'पाकिस्तान से प्यार, लेकिन लौटकर नहीं जाऊंगा'

मसूद अहमद, ब्रितानी-पाकिस्तानी

पाकिस्तान में ख़ुद को 'मुसलमान बताने' के आरोप में जेल भेज दिए ब्रितानी नागरिक मसूद अहमद ने ब्रिटेन लौटने के बाद पहली बार मीडिया से बात की है.

73 साल के मसूद अहमद को पिछले साल नवंबर में पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन वो ज़मानत पर छूटने के बाद फ़रार होकर ब्रिटेन लौट आए.

मसूद पाकिस्तान के अल्पसंख्यक अहमदिया समुदाय से संबंध रखते हैं. इस समुदाय को पाकिस्तान में ग़ैरमुस्लिम माना जाता है.

अहमदिया समुदाय को 1974 में पाकिस्तान सरकार ने आधिकारिक तौर ग़ैर-मुस्लिम घोषित कर दिया था क्योंकि ये समुदाय मानता है कि पैगंबर मोहम्मद के बाद एक मसीहा भी धरती पर आ चुके हैं. हालांकि समुदाय मानता है कि पैगंबर का दर्जा इस मसीहा से बड़ा है.

पाकिस्तान में इस समुदाय पर लगाए गए प्रतिबंधों में सार्वजनिक रूप से कुरान न पढ़ना भी है.

पिछले साल दो नौजवान मसूद अहमद के लाहौर स्थित होम्योपैथिक क्लिनिक में मरीज़ बनकर गए थे. उन्होंने उनसे धर्म संबंधित सवाल पूछने शुरू कर दिए.

'चोरी से बनाया वीडियो'

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Image caption मसूद अहमद को जिस थाने में रखा गया था उसे तक़रीबन 400 लोगों ने घेर लिया था.

अहमद ने उन से कहा, "काम के दौरान मैं धर्म पर बात करने को मैं ठीक नहीं समझता. मैं यहाँ केवल लोगों की मदद के लिए आया हूँ. लेकिन वो युवक बार-बार ज़ोर देकर इस्लाम के बारे में सवाल पूछता रहा."

उन युवाओं ने अपने मोबाइल फ़ोन से चोरी से अहमद की कुरान पढ़ते हुए वीडियो बना लिया और फिर पुलिस को बुला लिया.

मसूद अहमद 1960 में ब्रिटेन में आए थे. 1982 में पाकिस्तान लौटने से पहले वो ब्रिटेन में घड़ी बनाने की दुकान चलाते थे.

अहमद का नौ साल का पोता है जो उनके बच्चों के साथ ग्लासगो में रहता है. अहमद को जिस जेल में रखा गया था उसमें अन्य क़ैदी भी थे. उन क़ैदियों को भी ईशनिंदा के आरोप में जेल में रखा गया था.

अहमद बताते हैं, "यह एक छोटी सी कोठरी थी. इसका आकार आठ फीट गुना 12 फीट था. इस कमरे के बीच में एक शौचालय था. हमें फर्श पर सोना होता था. इस कोठरी में रात को तापमान एक डिग्री होता था."

थाने का घेराव

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Image caption पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून पर कड़ाई से अमल होता है.

जब अहमद को गिरफ़्तार किया गया तो पुलिस थाने के बाहर तक़रीबन 400 लोग इकट्ठा हो गए थे.

अहमद बताते हैं, "थाने के बाहर आए लोग चिल्ला रहे थे, मार दो, मार दो. लेकिन मैं डरा नहीं."

ज़मानत के बाद अहमदिया समुदाय ने अहमद की पाकिस्तान से भागने में मदद की. अहमद तीसरे प्रयास में पाकिस्तान से निकलने में सफल रहे.

पुलिस ने उनकी यात्रा पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था. चूंकि उनके पास पाकिस्तान और ब्रिटेन दोनों देशों की नागरिकता थी इसलिए वो ब्रिटेन वापस आने में सफल रहे.

अहमद बताते हैं, "पाकिस्तान में मैं अब भी वांछित हूँ. पाकिस्तान में अहमदियों के साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाता है. मैं अब वहाँ वापस नहीं जा सकता. वहाँ के मुल्ला (धर्मगुरु) इस बात पर दांत पीस रहे हैं कि मैं भाग कैसे गया."

वे बताते हैं, "पाकिस्तान में अहमदिया लोगों को अपना धर्म इस्लाम बताने पर तीन साल तक की सज़ा हो सकती है. ऐसे लोगों पर धार्मिक प्रवचन देने और 'मुस्लिमों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने' का आरोप लगाया जाता है."

ईशनिंदा का क़ानून

Image caption ईशनिंदा की दोषी एक ईसाई महिला के पक्ष में बयान देने पर पंजाब के राज्यपाल की उनके अंगरक्षक ने हत्या कर दी थी.

पाकिस्तान में ईशनिंदा के क़ानून पर बहुत कड़ाई से अमल किया जाता है.

पिछले महीने एक ईसाई सफाईकर्मी को अपने एक मुस्लिम दोस्त के साथ बहस के दौरान पैगंबर मोहम्मद के लिए अपशब्द प्रयोग करने के लिए फांसी की सज़ा दी गई थी.

साल 2011 में ही पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के राज्यपाल सलमान तासीर के एक अंगरक्षक ने उनकी हत्या कर दी थी.

तासीर ने 66 वर्षीय ईसाई महिला असिया बीबी को ईशनिंदा के तहत मौत की सज़ा दिए जाने के बाद इस क़ानून में बदलाव की ज़रूरत की बात कही थी.

32 साल बाद ब्रिटेन लौटे अहमद कहते हैं, "पाकिस्तान मेरी मातृभूमि है और आप अपनी माँ को हमेशा प्यार करते हैं. लेकिन यहाँ पर मुझे आज़ादी मिलती है, जो कि बहुत ज़रूरी है. मैं अपने देश को प्यार करता हूँ लेकिन मैं वापस नहीं जा सकता. अगर मैं गया तो या तो मुझे जेल में डाल दिया जाएगा या मुझे मार दिया जाएगा"

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