जब अदालत में आवाज़ गूँजी, 'पत्रकार आतंकी नहीं होते'

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अल-जज़ीरा के विदेश मामलों के संवाददाता पीटर ग्रेस्ट, क़ाहिरा में ब्यूरो प्रमुख मोहम्मद फ़हमी और फ़्रीलांस प्रोड्यूसर पर चल रहे मुक़दमे की सुनवाई का दूसरा दिन था. इन तीनों पर ही ''ग़लत ख़बर'' देने और मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन करने के आरोप हैं.

मिस्र में एक साल तक सत्ता चलाने वाली मुस्लिम ब्रदरहुड को पिछले साल सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बाद सेना ने अपदस्थ कर दिया था. उसके कई नेता गिरफ़्तार हो गए थे. अब नई सरकार ने इस संगठन को एक चरमपंथी समूह की श्रेणी में डाल दिया है.

मिस्र की राजधानी क़ाहिरा में कुछ पत्रकारों पर चरमपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड की मदद करने और ग़लत ख़बर देने के आरोप में मुक़दमा चल रहा है. अदालत में इस मामले की सुनवाई की शुरुआत पहले धीमी गति से हुई. पहले सरकारी पक्ष के वकील ने पत्रकारों के ख़िलाफ़ जज के समक्ष सबूत पेश किए.

इस मामले की सुनवाई कर रहे जज मोहम्मद नागी ने धूप में पहनने वाले चश्मे को उतारा और फिर हर सबूत को देखा. इसमें से एक भूरे रंग का लिफ़ाफ़ा था जिसमें 96 तस्वीरें थीं. हालांकि हमें यह पता नहीं चल पाया कि इनमें क्या था. इसमें कैमरा, कंप्यूटर और रोशनी देने वाले उपकरण के डब्बे भी थे.

इस बीच अदालत में पक्षियों को जोड़ा भी आ गया और ऐसा लगा मानो वे जज की बेंच के ऊपर ही अपना घोंसला बनाना चाहते हैं. कई बार तो ऐसा भी हुआ कि उनकी चोंच से तिनका गिरा भी और उन तीन सख़्त और मूछों वाले जजों के क़रीब से निकलकर ज़मीन पर गिर गया.

कठघरे में खड़े पत्रकार और प्रेस के लिए बेंचों पर बैठे लोग देख रहे थे. जिन उपकरणों को दिखाया गया उसमें समाचारों चैनलों के लिए रोज़ इस्तेमाल किए जाने ज़रूरी उपकरण थे.

हास्यास्पद आरोप

जैसे ही जज ने तारों या केबल से भरे बैग को रिकॉर्ड में डाला, पीटर ग्रेस्ट हँस पड़े. पीटर को वैसे एक वरिष्ठ पत्रकार बताया जाता है लेकिन सिर्फ़ इस बात से आपको उनके बारे में ज़्यादा पता नहीं चलेगा.

वह बीबीसी में काम कर चुके हैं. उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में बेहतरीन काम किया है और कई पुरस्कार भी जीते हैं.

एक कैमरामैन, जिन्होंने पीटर के साथ काम किया है, बताते हैं कि अब तक उन्होंने जितने लोगों के साथ काम किया है उनमें पीटर जैसा लचीला व्यक्ति कोई नहीं मिला है. वह दुनिया की कुछ ख़तरनाक जगहों पर भी रिपोर्टिंग कर चुके हैं.

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Image caption मुस्लिम ब्रदरहुड के तमाम नेता इन दिनों जेल में हैं

जब मैं बीबीसी के काबुल दफ़्तर में काम करता था तो उनकी तस्वीर मैंने दीवार पर पूर्व संवाददाताओं वाली जगह पर लगी हुई देखी थी.

इस तस्वीर में वह मुजाहिद्दीन के साथ बैठे हुए हैं. इस तस्वीर में देखा जा सकता है कि यह मुजाहिद्दीन नेता एक पुरानी पिस्तौल से कैमरे के लेंस की ओर इशारा कर रहे हैं. वहीं इस बीच पीटर के चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान देखी जा सकती है.

सुनवाई के दूसरे दिन अदालत के कक्ष में मुख्य पुलिस अधिकारी अहमद हसन अपनी जगह पर आ चुके थे. उनसे पूछा गया कि इन तीनों पत्रकारों के ख़िलाफ़ उनके पास क्या सबूत हैं.

अहमद हसन का जवाब था, "गोपनीय सूत्र."

उन्होंने बताया कि ये पत्रकार अल-जज़ीरा से जुड़े एक प्रतिबंधित टीवी चैनल मुबाशर मिस्र के लिए काम कर रहे थे. यह चैनल मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थक था.

इसके अलावा उनके ख़िलाफ़ क्या सबूत था, उन्हें नहीं पता था. यह पत्रकार अल जज़ीरा अंग्रेज़ी चैनल के कर्मचारी थे जिसकी पत्रकारिता आमतौर पर विश्वसनीय और ग़ैरपक्षपातपूर्ण मानी जाती है.

जब पुलिस अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि उसे इन दोनों चैनलों का फ़र्क नहीं मालूम तो कठघरे में खड़े तीनों पत्रकार खिलखिलाकर हँस पड़े.

राहत के पल

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Image caption मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी पर भी मुक़मदा चलाया जा रहा है

यह क्षण भर के लिए राहत का मौक़ा था क्योंकि इन तीनों के ऊपर ऐसे आरोप लगाए गए थे जिन पर यक़ीन करना कठिन था और यह झूठ सबके सामने आ गया था.

सुनवाई जैसे ही ख़त्म हुई, मैं जितना संभव था, कठघरे के उतना क़रीब पहुँच गया और पीटर से बहुत संक्षेप में बात की.

पीटर ने कहा, "हम लोग राजनीतिक क़ैदी हैं."

ये लोग अल-जज़ीरा के मालिकों, क़तर की सरकार और मिस्र की सरकार के बीच चल रही लड़ाई के चलते पकड़े गए हैं. क़तर मुस्लिम ब्रदरहुड का सहयोगी है.

मिस्र की नई सरकार और और पिछली सरकार के बीच जन्मजात दुश्मनी है. मुस्लिम ब्रदरहुड के ज़्यादातर नेता इन दिनों जेल में हैं. यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी भी कभी-कभी अदालत के कठघरे में ही दिखते हैं.

मिस्र में सरकारों का हस्तांतरण बेहद दर्दनाक और ख़ूनी था.

राजधानी क़ाहिरा समेत कई जगहों पर सैकड़ों की संख्या में मिस्र के नागरिक मारे गए. सैकड़ों गिरफ़्तार किए गए.

मैं वहां था और रिपोर्टर की अपनी नौकरी कर रहा था. पीटर भी वहीं थे. उनके और उनके सहयोगी दो महीने से भी ज़्यादा समय से जेल में हैं.

बहरहाल, अब इस भद्दे मज़ाक़ को ख़त्म करने का वक़्त आ गया है. मेरा ऐसा कहना बेतुका लग सकता है, लेकिन यह सही है कि पीटर ग्रेस्ट चरमपंथी नहीं है.

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