नौसैनिक केस: इटली का 'अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता' पर विचार

  • 4 मई 2014
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साल 2012 में हुई दो भारतीय मछुआरों की हत्या के अभियुक्त इतालवी नौसैनिकों के मामले में एक नया मोड़ आ गया है.

द्विपक्षीय कोशिशों के नाकाम हो जाने के बाद इटली अब इस मसले पर गंभीरता से अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पर विचार कर रहा है. यह बात गुरुवार को इटली के रक्षा मंत्री फेडेरिक मोगरिनी ने कही.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार रक्षा मंत्री फेडेरिक मोगरिनी ने इटली की सीनेट में कहा, “इस मामले में अब दोतरफ़ा कोशिशों की कोई संभावना नहीं बची है. इसलिए हमारे पास अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की मदद लेने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं रह गया है.”

इटली के दो नौसैनिकों पर दो भारतीय मछुआरों की हत्या का मामला चल रहा है. 2012 के इस मामले में इतालवी नौसैनिकों का कहना है कि उन्होंने इन मछआरों को समुद्री डाकू समझ लिया था.

एएनएसए समाचार एजेंसी ने मोगरिनी के हवाले से बताया है कि इटली भारत की अदालत में इस मामले की सुनवाई के तरीक़े को 'वैध' नहीं मानता.

वे आगे कहती हैं, “हम भारत की अदालती कार्रवाई की वैधता को मान्यता नहीं देते, इसलिए हमें इससे कोई उम्मीद नहीं है.”

मोगरिनी ने आगे कहा, “हम एक समन्वयक की अगुवाई में विशेषज्ञों का एक दल बना रहे हैं, जो इस मामले में अगला क़दम उठाएगा.”

सुनवाई का इंतज़ार

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फ़रवरी, 2012 में केरल के समुद्र तट के पास हुई दो भारतीय मछुआरों की हत्या के अभियुक्त इतालवी नौसैनिकों मसीमिलियानो लातोर और सल्वातोर गिरोन इस मामले में सुनवाई का इंतज़ार कर रहे हैं.

एक इतालवी तेल टैंकर की सुरक्षा में तैनात इन नौसैनिकों का अपनी सफ़ाई में कहना था कि उन्होंने मछुआरों को ग़लती से समुद्री डाकू समझ लिया था.

ये नौसैनिक फ़िलहाल नई दिल्ली स्थित इतालवी दूतावास में रहते हुए अदालती सुनवाई का इंतज़ार कर रहे हैं.

इटली ने भारत से लातोर और गिरोन को घर वापस भेजने और सारा मामला ख़त्म करने का निवेदन किया है.

मौत की सज़ा नहीं

इटली इस बार पर ज़ोर देता रहा है कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय सीमा में हुई थी इसलिए नौसैनिकों पर इटली में मुक़दमा चलाया जाना चाहिए.

31 मार्च को बुलाई गई एक विशेष अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए 31 जुलाई का दिन तय किया है.

दोनों नौसैनिकों ने मुक़दमा चलाने और मामले की जांच करने के नेशनल इंवेस्टीगेटिंग एजेंसी (एनआईए) के अधिकार को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की थी. इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार की ओर से जवाब मिल गया है.

नौसैनिक भारत सरकार का फ़ैसला आने के एक महीने से भी ज़्यादा समय बीतने के बाद सुप्रीम कोर्ट गए. इस फ़ैसले में एंटी-पायरेसी क़ानून (एसयूए) के तहत अभियोग पक्ष को वापस बुलाने का निर्णय लिया गया था. एसयूए क़ानून के तहत दोष साबित हो जाने पर अधिकतम सज़ा मौत है.

24 फ़रवरी को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि दोनों नौसैनिकों के ख़िलाफ़ एंटी-पायरेसी क़ानून (एसयूए) के तहत मामला नहीं चलाया जाएगा. यानी दोषी पाए जाने पर भी इतालवी नौसैनिकों को मौत की सज़ा नहीं मिलेगी.

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