कैसे बना सिंगापुर का कॉफ़ी किंग

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या कुन कॉफ़ी इंटरनेशनल के कार्यकारी अध्यक्ष एड्रिन लोई ने कभी सोचा नहीं था कि वो सिंगापुर के कॉफ़ी किंग बनेंगे.

एक चीनी-सिंगापुरी परिवार के अपने सात भाई-बहनों में सबसे छोटे लिंग अपने पिता आह कून की मशहूर कॉफ़ी की दुकान पर भाई-बहनों के साथ काम करते हुए बड़े हुए.

वो हंसते हुए कहते हैं, '' मैं टोस्ट बनाने में बहुत अच्छा था.''

लोई के पिता या कुन की कॉफ़ी की दुकान पर परंपरागत सिंगापुरी नाश्ता परोसा जाता था. इसमें शामिल होता था अंडा, कॉफ़ी और नारियल से बने जैम और केवड़े के पत्ते वाला टोस्ट.

पैतृक व्यवसाय

क़रीब 60 साल तक दुकान चलाने के बाद कुन बीमार पड़ गए. तब लोई को लगा कि अगर पैतृक व्यवसाय बंद हो गया तो, यह काफी शर्मनाक होगा.

उनके सब भाई-बहन उनसे आयु में बड़े थे. उनकी सबसे बड़ी बहन उनसे 20 साल बड़ी थीं. लेकिन वो व्यवसाय चलाने की इच्छुक नहीं थीं.

लोई ने अपने पिता और ग्राहकों के बीच के सहज संबंध को देखा था. इसलिए वो इसे ज़िंदा रखना चाहते थे.

एक दिन वो और उनके भाई एलगी ने हिम्मत कर पिता से पूछा कि क्या वो उनकी दुकान को चला सकते हैं.

उनके पिता न कहा, हाँ क्यों नहीं. लेकिन यह बहुत ही कठिन काम है.

इसका जवाब दोनों भाइयों ने हाँ में दिया.

दुकान का विस्तार

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साल 1998 में दुकान का कार्यभार संभालने के बाद ही उन्हें लाऊ पा सैट के निर्माण की वजह से उन्हें दुकान को कहीं और ले जाना पड़ा.

इसके बाद उन्होंने अपनी दुकान का नाम बदलकर या कुन काया टोस्ट कर दिया और उसे चलाने के लिए 10 हज़ार सिंगापुरी डॉलर उधार लिया.

नई दुकान की प्रचार सामग्री में लोई के पिता के 1926 में चीन के हिन्ना प्रांत से एक नाव से भागकर सिंगापुर आने की कहानी पर प्रकाश डाला गया. इसमें यह बताया गया कि एक सहायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने कैसे अपनी दुकान खोली.

अच्छा-ख़ासा पैसा खर्च कर एक हज़ार वर्ग फ़ुट की नई दुकान लेने से वो काफी चिंतित थे.

शुरुआती सफलता के बाद उन्होंने यह जानने के लिए कि कंपनी के विकास के लिए बाहरी निवेश की ज़रूरत है या नहीं एक कंसल्टेंट की सेवाएं लीं.

दुकान पर अपना मालिकाना हक़ थोड़ा कम करने की जगह सिंगापुर सरकार से मदद के लिए आवेदन करने का फ़ैसला लिया. एक भागीदार और भाई की हिस्सेदारी कम करने के बाद इस समय उनकी 75 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.

फ्रेंचाइजी की लाइन

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सरकारी सहायता ने उन्हें फ़्रेंचाइजी खोजने में मदद की. छह महीने में ही उनके पास चार सौ आवेदन आए.

इसके बाद से वो अबतक सिंगापुर में 50 या कुन काफ़ी शॉप और दुनिया के अन्य देशों में 49 दुकानें खोल चुके हैं.

पिछले साल उनकी कंपनी ने ढाई करोड़ सिंगापुरी डॉलर का कारोबार किया. यह 1998 में लोई के दुकान संभालने के समय के कारोबार से क़रीब दो हज़ार फ़ीसद अधिक है.

लोई कहते हैं कि सिंगापुरी खाने की एक विशेषता ने कंपनी के विस्तार में काफ़ी योगदान किया है.

वो कहते हैं ,'' सिंगापुर में अधिकांश लोग एक दिन में पांच बार खाते हैं, इसमें शामिल होता है, नाश्ता, दोपहर का खाना, दोपहर बाद की चाय, शाम का खाना और रात का खाना. इसलिए वो हर बार कॉफ़ी के लिए आते हैं.''

या कुन का खाना

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इस सफलता ने या कुन को आज घर-घर में जाना जाने वाला नाम बना दिया है. एक ब्लॉगर ने हाल में लिखा था, '' क्या यहाँ कोई ऐसा भी व्यक्ति है, जिसने या कुन में खाया न हो.''

वो कहते हैं, हम मजाक में कहते हैं कि अगर उनके पिता यह देख लें कि उनकी मशहूर दुकान कहाँ से कहाँ पहुँच गई है, तो वो फिर ज़िदा हो जाएंगे.

लोई के 28 साल के बेटे अभी हाल में ही सिंगापुर लौटे हैं. लोई कहते हैं, '' अपने बेटे को वह धीरे-धीरे अपने ज्ञान और कौशल को देना चाहते हैं, जिससे एक दिन वह मेरा व्यवसाय संभाल सके.''

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