'जननांगों पर दिए जाते थे बिजली के झटके'

पाब्लो उचाओ के पिता इनोसेंसिओ इमेज कॉपीरइट BBC World Service

ब्राज़ील में हुए सैन्य तख़्तापलट की 50वीं वर्षगांठ 31 मार्च को थी. इस तख़्तापलट के बाद देश में दो दशक तक सैन्य शासन रहा था. दमन के इस दौर में क़रीब पांच सौ लोग या तो गायब हो गए या उनका क़त्ल कर दिया गया. बहुत से लोगों को हिरासत में प्रताड़ित किया गया.

बीबीसी की ब्राज़ील सेवा के पाब्लो उचाओ ऐसे ही एक बंदी और अपने पिता इनोसेंसिओ को याद कर रहे हैं.

जब मैं जवान हो रहा था तो अपने पिता को कभी भी मैंने सुपरहीरो के रूप में नहीं देखा. लेकिन वो एक मज़बूत आदमी थे.

पढ़ाई का रूझान

मैं उत्तर-पूर्वी ब्राज़ील के एक राजनीतिक लेकिन साधारण मध्यवर्गीय परिवार में पला-बढ़ा. पारिवारिक आयोजनों में उन यातना कक्षों की नृशंस बातें कभी नहीं बताई गईं.

मेरे पिता एक साधारण परिवार में पैदा हुए 14 भाई-बहनों में से एक थे. पढ़ाई के प्रति उनके रूझान को देखते हुए उनके माता-पिता ने उन्हें एक धार्मिक स्कूल में भेज दिया.

लेकिन 1965 में जब उन्होंने फ़ोर्टालिज़ा विश्वविद्यालय में दाखिला लिया तो उनका रूझान पढ़ाई से हटकर राजनीति की ओर हो गया.

एक साल पहले उन्होंने देखा था कि सेना के ट्रकों ने ब्राज़ील की सड़कों पर कब्ज़ा कर वामपंथी राष्ट्रपति जाओ गोलर्ट की सरकार को अपदस्थ कर दिया. इस घटना ने उनपर अमिट छाप छोड़ी.

मेरे पिता ने राजनीतिक बंदियों पर बनी मेसा वरमेल्ला की डॉक्यूमेंट्री में बताया है, ''मैं विश्वविद्यालय में छात्र के रूप में दाखिल हुआ. लेकिन एक साल बाद ही मेरा ध्यान पढ़ाई से पूरी करने पर से हट गया. मैं क्रांतिकारी बनना चाहता था.''

सत्ता पर 1964 में कब्ज़ा करने के बाद अमरीका समर्थित सैनिक सरकार ने देश को पटरी पर लाने का वादा किया. सैन्य शासकों का तर्क था कि देश साम्यवाद की ओर जा रहा है. लेकिन चार साल बाद भी सैन्य सरकार नागरिक सरकार को सत्ता सौंपने को तैयार नहीं थी.

छात्रों की गिरफ़्तारी

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Image caption सेना ने साल 1964 में राष्ट्रपति जाओ गोलर्ट का पद से हटा दिया था.

रियो डी जिनेरियो में मार्च 1968 में एक प्रदर्शन के दौरान 18 साल के छात्र एडसन लूइस को पुलिस ने बहुत नज़दीक से गोली मार दी. अक्तूबर में इबूनिया में बैठक कर रहे सैकड़ों छात्रों को गिरफ़्तार कर लिया गया. इनमें से क़रीब 70 छात्रों पर मुक़दमा चलाया गया.

इनमें उत्तर-पूर्व के सिएरा में स्थित फ़ेडरल यूनिवर्सिटी के छात्र संघ अध्यक्ष भी शामिल थे, जो कि मेरे पिता थे.

साल ख़त्म होने से पहले ही सैन्य सरकार ने संस्थागत क़ानून-5 लागू कर दिया, जिसने कांग्रेस को छिन्न-भिन्न कर दिया, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को लंबित कर दिया और सेंसरशिप की ओर क़दम बढ़ाए.

