नौ खाड़ी मुल्कों ने क़तर से राजदूत वापस बुलाए

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Image caption शेख़ तमीम बिन हमद अल थानी जून 2013 में क़तर के अमीर बने थे.

सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने क़तर से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया है. इन मुल्कों का आरोप है कि क़तर उनके आंतरिक मामलों में दख़ल देता है.

एक संयुक्त बयान में कहा गया है कि किसी तरह की दख़लअंदाज़ी के ख़िलाफ़ क़तर के साथ बीते साल एक सुरक्षा समझौता किया गया था जिसका पालन करने करने में वह नाकाम रहा है.

इस फ़ैसले पर क़तर ने अपना 'खेद और हैरानी' ज़ाहिर करते हुए कहा है कि वह इन देशों से अपने राजदूतों को वापस नहीं बुलाएगा.

संयुक्त अरब अमीरात और खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के अन्य सदस्यों के बीच हाल के वर्षों में तनाव बढ़ा है.

लेकिन ताज़ा मामला, इस समूह के भीतर पैदा हुए सबसे गंभीर विवादों में से एक है.

'सुरक्षा और स्थायित्व'

संयुक्त बयान में कहा गया है कि तीनों देशों ने 'क़तर को समझाने की बहुत कोशिश की' ताकि नवम्बर 2013 में हुए समझौते को लागू किया जा सके जिससे जीसीसी के सदस्यों की सुरक्षा और स्थायित्व को कोई समूह या व्यक्ति किसी भी तरह प्रभावित नहीं कर सके.

बयान में कहा गया है, ''बेहद खेद की बात है कि क़तर ऐसा करने में विफल हुआ.''

बयान में यह भी कहा गया है कि 'सुरक्षा और स्थायित्व' सुनिश्चित करने के लिए दोहा से अपने राजदूतों को वापस बुलाना ज़रूरी हो गया था.

वहीं क़तर न्यूज़ एजेंसी (क्यूएनए) ने कैबिनेट का वह बयान छापा है जिसमें खाड़ी देशों के इस फ़ैसले पर निराशा ज़ाहिर की गई है लेकिन यह भी कहा गया है कि क़तर जबावी कार्रवाई में अपने राजदूतों को इन देशों से वापस नहीं बुलाएगा.

इसमें कहा गया है कि 'जीसीसी की सुरक्षा और स्थायित्व को बचाने के लिए' क़तर अपनी प्रतिबद्धता पर क़ायम रहेगा.

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जीसीसी के भीतर सैन्य और राजनयिक एकजुटता बढ़ाने पर ज़ोर देते रहे हैं. छह सदस्यों वाले जीसीसी में क़तर, ओमान और कुवैत भी शामिल हैं.

लेकिन क़तर और ओमान इन क्षेत्रों में अधिक एकीकरण का विरोध करते रहे हैं.

ब्रदरहुड से संबंध

तेल और गैस के मामले में क़तर काफ़ी समृद्ध है जिसकी राजनयिक मामलों में भूमिका मुखर होती रही है.

क़तर, मिस्र के अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी का पुरज़ोर समर्थन और सीरिया में इस्लामी विद्रोही समूहों की भी मदद करता रहा है.

प्रभावशाली अलजज़ीरा न्यूज़ नेटवर्क भी क़तर में स्थित है जो सारी दुनिया में प्रसारण करता है और जिसका रवैया सऊदी अरब तथा खाड़ी के अन्य देशों के प्रति आलोचना भरा रहा है.

रियाद ने वर्ष 2002 से वर्ष 2008 तक क़तर में अपना राजदूत नहीं रखा, इसके पीछे उन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही जिन्हें अल-जज़ीरा ने प्रसारित किया था.

क़तर को मुस्लिम ब्रदरहुड का एक प्रमुख वित्तीय और राजनयिक समर्थक माना जाता है जिस पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में प्रतिबंध है.

अभी सोमवार को ही क़तर के एक नागरिक को संयुक्त अरब अमीरात में सात साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई. क़तर के इस नागरिक को इस्लामी राजनीतिक समाज अल-इसलाह का समर्थन करने का दोषी पाया गया.

अल-इसलाह के बारे में सरकारी वक़ीलों का कहना था कि यह मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड की ही एक स्थानीय शाखा है.

वहीं अल-जज़ीरा के नौ पत्रकारों पर मिस्र में मुक़दमा चल रहा है. उन पर चरमपंथी संगठन में शामिल होने या उसे मदद करने का आरोप है.

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