एक मौत से गीत बना, गीत ने देश बदल दिया

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फ़रवरी 1952 में तत्कालीन पूर्व पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश की राजधानी ढाका में पुलिस की गोलीबारी में निहत्थे छात्रों की मौत हो गई थी. ये छात्र बंगाली भाषा आंदोलन का हिस्सा थे. इन्हीं में से एक प्रदर्शनकारी अब्दुल गफ़्फ़ार चौधरी थे जिनका लिखा गीत ''अमार भायेर रोक्ते रांगानो एकुशे फ़रवरी'' इस आंदोलन का एंथम या गान बन गया.

हर साल फ़रवरी के महीने में सारे देश में लोग इसे उस घटना की याद में गाते हैं जिसने उनके देश के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के कार्यक्रम विटनेस में क्लेयर बोस से बात करते अब्दुल गफ़्फ़ार चौधरी ने कहा, "इन पंक्तियों का मतलब है, 21 फ़रवरी मेरे भाईयों के ख़ून से सना है."

अब्दुल गफ़्फ़ार चौधरी ने जब यह गीत लिखा उस वक़्त वे महज़ 18 साल के थे. अपने सामने पुलिस की गोली का निशाना बने एक साथी प्रदर्शनकारी की मौत ने उन्हें पहली पंक्ति लिखने के लिए प्रेरित किया.

उर्दू आधिकारिक भाषा

21 फ़रवरी 1952 को अब्दुल गफ़्फ़ार समेत हज़ारों लोगों ने बंगाली को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाने के लिए जुलूस निकाला था.

अब्दुल बताते हैं, "21 फ़रवरी की दोपहर की बात है. हमें इस बात का शक तक नहीं था कि एक आज़ाद देश की पुलिस बिना चेतावनी दिए इस तरह गोली चला सकती है.''

इस आंदोलन की वजह ये थी कि साल 1948 में ब्रिटेन से आज़ादी मिलने के बाद पाकिस्तान के गवर्नर जेनरल ने ढाका में घोषणा की थी कि पूरे पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा उर्दू होगी.

अब्दुल कहते हैं, "असल में पाकिस्तान के किसी भी सूबे की भाषा उर्दू नहीं थी. पंजाब में पंजाबी, सिंध में सिंधी, नॉर्थवेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस में पश्तो और पूर्व पाकिस्तान में बंगाली भाषा बोली जाती थी. पाकिस्तान के 56 प्रतिशत लोग बंगाली थे, हम लोग बहुसंख्यक समुदाय थे. पूर्व पाकिस्तानी लोग उर्दू समझ तो सकते थे लेकिन बोल नहीं सकते. इसलिए एक डर था कि पाकिस्तान बंगाली भाषा दबाना चाहता था क्योंकि वो पूर्व पाकिस्तान को उपनिवेश बनाना चाहता था."

जिन लोगों ने बंगाली भाषा के लिए आंदोलन किया उन्हें देशद्रोही, कम्यूनिस्ट, भारत समर्थक और यहां तक कि इस्लाम के ख़िलाफ़ तक बताया गया.

अब्दुल बताते हैं कि पाकिस्तानी सरकार ने पूर्व पाकिस्तान के साहित्य, संस्कृति पर प्रतिबंध लगाने की बात कही. वे बताते हैं, "हमसे कहा गया कि रविंद्रनाथ टैगोर और नज़़रुल इस्लाम जैसे महान कवि, हमारा सारा साहित्य इस्लाम विरोधी है. इससे हमें बेहद चिढ़ हुई, ये ब्रिटिश राज से भी बुरा था."

विरोध प्रदर्शन

Image caption अब्दुल गफ़्फ़ार चौधरी आज (बाएं) और 1952 (दाएं) में. साथी प्रदर्शनकारी की मौत ने उन्हें गीत लिखने के लिए प्रेरित किया.

पूर्व पाकिस्तान में तनाव बढ़ रहा था और 1952 की शुरुआत में ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने राष्ट्रीय हड़ताल और संसद की ओर जुलूस का आह्वान किया.

अब्दुल गफ़्फ़ार के मुताबिक़, "जुलूस के रास्ते में एक पुलिस नाकाबंदी थी. हमें लगा कि पुलिस हमें रोकेगी. लेकिन अचानक सड़क के दोनों तरफ़ से पुलिस ने गोली चलानी शुरू कर दी. वहां भगदड़ मच गई और हर कोई इधर-उधर भागने लगा."

