सुधर रहे हैं अमरीका-पाकिस्तान रिश्ते?

  • 15 मई 2014
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इमेज कॉपीरइट Getty

अमरीका में इन दिनों न तो पाकिस्तान पर तीखी बहस होती है, न ही राष्ट्रपति बराक ओबामा के बयानों में पाकिस्तान का ज़िक्र आता है.

तीन साल पहले पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन के ख़िलाफ़ अमरीकी कार्रवाई के बाद दोनों देशों के रिश्ते टूट से गए थे.

रही-सही कसर उस अमरीकी हमले ने पूरी कर दी जिसकी चपेट में आकर 25 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे और जवाब में पाकिस्तानी सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान जाने वाले नैटो के ट्रकों की आवाजाही पर रोक लगा दी थी.

आज सतही तौर पर देखें तो लगता है रिश्ते सामान्य हो रहे हैं. विदेश विभाग और रक्षा विभाग कई मामलों पर पाकिस्तान के साथ काम करते नज़र आ रहे हैं.

ऊर्जा, व्यापार और आतंकवाद पर कई वर्किंग ग्रुप बन गए हैं और उनकी बैठकें होती रहती हैं.

लेकिन अमरीकी कांग्रेस जिसके पास सही मायने में खज़ाने की चाभी है पाकिस्तान के मामले पर खामोश नज़र आती है.

पनाह देने का इल्जाम

इसी कांग्रेस में साल डेढ़ साल पहले तक पाकिस्तानी फ़ौज और ख़ुफ़िया एजेंसियों की सख़्त आलोचना होती थी, अल क़ायदा को पनाह देने का इल्ज़ाम लगता था, चरमपंथी संगठन हक्कानी नेटवर्क को आईएसआई की शाखा कहा जाता था.

अब वो आवाज़ें भी शायद ही कभी सुनाई देती हैं.

तो क्या पाकिस्तान अमरीका की हर ख़्वाहिश पूरी कर रहा है या फिर नवाज़ शरीफ़ की हुकूमत के साथ संबंध इतने बेहतर हो गए हैं कि सार्वजनिक तौर पर उंगली नहीं उठाई जाती?

अमरीका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी कहते हैं कि एक साल पहले तक वाशिंगटन में ये ख़्वाहिश बाक़ी थी कि पाकिस्तान को अपनी नीतियां बदलने के लिए राज़ी कर लिया जाए लेकिन अब ये सोच हावी हो चुकी है कि वहां बहुत जल्द कुछ बुनियादी तब्दीली नहीं आने वाली है.

वो कहते हैं,''जब पाकिस्तान की आलोचना की जाती थी तो ये सोचकर की उसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान बदलेगा, लेकिन अब धीरे-धीरे एक उदासीनता सी छा रही है पाकिस्तान के बारे में.''

मदद में कटौती

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पाकिस्तान के लिए किसी नए अनुदान की बात तो दूर, पहले से घोषित आर्थिक मदद में भी कटौती की बातें हो रही हैं.

हुसैन ह्क्कानी का कहना है कि अमरीका में अब एक बहुमत है जो पाकिस्तान को दोस्त नहीं मानता.

वो कहते हैं, ''जब मैं राजदूत था तो ये बार-बार कहता था कि हमें ऐसा नहीं होने देना चाहिए क्योंकि इससे हमारा नुक़सान होगा. अब जिस ख़तरे की घंटियां हम बजाते थे, वो ख़तरा आ गया है.''

पांच साल पहले कांग्रेस ने पाकिस्तानी लोकतंत्र को मज़बूत करने और उसे आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए पांच साल तक डेढ़ अरब डॉलर देने का एलान किया था.

उस रकम में से अब तक 50-60 प्रतिशत ही पाकिस्तान को मिला है और जिस केरी लूगर बर्मन बिल के तहत ये आर्थिक मदद देना तय हुआ था उसकी मियाद इस साल ख़त्म हो रही है.

कांग्रेस के सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि उसकी मियाद को बढ़ाए जाने के आसार भी अब नहीं नज़र आ रहे हैं.

सबसे बड़े हिमायती

कांग्रेस के चार सदस्य जो इसके सबसे बड़े हिमायती थे—जॉन केरी, जो बाइडन, रिचर्ड लूगर और हावर्ड बर्मन—उनमें से कोई अब कांग्रेस में नहीं है.

विदेश विभाग ने इस बिल के तहत मौजूदा बजट में पाकिस्तान के लिए कांग्रेस से जितनी रकम की मांग की है वो पिछले साल से भी कम है और उस रकम को मंज़ूर करने के लिए भी कांग्रेस की शर्तों की लिस्ट लंबी होती जा रही है.

ग़ौरतलब है कि अब पाकिस्तानी हुकूमत को भी ये अंदाज़ा हो रहा है कि अनुदान में कटौती हो सकती है.

वाशिंगटन में पाकिस्तान में राजूदत जलील अब्बास जिलानी ने बीबीसी को बताया कि अब कोशिश हो रही है कि जो रकम पाकिस्तान को नहीं मिली उसे ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में विकास के लिए दे दिया जाए.

वाशिंगटन का दौरा कर रहे पाकिस्तानी वाणिज्य मंत्री खुर्रम दस्तगीर ख़ान का भी कहना है कि उनका देश अब अनुदान की मांग नहीं कर रहा, वो चाहते हैं व्यापार के क्षेत्र में पाकिस्तान को छूट मिले और अमरीकी बाज़ारों तक उसकी पहुंच बढ़े.

शिकवे शिकायत की गुंजाइश

अमरीकी सेनेट में पांच साल पहले पाकिस्तान के आर्थिक पैकेज पर जॉन केरी के सहायक रह चुके जोना ब्लैंकस का कहना है कि अब रिश्ते ऐसे होंगे जहां शिकवे शिकायत की गुंजाइश कम होगी.

वो कहते हैं, ''अमरीका को पाकिस्तान से वो नहीं मिल रहा जो वो चाहता है, पाकिस्तान की भी ख़्वाहिशें नहीं पूरी हो रहीं. ऐसे में एक ऐसा रिश्ता जहां 40 से 60 प्रतिशत उम्मीदें दोनों तरफ़ से पूरी हों, एक अच्छा रिश्ता कहलाएगा.''

विश्लेषकों का ये भी कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाद अमरीका पाकिस्तान से मुंह तो नहीं फेरेगा लेकिन मुमकिन है कि वो अपनी उम्मीदें इतनी कम कर ले कि दोनों के बीच सिर्फ़ एक सौदे का रिश्ता रह जाए.

लेकिन हुसैन ह्क्कानी के शब्दों में, ''अब इस सौदे के भाव में भी तब्दीली आने वाली है और जो सौदा होगा वो भी बहुत छोटा और बेहद मामूली.''

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