ़िना और उनकी बेटी स्यामारा एक संस्था प्रोबुसकेडा की बदौलत 29 साल बाद मिल सकीं.

बेटी की खोज

होज़ाफ़िना अपनी बेटी को भूली नहीं थीं और कुछ साल बाद उनके एक दोस्त ने उन्हें एक संस्था के बारे में बताया जो उन्हें बिछड़ी बेटी को ढूंढने में मदद कर सकती थी.

वे बताती हैं, "एक दोस्त ने मुझे प्रोबूसकेडा नाम की संस्था का पता दिया जो गृह युद्ध में बिछड़े परिवारों को मिलाने का काम करती है. 15 साल पहले मैंने प्रोबूसकेडा से संपर्क किया और उन्होंने स्यामारा को ढूंढना शुरु किया. सात साल पहले उन्होंने मेरा डीएनए टेस्ट किया और उसे स्यामारा के डीएनए से मिलाया जिससे ये साबित हो गया कि हम मां-बेटी हैं.

स्यामारा का नाम अब कैरोलिना है, उनकी शादी हो चुकी है और उनके अपने बच्चे हैं.

स्यामारा बताती हैं कि जिस दंपति को उन्हें सौंपा गया था, उन्होंने एक साल बाद दूसरे परिवार को उन्हें दे दिया.

वे कहती हैं, "मैं तीन साल की थी. उस व्यक्ति की पत्नी को बच्चा नहीं हो सकता था इसलिए उन्होंने मुझे रख लिया. लेकिन फिर अचानक वो गर्भवती हो गईं और तब उन्होंने कहा कि वो मुझे नहीं रखना चाहतीं. इसलिए एक साल बाद चार साल की उम्र में मुझे एक दूसरी जगह किसी और परिवार को सौंप दिया गया."

'लगता था अनाथ हूं'

अपने असली परिवार के बारे में स्यामारा को कुछ नहीं पता था. उन्हें यही बताया गया था कि उनका परिवार गृह युद्ध के दौरान मारा गया था. वे कहती हैं कि उनका बचपन ख़ुशहाल नहीं था.

स्यामारा ने बताया, "मैं वहां बिल्कुल भी ख़ुश नहीं थी क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि मैं उस परिवार का हिस्सा नहीं हूं. मुझे लगता था कि मैं अनाथ हूं. मैं शीशे में ख़ुद को देखती थी और फिर उन लोगों को देखकर ख़ुद से पूछती थी कि मेरी शक्ल किससे मिलती है. मेरी शक्ल उनमें से किसी से भी नहीं मिलती थी. मेरा बचपन ख़ुशहाल नहीं था."

Image caption स्यामारा (दाएं) अपनी मां और बाकी परिवार के साथ

लेकिन होज़ाफ़िना को यक़ीन था कि उनकी बिछड़ी हुई बेटी एल साल्वाडोर में ही होगी और उसे ढूंढ नहीं पाने का दुख उन्हें हमेशा रहता था. प्रोबूसकेडा संस्था ने उनसे कई सवाल पूछे और उन्होंने भी बेटी के बारे में जितनी मुमकिन हो, उन्हें जानकारी दी. जैसे कि स्यामारा के तलवे पर जलने का निशान था.

वे कहती हैं कि जिस दिन उन्हें स्यामारा के बारे में बताया गया उन्हें ऐसा लगा कि उनकी पीठ पर रखा बोझ हट गया है.

स्यामारा भी कहती हैं कि जब संस्था की एक महिला ने उन्हें बताया कि उनकी मां ज़िंदा हैं और उनके भाई-बहन भी हैं, तो वे बेहद ख़ुश हुईं.

भावुक लम्हा

वे कहती हैं, "नेशनल इंस्टिट्यूट नाम के शैक्षणिक संस्थान की निदेशक 2012 में मेरे शहर में आई थीं, उन्हें मेरी कहानी पता थी और उन्होंने ही प्रोबूसकेडा का ध्यान इस ओर खींचा. संस्था ने मेरा डीएनए टेस्ट किया और इस तरह मैं अपनी मां से मिली. मैं देख सकती थी कि मेरी शक्ल मेरी मां से मिलती हैं. सोचिए, कोई तीस साल तक ये सोचे कि आपका कोई परिवार नहीं है."

मां और बेटी जिन शहरों में रहती थीं वो ज़्यादा दूर नहीं थे, सिर्फ़ एक घंटा का ही रास्ता था. तय हुआ कि जिस शहर में होज़ाफ़िना काम करती हैं, उस शहर के संग्रहालय में मां और बेटी मिलेंगी.

होज़ाफ़िना बताती हैं, "हम दोंनो म्युज़ियम में मिले. वो एक बेहद ख़ूबसूरत लम्हा था.. ऐसा लगा कि मैं ज़मीन पर नहीं चल रही बल्कि हवा में उड़ रही हूं. मैं बता नहीं सकती कैसा महसूस हुआ था मुझे."

स्यामारा भी कहती हैं कि मिलन का वो लम्हा बेहद ख़ूबसूरत था. वे कहती हैं, "उन लोगों ने मेरी तस्वीर मेरी मां को दिखाई थी और जैसे ही मेरी मां ने मुझे देखा, वे चिल्लाईं.. वो रही मेरी बेटी.. हम गले मिले, एक दूसरे को चूमा और रोने लगे.

अब स्यामारा अपने परिवार के लगातार संपर्क में रहती हैं. वे कहती हैं कि वे बहुत ख़ुश हैं कि उनका एक परिवार है और वे हर 15 दिन में अपने परिवार से मिलती हैं.

(बीबीसी रेडियो के आउटलुक कार्यक्रम से)

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