लाइक के चक्कर में 'लाइफ़' गई हाथ से..

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मैं वॉशिंगटन में फ़ॉगी बॉटम मेट्रो स्टेशन के सामने सड़क पार करने के लिए खड़ा हूं. ट्रैफ़िक लाइट अभी हरी है, लाल का इंतज़ार कर रहा हूं. अचानक दूसरी तरफ़ रेड वाइन की तरह सुर्ख़ लाल ड्रेस, लाल हाई हील्स में खड़े ख़ूबसूरत चेहरे पर नज़र पड़ती है. वो मेरी तरफ़ देखे जा रही है, मुस्करा भी रही है.

ऐसा तो जवानी के दिनों में भी नहीं हुआ, अब तो उम्र जावेद मियांदाद की तरह हर गेंद पर एक-एक रन चुराकर हाफ़ सेंचुरी की ओर बढ़ रही है.

अपने पीछे देखता हूं कि शायद किसी और को देखकर मुस्करा रही होगी. लेकिन पीछे कोई नहीं है. अब तो बस मैं ही मैं हूं.

बत्ती हरी हो जाती है. वो मुस्कराती हुई मेरी तरफ़ आ रही है. मैंने सड़क पार करना मुनासिब नहीं समझा है, इंतज़ार कर रहा हूं. वो आती है, बगल से निकल जाती है.

एक बित्ते भर के खिलौने ने खेल कर दिया मेरे साथ. वो लाल परी अपने मोबाइल पर थी, ईयरफ़ोन पर किसी और की बातों पर मुस्करा रही थी.

आप हंस रहे होंगे मेरे हाल पर. अगर नौजवान हैं आप तो हंस लें क्योंकि मेरे साथ तो जो होना था हो लिया, आपका हाल तो बहुत बुरा होने वाला है.

अमरीका में यह बीमारी फैल चुकी है, हमेशा की तरह कुछ दिनों में आप तक भी पहुंचेगी.

नन्हे से खिलौने की करामात

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जहां मैं खड़ा था, वहां से जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी कुछ ही दूर है. ख़ूबसूरत जवान चेहरे आ-जा रहे हैं, लेकिन सब की नज़र उस बित्ते भर के खिलौने पर ही है. कोई किसी से नज़रें नहीं मिला रहा. न ही आसपास देख रहा है. पूरी दुनिया उस खिलौने के अंदर सिमटी हुई है.

25 सालों से वहां कोने पर चलने वाली मैगज़ीन और अख़बार की दुकान ने हमेशा के लिए शटर गिराने में ही भलाई समझी है. कोई दुकान के अंदर या बाहर लटकी पत्रिकाओं को देखे तब तो कुछ बिके.

लेकिन यह तो इस खिलौने की छोटी सी करामात है. इनका कहर ऐसा बरपा है कि कई शहरों में अब कुंवारों की तादाद बढ़ने लगी है.

किसी ने कविता भी लिखी है इस पर. कह सकता था मैंने लिखी है लेकिन कहीं आपने इस बित्ते भर के खिलौने के ज़रिए यू ट्यूब पर सर्च मार दिया तो पकड़ा जाऊंगा. तो अनु मलिक की तरह इम्प्रोवाइज़ करके उसका निचोड़ सुना देता हूं.

कहानी शुरू ही नहीं हुई

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ट्रैफ़िक की बत्ती लाल है. एक लड़का और एक लड़की सड़क पार कर रहे हैं. दोनों की नज़रें मिलती हैं, दोनों आगे बढ़ जाते हैं, पीछे से बैकग्राउंड म्यूज़िक बजता है.. एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ऐंड सो ऑन.

किसने बजाया? आप सवाल बहुत पूछते हैं! हिंदी फ़िल्मों में हमेशा से बैकग्राउंड म्यूज़िक बजता आया है यार, तो समझ लें यहां भी बज गया.

ख़ैर, लड़का और लड़की बैकग्राउंड म्यूज़िक के बाद एक-दूसरे को पलटकर देखते हैं, मुस्कराते हैं, इश्क होता है, पार्क में मिलते हैं, छोले-भटूरे खाते हैं, कुछ दिनों में शादी करते हैं और फिर दे लिव्ड हैपिली एवर आफ़्टर. दी एंड.

अब बित्ते भर के इस खिलौने ने क्या किया है, यह सुनिए.

लड़का-लड़की सड़क पार कर रहे हैं, बैकग्राउंड म्यूज़िक बजता है. लेकिन दोनों ही ने ईयरफ़ोन लगा रखे हैं, कुछ सुनाई नहीं देता. नज़रें मोबाइल पर हैं, कुछ दिखाई नहीं देता. पलटकर दोनों में से कोई नहीं देखता, मुस्कराना तो दूर की बात है. बस कहानी वहीं खत्म. दी एंड.

लाइफ़ गई हाथ से

लड़का अपने कमरे में फ़ेसबुक पर जाकर कुछ लाइक करेगा, लड़की कुछ और लाइक करेगी. लाइक के चक्कर में लाइफ़ गई हाथ से.

आपने शायद जॉर्ज ऑरवेल की किताब '1984' पढ़ी हो. उसमें एक ऐसे दौर की तस्वीर है, जहां हर आदमी के हर पल पर कोई नज़र रख रहा है, दफ़्तर, घर, गर्लफ्रेंड, टीवी, हर चीज़ पर किसी अंजान की नज़र है.

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यह खिलौना तो इतना दबंग है कि इंसान को डंके की चोट पर अपनी पकड़ में लेता है.

लोग कोयल की कूक अब बाग़ों में नहीं, मोबाइल रिंगटोन में सुनते हैं, एक ही छत के नीचे रहने वाले मियां-बीवी एक दूसरे को शादी की सालगिरह की मुबारकबाद भी इसी खिलौने के ज़रिए फ़ेसबुक पर देते हैं.

बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी इसके शिकंजे में आ चुके हैं. राहुल गांधी का करियर ख़राब हुआ बस इसलिए क्योंकि इसी खिलौने में घुसे रहते थे. बड़े-बूढ़ों की बात सुनने की फ़ुर्सत ही नहीं थी. मोदी शातिर निकले. खिलौने का इस्तेमाल किया और फिर किनारे रख दिया. देखना है कब तक पूरी तरह से इसकी चपेट में आने से बचते हैं.

ओबामा तो एक बार इसकी चपेट में आ भी चुके हैं. डेनमार्क की प्रधानमंत्री के साथ सेल्फ़ी ले रहे थे. मिशेल ओबामा के चेहरे से ही दुनिया को पता चल गया था कि घर जाकर क्या हाल हुआ होगा.

ख़ैर, आप भी ज़रा मोबाइल से नज़रें हटाएं, कहीं और नज़र मिलाएं. बस जाते-जाते इस डायरी को लाइक कर दीजिएगा या फिर ट्वीट कर दीजिएगा. ट्विटर हैंडल है @brajup

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