बाल मृत्यु दर में पाकिस्तान सबसे आगे: रिपोर्ट

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पाकिस्तान में गर्भ में ही मरने वाले बच्चे और पैदा होने के चौबीस घंटों के अंदर मर जाने वाले बच्चों की संख्या प्रति हजार 42 है.

इसमें पांचवां जन्मदिन आने से पहले ही मौत का शिकार होने वाले बच्चों की संख्या भी मिला दें तो यह संख्या प्रति हज़ार 86 तक पहुंच जाती है.

45 साल की नसीम पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के बीचों-बीच एक झुग्गी बस्ती अल्लामा इक़बाल कॉलोनी में रहती हैं.

उन्हें पांच महीने पहले ऐसा सदमा लगा जिससे वो अब तक नहीं उबरी हैं. उनकी दूसरी बेटी राहिला का बच्चा उचित चिकित्सा सुविधा न मिल पाने की वजह से पैदा होने से पहले ही मर गया.

राहिला खुद भी सेहत से जुड़ी पेचीदगियों की वजह से चल बसीं. बेटी के गम में अब नसीम की तबियत भी अच्छी नहीं रहती.

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बदहाली

नसीम के घर से एक गली दूर रहती हैं साइमा. समय पर अस्पताल न पहुंचने की वजह से उनका बच्चा गर्भावास्था के सातवें महीने में ही मर गया.

साइमा कहती हैं कि देश की राजधानी होने के बावजूद इस्लामाबाद में उन जैसे ग़रीब लोगों को स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही हैं.

अल्लामा इक़बाल कालोनी ऐसे लोगों की बस्ती है जो सरकारी अस्तपाल भी नहीं जा पाते हैं. शायद यही वजह है कि गर्भवती महिलाएं गैर प्रशिक्षित दाइयों पर निर्भर होने को मजबूर हैं.

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यहां ज़्यादातर ऐसे लोग रहते हैं जो दूसरे इलाकों से काम की तलाश में इस्लामाबाद आए हैं. यहीं नसीमा बीबी भी रहती हैं जो एक मां होने के साथ साथ दाई का काम भी करती हैं.

उन्होंने किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं लिया है लेकिन लगभग दस साल से वो गर्भवती महिलाओं के बच्चे पैदा करा रही हैं.

वो कहती हैं, “मैं डिलीवरी में मदद करती हूं लेकिन अगर मामला पेचीदा हो तो मैं नहीं करती हूं क्योंकि मां और बच्चे दोनों को बचाना है ना.”

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रिपोर्ट

साइमा और राहिला के पास न तो आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं थी और न ही इन्हें हासिल करने की उनकी हैसियत.

सुविधा और चिकित्साकर्मियों की कमी की वजह से मरे हुए पैदा होने वाले बच्चों और पैदाइश के पहले ही दिन मर जाने वाली बच्चों की दर पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा है.

बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान में हर साल दो लाख से ज़्यादा बच्चे प्रसव के दौरान या फिर पैदा होने के 24 घंटों के भीतर ही मर जाते हैं.

इस संख्या को कम करने के लिए संस्था सरकार से ज़रूरी उपाय करने की अपील कर रही है. लेकिन सिंध प्रांत की सरकार में अतिरिक्त स्वास्थ्य सचिव डॉ. असलम पेचोहो कहते हैं कि स्थिति में बेहतरी के लिए सरकारी नियुक्तियों में रसूखदार लोगों के हस्तक्षेप को कम करने की जरूरत है.

पिछले दस साल के दौरान पाकिस्तान में नवजात बच्चों की मौत की दर में कोई ख़ास कमी नहीं आई है.

सरकारी अधिकारी देश के मुश्किल हालात के कारण अपनी मज़बूरी का इज़हार करते हैं. लेकिन साइमा और उनकी जैसी बहुत सी महिलाओं को कौन यह विश्वास दिलाएगा कि उनकी ग़रीबी उनके बच्चों की मौत का कारण न बने.

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