अफ़ग़ान चुनाव: प्रमुख उम्मीदवार और मुद्दे

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अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान पांच अप्रैल को होगा. नए राष्ट्रपति निवर्तमान राष्ट्रपति हामिद करज़ई की जगह लेंगे, जो साल 2001 में तालिबान शासन का अंत होने के बाद से सत्ता में हैं. लेकिन संविधान उन्हें तीसरी बार देश का राष्ट्रपति बनने की इजाजत नहीं देता है.

अफ़ग़ानिस्तान में यह पहली बार लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता का स्थानांतरण हो रहा है. लेकिन इसमें आगे कई पेंच हैं.

नेटो सुरक्षा बलों की इस साल के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान से निकलने की योजना है. नए राष्ट्रपति को और अधिक चरमपंथी हमलों को सामना करना पड़ेगा. यह भी हो सकता है कि तालिबान एक बार फिर सत्ता हासिल करने की कोशिश करें.

कौन हैं मुख्य दावेदार?

राष्ट्रपति पद के लिए कुल आठ उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. इनमें पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला अब्दुल्ला, ज़ालमई रसूल और पूर्व वित्त मंत्री अशरफ़ गनी अहमदज़ई प्रमुख हैं.

अब्दुल्ला अब्दुल्ला साल 2009 में हुए चुनाव में हामिद करज़ई के मुख्य प्रतिद्वदी थे. वे साल 2001 से साल 2006 तक देश के विदेश मंत्री रहे और साल 2009 से विपक्ष के नेता हैं.

वह मिश्रित रूप से ताज़िक और पश्तून क़बीले से हैं. हालांकि ताज़िकों के प्रभाव वाले नार्दन एलायंस में उनकी भूमिका और इसके पूर्व नेता अहमद शाह मसूद, जिनकी 2001 में हत्या कर दी गई थी, के साथ उनके संबंधों को लेकर उन्हें व्यापक रूप से ताज़िक के रूप में ही देखा जाता है.

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Image caption अब्दुल्ला अब्दुल्ला का ताज़िकों और पश्तूनों में प्रभाव है.

शिक्षाविद अशरफ़ गनी अहमदज़ई, हामिद करज़ई की सरकार में साल 2004 से 2006 तक वित्त मंत्री थे. उन्होंने शहरी पश्तूनों और टेक्नोक्रेट से अपील की है लेकिन पहले दौर के लिए उन्हें दक्षिण-पश्चिम इलाक़ों में पश्तूनों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी. उन्हें ताज़िकों के वोट के लिए जूझना होगा.

वहीं 70 साल के ज़ालमई रसूल शाही परिवार के राजनयिक हैं. वो साल 2010 से 2013 तक विदेश मंत्री रहे हैं. उन्हें प्रमुख दावेदार के रूप में नहीं देखा जा रहा है, उन्होंने टीवी पर हुई बहसों में भी अच्छा प्रदर्शन नहीं किया.

इसके अलावा पाँच अन्य लोग भी राष्ट्रपति चुनाव के मैदान में हैं. लेकिन उनमें से किसी को भी अच्छा वोट मिलने की उम्मीद नहीं है.

क्या सुरक्षा प्रमुख घरेलू समस्या है?

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Image caption अशरफ़ गनी अहमदज़ई को अपनी उम्मीदों को बनाए रखने के लिए पहले दौर में अच्छा प्रदर्शन करना होगा.

चुनावों में बाधा पहुँचाने के लिए तालिबान ने हमले तेज़ कर दिए हैं. तालिबान को सरकार के लिए एक दीर्घकालिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है.

अमरीका और अफ़ग़ानिस्तान एक समझौते पर पहुंचे थे, इसके मुताबिक़ देश से नेटो सुरक्षा बलों के 2014 के अंत तक चले जाने के बाद भी हज़ारों अमरीकी सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान को रहकर अफ़ग़ान सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देना था. लेकिन हामिद करज़ई ने इस पर दस्तख़त करने से इनकार करते हुए अमरीका के सामने कुछ मांगें रख दीं. राष्ट्रपति चुनाव के सभी प्रमुख उम्मीदवार इस समझौते का समर्थन कर रहे हैं.

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Image caption ज़ालमई रसूल को राष्ट्रपति हामिद करज़ई का पसंदीदा उम्मीदवार माना जाता है.

चुनाव प्रचार के शुरुआती दिनों में हिंसा तुलनात्मक रूप से कम थी. लेकिन चुनाव प्रचार के ज़ोर पकड़ने पर हाल के दिनों में कुछ बड़े हमले हुए हैं. इनमें 25 मार्च को चुनाव आयोग पर हुआ हमला शामिल है.

सभी उम्मीदवारों को बख़्तरबंद गाड़ियां और सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराए गए हैं. मतदान वाले दिन सभी मतदान केंद्रों की पुख्ता सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रबंध भी किए गए हैं.

चुनाव की सुरक्षा व्यवस्था में 65 हज़ार विदेशी सुरक्षा बल भी तैनात हैं.

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अमरीका के साथ एक अंतिम सुरक्षा समझौता चुनाव का प्रमुख मुद्दा है. चुनाव जीतने वाला उम्मीदवार इसे अपनी प्राथमिकता में रखेगा. तालिबान को वार्ता की मेज पर लाना, भ्रष्टाचार से लड़ाई और नशीली दवाओं के कारोबार पर रोक लगाना प्रमुख मुद्दे हैं.

क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव है?

राष्ट्रपति पद के लिए साल 2009 में हुए चुनाव में बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ी मतदान के आरोप लगे थे. इसके विरोध में डॉक्टर अब्दुल्ला ने अपना नाम वापस ले लिया था. इस वजह से करज़ई चुनाव जीत गए थे.

अफ़ग़ानिस्तान को सहायता देने वाले देशों ने यह साफ़ कर दिया है कि वो सहायता तभी जारी रखेंगे, जब चुनाव निष्पक्ष होंगे.

नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट (एनडीआई) के कार्ल इंडरफर्थ ने उम्मीद जताई कि चुनाव पिछली बार से बेहतर होंगे, हालांकि पूरी पारदर्शिता की कोई गारंटी नहीं हैं.

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इस साल मार्च में काबुल के एक होटल पर हुए हमले के बाद से चुनाव पर नज़र रखने वाले दो प्रमुख संगठनों एनडीआई और सिक्योरिटी एंड को-ऑपरेशन इन यूरोप ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने कर्मचारियों को वापस बुला लिया है.

राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से इस बात का आश्वासन मिलने के बाद भी कि वो मतदान में हस्तक्षेप नहीं करेगा, विपक्षी प्रचारकों और मीडिया की चिंता अभी भी बनी हुई है.

क्या होगा अगर कोई नहीं जीता?

उनका आरोप है कि बड़े पैमाने पर अतिरिक्त मतदान के लिए कार्ड बांटे जा रहे हैं.

अगर किसी उम्मीदवार को जीत के लिए ज़रूरी कुल मतदान के 50 फ़ीसदी वोट नहीं मिले तो सबसे अधिक वोट पाने वाले दो उम्मीदवार 28 मई को दूसरे दौर के मतदान में भाग लेंगे.

पहले दौर के नतीजे मई के मध्य से पहले आने की उम्मीद नहीं है.

इसलिए दूसरे दौर के मतदान के नतीजों में देरी होगी. ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता हस्तांतरण जुलाई तक ही हो पाएगा.

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