हामिद मीर के हमले के बाद पाकिस्तानी मीडिया का भविष्य

हामिद मीर के समर्थन में प्रदर्शन, पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट AP

जियो टीवी के एंकर हामिद मीर पर कराची में हुए हमले और उसके बाद हुए शोर-शराबे के बाद पाकिस्तान में मीडिया के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएँ जताई जाने लगी हैं.

इस हमले के बाद पत्रकारों में इसे लेकर काफ़ी ग़ुस्सा था लेकिन कुछ टिप्पणीकारों ने जियो न्यूज़ के प्रसारण की कुछ गंभीर खामियों की ओर भी इशारा किया है.

हमले के बाद हुए हंगामे से मीडिया के बीच एकता का अभाव भी जाहिर हुआ और यही जंग/जियो मीडिया समूह के लिए सबसे बड़ी बाधा है.

हामिद मीर जियो टीवी के सबसे लोकप्रिय प्राइम टाइम शो 'कैपिटल टॉक' के एंकर थे. वो कराची एयरपोर्ट से अपनी कार में निकले ही थे कि उन पर जानलेवा हमला हुआ और वो गंभीर रूप से घायल हो गए.

उनके भाई और जंग/जियो मीडिया समूह के ही पत्रकार आमिर मीर ने आरोप लगाया कि इस हमले की योजना पाकिस्तान की इंटर-सर्विस इंटेलीजेंस (आईएसआई) ने बनाई थी.

प्रतिबंध

Image caption हामिद मीर की फ़ाइल फ़ोटो

पाकिस्तान सेना की पब्लिक रिलेशन एजेंसी आईएपीआर ने इन आरोपों से इनकार किया. देश के रक्षा मंत्रालय ने पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी (पीईएमआरए) में जियो टीवी की शिकायत दर्ज कराई.

इस शिकायत में जियो टीवी का लाइसेंस रद्द करने की मांग की गई है. मंत्रालय ने आरोप लगाया है कि जियो टीवी ने हामिद मीर पर हुए हमले के मामले में सेना विरोधी सामग्री प्रसारित की.

पीईएमआरए ने चैनल का लाइसेंस बंद करने के बारे में अभी कोई फ़ैसला नहीं लिया है लेकिन जंग समूह को सेना जैसी मजबूत संस्था के विरोध के परिणाम का अहसास अभी से होने लगा है.

पाकिस्तानी मीडिया में आ रही रिपोर्ट के अनुसार सेना परिसर में जंग/जियो मीडिया समूह के प्रकाशनों पर रोक लगा दी गई है. इस समूह के चैनलों जियो न्यूज़, जियो एंटरटेनमेंट, जियो सुपर पर भी रोक लगा दी गई है.

ख़बरों को अनुसार इंडिपेंडेंट मीडिया कॉरपोरेशन के सभी प्रकाशनों पर सभी सैन्य कार्यालयों, मैसों और यूनिटों में एक साथ प्रतिबंध लगा दिया गया है. इस समूह के पास जंग ग्रुप ऑफ़ न्यूज़पेपर्स और जियो न्यूज़ नेटवर्क का मालिकाना हक़ है.

पाकिस्तान टुडे में 23 अप्रैल को छपी ख़बर के अनुसार ये निर्णय "पाकिस्तानी सेना और आईएसआई एजेंसी को बदनाम करने के लिए एक मीडिया समूह की तरफ़ से चलाए जा रहे प्रोपगैंडा" को देखते हुए लिया गया है.

परेशानी

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ये प्रतिबंध ही सब कुछ नहीं हैं. सेना केबल ऑपरेटरों में अपने प्रभाव का प्रयोग अन्य तरीक़ों से जियो न्यूज़ प्रबंधन को परेशान करने के लिए करती रही है.

हामिद मीर पर हुए हमले के बाद कई प्रमुख शहरों में जियो न्यूज़ को केबल टेलीविज़न सेट में उसके परंपरागत स्लॉट से हटा दिया गया था.

वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार उमर क़ुरैशी ने 25 अप्रैल को ट्वीट किया, "कराची के सबसे बड़े केबल ऑपरेटरों में से एक वर्ल्ड कॉल ने जियो न्यूज़ को नंबर 11 से 67 पर धकेल दिया है."

इसके ठीक बाद मध्य इस्लामाबाद में आईएसआई की तारीफ़ वाले पोस्टर नज़र आए जिन पर एजेंसी के प्रमुख जनरल इस्लाम की तस्वीर लगी थी. कुछ धार्मिक संगठनों ने आईएसआई के समर्थन में रैलियाँ आयोजित करनी शुरू कर दीं जबकि इन रैलियों में शामिल कुछ संगठनों पर देश में प्रतिबंध लगा हुआ है.

पेशेवर रुख

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पत्रकार संगठन हामिद मीर के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन कुछ मीडिया वाले जियो न्यूज़ समेत सभी टीवी चैनलों के पेशेवर रुख़ में आती गिरावट पर भी सवाल उठा रहे हैं.

जंग समूह के लिए काम करने वाले कुछ पत्रकारों सहित कुछ अन्य टिप्पणीकारों ने मीर को मारने की कोशिश की ख़बर के साथ आईएसआई प्रमुख की तस्वीर दिखाए जाने की आलोचना की है. मीर के भाई ने आईएसआई प्रमुख के ऊपर आरोप लगाया था. चैनल ने यह ख़बर इसी तरह घंटों तक चलाई थी.