हाल ही में मैंने उन रातों के बारे में जाना, जब उन्हें सोने से रोकने के लिए खड़ी हथकड़ी के साथ उनके जेल के कमरे में छोड़ दिया गया था.

सैन्य शासन में प्रताड़ना के प्रचलित तरीकों में से एक यह था कि क़ैदियों को एक खंभे में घंटों के लिए लटका दिया जाता था, उनकी एड़ी और कलाई को एक साथ बांध दिया जाता था.

बिजली के झटके

कई क़ैदियों के हाथों की उंगलियों और उनके जननांगों पर बिजली के झटके दिए जाते थे.

मेरे पिता ने हिरासत में एक साल बिताए. लेकिन वो भाग्यशाली थे कि सज़ा एक साल के लिए बढ़ाए जाने से पहले ही रिहा हो गए.

रिहाई के बाद वो फ़ोर्टालिज़ा से रियो डी जिनेरियो चले गए, जहाँ वो मेरी माँ एंजेला से मिले. वहाँ वो क़रीब एक दशक तक छिपे रहे. इस दौरान मेरे भाई और मेरा जन्म हुआ.

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Image caption इनोसेंसिओ उचाओ अपनी पत्नी एंगेला से साथ हनीमून के दौरान.

सैन्य सरकार ने 1979 में एक आम माफ़ी क़ानून पास किया. इससे मेरे परिवार का फ़ोर्टालिज़ा लौटना संभव हुआ. लेकिन यही क़ानून मानवाधिकार का उल्लंघन करने वालों को मुक़दमे से बचाने वाला भी था.

मेरे माता-पिता हमें राजनीतिक संघर्ष की शिक्षा देते थे. अपनी पीढ़ी के अन्य लोगों की ही तरह मेरे पिता यह नहीं बताना चाहते थे कि सैन्य सरकार के यातना कक्षों में उनके साथ क्या-क्या हुआ. उन्होंने मुझसे कहा कि यह दर्दनाक था और इसे पचाने के लिए समाज को और समय की ज़रूरत होगी.

ख़ुफ़िया नजर

वो बताते हैं, ''1985 में लोकतंत्र की बहाली के बाद हम यूनियनों की मज़बूती, नागरिक संगठनों, संविधान सभा के चुनाव और मतदान के लिए संघर्ष करने लगे.''

सैन्य शासन की यातनाओं के बारे में न बताने के पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी थे.

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Image caption पाब्लो उचाओ के बड़े भाई मार्सेलो का जन्म उस समय जब उनके माता पिता छिपकर रह रहे थे.

नेशनल आर्काइव में रखी गुप्त सूची से हटाए गए क़ाग़जात का अध्ययन करने से पता चलता है कि ख़ुफ़िया सेवा उन पर 1989 तक नज़र रख रही थी.

लेकिन अब उन्हें लगता है कि उन बातों को बताने का समय आ गया है. उन्होंने राजनीतिक बंदी का दर्जा हासिल करने के लिए आवेदन किया है. यह उन्होंने आर्थिक मुआवज़े के लिए नहीं बल्कि उस सम्मान के लिए किया है, जिसके वो हक़दार हैं.

हाल में गठित सच्चाई आयोग से उन्होंने अपने अनुभव साझा किए. लेकिन दुर्भाग्य से दुनिया के अन्य देशों में बने इसी तरह के आयोगों की तरह ब्राज़ील के इस आयोग के पास मुक़दमा चलाने का अधिकार नहीं है.

साल 1979 में पारित किया गया आम माफ़ी क़ानून अभी भी अस्तित्व में है, इसका मतलब यह हुआ कि न तो प्रताड़ना के दोषी सैन्य अधिकारी और न ही हिंसा फैलाने वाले वामपंथी गुरिल्लाओं को मुक़दमे का सामना करना पड़ेगा.

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