वे आगे कहते हैं, "पुलिस ने गोलियों के साथ आंसू गैस भी छोड़ी. मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. सब कुछ धुंधला था. जुलूस के आगे के हिस्से लोग चिल्ला रहे थे, 'वो मारा गया, वो मारा गया' ".

पुलिस की गोलीबारी में आठ लोगों की मौत हुई. इस ख़बर से अब्दुल गफ़्फ़ार को इतना सदमा हुआ कि वे शवो को देखने अस्पताल गए. मृतकों में से एक रफ़ीक़ुद्दीन अहमद थे जिसके सिर में गोली लगी थी. हालांकि रफ़ीक़ुद्दीन छात्र नहीं थे लेकिन वो गांव से ढाका अपनी शादी की तैयारी के लिए आए हुए थे.

उस लम्हे को याद करते हुए अब्दुल गफ़्फ़ार ने बताया, "पहले-पहल ऐसा लगा कि कोई इंसान सो रहा है, लेकिन उसका सिर क्षत-विक्षत हो चुका था और मस्तिष्क बाहर निकल गया था. उसके पूरे शरीर पर खून था और उसका शव ज़मीन पर पड़ा था. मुझे लगा जैसे मेरे भाई की मौत हुई है. उसे देखकर मेरे दिमाग़ में ये शब्द आए 'अमार भायेर रोक्ते रांगानो एकुशे फरवरी'. उसकी शादी होने वाली थी लेकिन उसने हमारी भाषा के लिए अपनी जान गंवा दी.''

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Image caption बांग्लादेश में 21 फरवरी को बंगाली भाषा आंदोलन की वर्षगांठ मनाई जाती है.

'मरने के लिए तैयार'

अगले दिन छात्रों ने फिर हड़ताल का आह्वान किया लेकिन इस बार वे जान देने के लिए तैयार थे. अब्दुल गफ़्फ़ार बताते हैं, "हर कोई मरने के लिए तैयार था. गोली चलने की संभावना से निपटने के लिए सबने अपनी जेब में अपना नाम और पता लिखकर रखा था, महिलाओं ने भी."

अब्दुल गफ़्फ़ार का कहना था कि पहले दिन वे लोग अपना विरोध जता रहे थे लेकिन दूसरे दिन उनमें ग़ुस्सा था. वे कहते हैं, "दूसरे दिन लोगों में ग़ुस्सा था कि हम इस सरकार को गिराएंगे और मुख्य मंत्री को मारेंगे. लोगों में किसी तरह का डर नहीं था."

एक बार फिर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई जिसमें चार लोग मारे गए. अब्दुल गफ़्फ़ार चौधरी की पिटाई हुई. अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अपना गीत पूरा किया जो फिर छपा और छात्रों में बांटा गया. ये गीत आगे जाकर बंगाली भाषा आंदोलन का गान बन गया.

चार साल बाद 1956 में पाकिस्तान के संविधान में संशोधन कर बंगाली को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया गया.

राष्ट्रीय भाषा का दर्जा

अब्दुल गफ़्फ़ार बताते हैं कि वो एक गर्व का क्षण था. वे कहते हैं, "हम इतना गर्व महसूस करते थे. पहली बार पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस के विमानों पर एक तरफ़ उर्दू और एक तरफ़ बंगाली में लिखा गया. कितने ही बंगाली लोग अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों पर जाते थे ताकि वो विमानों पर बंगाली लिखी दे सकें."

वे आगे बताते हैं, "इसके अलावा नोटों पर और दस्तावेज़ों में भी बंगाली भाषा का इस्तेमाल होने लगा. ये एक बड़ी जीत थी. इससे न सिर्फ़ हमारी भाषा और संस्कृति बची बल्कि ये हमारी आज़ादी की लड़ाई की शुरुआत थी."

बंगाली बहुल पूर्वी पाकिस्तान ने 1971 में आज़ादी की घोषणा कर दी और आज बांग्लादेश कहलाता है.

अब्दुल गफ़्फ़ार चौधरी आज 79 साल के हैं और लंदन में रहते हैं. वे आज भी लिखते हैं.

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