अमरीका में बसने वाले भारतीयों की सफ़रगाथा

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हज़ारों मील दूर दुनिया के किसी कोने में पेड़ से टूटकर एक नारियल गिरा, हवा और बारिश के थपेड़ों ने उसे धकेलकर एक नदी में पहुंचा दिया, नदी के बहाव के साथ बहता हुआ नारियल समुद्र में पहुंचा और फिर महीनों तक डूबने उतराने के बाद लहरों ने उसे ज़मीन पर ला पटका.

नारियल को मिट्टी पसंद आई, मिट्टी ने भी नहीं पूछा किस देश के हो, किस जात के हो, किस रंग के हो. नारियल ने जड़ जमाने की कोशिश की, कुछ ही महीनों में कोपलें फूटीं और वक़्त के साथ वो टूटा हुआ फल एक हरा भरा पेड़ बन गया.

कहते हैं कि कुछ हद तक यही है अमरीका और यहां बसनेवालों की कहानी. यहां की मिट्टी ने सालों से रंग, जात, धर्म, भाषा, जेब की परवाह किए बिना उन सबको गले लगाया है जो कहीं से टूटकर, कहीं से उखड़कर आए और अपनी मेहनत से, अपनी ताकत से सूरज को थामने की कोशिश की.

कामयाबी की कहानियां

इस हफ़्ते मैं वाशिंगटन के स्मिथसोनियन म्यूज़ियम में भारतीय मूल के अमरीकियों पर चल रही प्रदर्शनी देखने गया. भारतीय मूल के लोगों की एक से बढ़कर एक कामयाब कहानियों से दीवारें रंगी हुई हैं.

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कहीं भारतीय मूल की मिस अमरीका, तो कहीं नोबेल विजेता हरगोविंद खुराना.

ऐसा लगा जैसे 1931 में जेम्स ट्रसलो ऐडम्स की लिखी किताब 'द एपिक ऑफ़ अमेरिका' का हर पन्ना सजीव हो उठा हो. इस किताब में पहली बार अमेरिकन ड्रीम की परिभाषा दी गई थी यानि एक ऐसी मिट्टी का सपना जहां ज़िंदगी बेहतर हो, जहां क़ाबिलियत की क़द्र हो.

हमले भी हुए

लेकिन उन्हीं तस्वीरों के बीच में है न्यूयॉर्क टाइम्स का छह सितंबर 1907 का पन्ना. हेडलाइन है—ग़ुस्साई भीड़ ने हिंदूओं को भगाया.

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पांच सौ से ज़्यादा गोरे मज़दूरों ने बेलिंघम शहर में टिंबर कारखाने में काम करनेवाले ज़्यादातर सिख मज़दूरों पर हमला किया, उन्हें बेरहमी से मारा-पीटा, कपड़े फाड़ डाले, बेइज़्ज़त किया और दो सौ मज़दूरों को रात भर एक बेसमेंट में बंद रखा. ये नस्ली हिंसा थी और इसका मकसद था उन्हें इतना डरा देना कि वो शहर छोड़ दें और टिंबर मिलों में गोरे मज़दूरों की नौकरी पर कोई ख़तरा नहीं आए.

अस्सी के दशक में न्यू जर्सी में भी भारत से आए लोगों पर हमले हुए. हमला करने वालों ने अपना नाम रखा था डॉटबस्टर्स—डॉट यानि बिंदी जो भारतीय महिलाएं लगाती थीं. उनका नारा था कि वो न्यू जर्सी से भारतीयों को हर हाल में भगाएंगे और सड़क पर अगर कोई “हिंदू” नज़र आया तो उसपर हमला करेंगे. यहां भी वजह थी भारतीयों की बढ़ती आर्थिक तरक्की.

ब्लू से व्हाइट कॉलर

लेकिन जिस तबके ने कभी इस कौम पर हमला किया वो अब सिर्फ़ हसरत भरी निगाहों से उन्हें ताकता है.

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भारतीय मूल के ज़्यादातर लोग ब्लू कॉलर से व्हाइट कॉलर में तब्दील हो चुके हैं या हो रहे हैं. वो माइक्रोसॉफ़्ट में काम करते हैं, नासा में रिसर्च करते हैं, हार्वर्ड में पढ़ाते हैं, अस्पतालों में लोगों की जान बचाते हैं—ये जगह भीड़ वाली नहीं है. यहां तो बस वही बुलाए जाते हैं जिनमें कुव्वत होती है.

भारतीय मां-बाप दिन रात अपने बच्चों को कतार में आगे रखने की मशक्कत में जुटे रहते हैं. छठी क्लास से ही प्वांइट्स जमा किए जाते हैं कि अच्छे से अच्छे कॉलेज में दाखिला हो. बहुतों ने अपने आलीशान घरों में टीवी नहीं लगवा रखा है, बस किताबें दिखती हैं. स्कूलों में टीचर मान कर चलते हैं कि भारतीय बच्चा है तो वो हार्वर्ड, कोलंबिया और स्टैनफ़र्ड पर ही निशाना लगा रहा होगा.

स्मिथसोनियन की ये कामयाब तस्वीरें कई पीढ़ियों की कमाई है. ये याद दिलाती हैं कि पानी में बहकर आए नारियल को बहुत मेहनत करनी पड़ी है परदेस की इस मिट्टी में जड़ जमाने के लिए.

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