जो लोग अपने लेखन में नियमित तौर पर आईएसआई की आलोचना करते रहते रहे हैं उन्हें भी लगता है कि चैनल का आईएसआई प्रमुख को अपराधी दिखाते हुए निजी हमला करना ज़ल्दबाज़ी भरा अपरिपक्व निर्णय था.

पूर्व सांसद अयाज़ आमिर का स्तंभ जंग और समूह के अंग्रेजी अख़बार द न्यूज़ में हर हफ़्ते प्रकाशित होता है. अयाज ने मीडिया से कहा, "उन्होंने इसे सही से नहीं संभाला. वो आईएसआई पर ग़लत कारणों से हमला कर रहे हैं. उनके पास कोई सबूत नहीं है."

पाकिस्तानी अख़बार डॉन ने 24 अप्रैल को प्रकाशित अपने संपादकीय में लिखा, "हामिद मीर पर हमले के बाद जियो न्यूज़ का प्रसारण अति भावुक, अतिश्योक्तिभरा और आरोप मढ़ने वाला था. यह प्रसारण पूरी तरह भटका हुआ था और यह एक ज़िम्मेदार मीडिया की सर्वश्रेष्ठ मानकों से काफ़ी दूर था."

गोलबंदी

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मुशर्रफ़ के शासनकाल में पत्रकार सेना के उन पर दबाव बनाने के ख़िलाफ़ एकजुट दिखते थे. लेकिन प्रमुख स्टशनों के मालिकों के बीच की होड़ ने मीडिया को आपस में बांट दिया.

कुछ प्रतिद्वंदी स्टेशनों ने इस विवाद का उपयोग जियो और मीर की नीयत पर सवाल उठाने के लिए किया. एक स्टेशन एआरवाई ने यहाँ तक कह दिया कि गोलीबारी की यह घटना एक पब्लिसिटी स्टंट है.

दी एक्सप्रेस ग्रुप ने जियो की "पाकिस्तान की प्रमुख इंटेलीजेंस एजेंसी के ख़िलाफ़ दुर्भावनापूर्ण और बदनाम करने वाला कार्यक्रम" चलाने के लिए आलोचना की है.

एक्सप्रेस की यह आलोचना उम्मीद के अनुरूप ही है. जंग समूह के मालिक शकील-उर-रहमान और जंग से छोटे समूह दी एक्सप्रेस मीडिया समूह के मालिक सुल्तान लखानी के बीच संबंध अच्छे नहीं रहे हैं. एक्सप्रेस समूह भी एक टीवी चैनल चलाता है जो पहले पायदान के लिए जियो न्यूज़ को कड़ी टक्कर देता है.

एआरवाई के मालिक सोने का कारोबार करते हैं. वो भी रहमान को ज़्यादा पसंद नहीं करते.

चेतावनी

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मीडियाकर्मी थोड़े सावधान हो गए हैं. वो सभी मीडिया समूहों को एकजुट होने के लिए कह रहे हैं ताकि मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके.

जंग समूह के अंग्रेजी अख़बार द न्यूज़ में 30 अप्रैल को प्रकाशित अपने एक लेख में शाहीन शहबाई ने लिखा, "जब मीडिया को हामिद मीर के हमलावरों के ख़िलाफ़ एकजुट होना चाहिए तब इस बात पर उठापटक शुरू हो गई है कि इस घटना की कवरेज कैसे की गई. अगर संपादकीय फ़ैसले लेने में कोई भावुकता थी तो बाद में लोगों की प्रतिक्रिया मिलने के बाद उसे सही कर लिया गया. लेकिन कुछ लोग सच स्वीकार नहीं करना चाहते."

उन्होंने लिखा कि इससे ज़्यादा गंभीर रवैया यह होता कि मीडिया के सभी संगठनों को आईएसआई के साथ बैठकर इन सभी मुद्दों को किनारे करके आरोप-प्रत्यारोप मढ़ने के बजाय इस मामले को हल करने के लिए प्रयास करना चाहिए.

निष्कर्ष

मीर पर हुआ हमला साल 2011 में हुई सलीम शहज़ाद की मौत की ही एक कड़ी है. जियो न्यूज़ पर जो दबाव है वो हमें पीईएमआरए की कैपिटल टीवी के ख़िलाफ़ अप्रैल, 2013 में की गई कार्रवाई की याद दिलाती है. कैपिटल टीवी पर एक मेहमान ने एक टॉक शो में उस वक़्त के सेना प्रमुख जनरल कयानी के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया था.

चैनल के मालिक अहमद रियाज़ शेख पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी के अच्छे मित्र हैं लेकिन उनके चैनल को बग़ैर किसी जाँच के बंद कर दिया गया. कुछ दिनों बाद चैनल का प्रसारण दोबारा तभी शुरू हो पाया जब चैनल के अधिकारियों ने सेना से लिखित रूप से माफ़ी मांगी.

चाहे जो भी हो जियो को सरकार का समर्थन प्राप्त है और इसी कारण यह अभी प्रसारित हो रहा है. मीडिया के जानकार मानते हैं जियो आईएसआई के ख़िलाफ़ जो कैंपेन चला रहा है वो एक बहुत ही ख़तरनाक क़दम है.

शायद यही वजह है कि जियो टीवी का प्रबंधन एक तुष्टिकरण कैंपेन चला रहा है जिसमें चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध में सेना की भूमिका को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है. दूसरी तरफ़ चैनल पीईएमआरए की कार्रवाई से बचने के लिए न्यायपालिका के हस्तक्षेप की भी कोशिश में है.

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