चीन के शिनजियांग में क्यों भड़क रही है हिंसा?

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चीन के शिनजियांग क्षेत्र के विशेषज्ञ डॉक्टर माइकल क्लार्क, इस क्षेत्र में बढ़ती हिंसा के उन कारकों की पड़ताल कर रहे हैं, जो इस हिंसा के पीछे बदलती रणनीति को दर्शाता है.

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली के अनुसार, हान बहुल इलाके उरुमचि के शायीबेक ज़िले के एक खुले बाज़ार में 22 मई को हुआ हमला दिखाता है कि 'वीगर चरमपंथ तेज़ी से' फैल रहा है. इस हमले में 31 लोग मारे गए थे जबकि 94 लोग घायल हो गए थे.

यह ताज़ा हमला हिंसा की उन घटनाओं के बाद हुआ है, जो इस वर्ष शिनजियांग और वीगर से जुड़ी हुई हैं. इनमें एक मार्च को कुनमिंग रेलवे स्टेशन पर चाकू से हुए हमले और 30 अप्रैल को उरुमचि के रेलवे स्टेशन पर चाकू और बम से हमले भी शामिल हैं.

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हालिया हमले की घटनाओं का जो ढर्रा है, वह दर्शाता है कि चीनी शासन के ख़िलाफ़ वीगर विपक्ष का तेज़ी से प्रसार और यहां तक कि उसका चरमपंथीकरण हो रहा है.

शिनजियांग में छोटे पैमाने पर हुई हिंसा की पिछली घटनाओं के उलट सार्वजनिक स्थलों को निशाना बनाने वाली हिंसा की ताज़ा घटनाएं इस तरह रची गईं कि इनकी प्रकृति अविश्वसनीय और व्यापक असर पैदा करने वाली लगे.

'चरमपंथ का उभार'

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इससे पहले सरकारी नुमाइंदों पर हुए हमलों की प्रकृति निम्न स्तर की तकनीक और सीमित हमले वाली रही है, जैसे कि पुलिस, सार्वजनिक सुरक्षाबल या सरकारी अधिकारियों पर हुए हमले.

रणनीति में यह बदलाव दो तात्कालिक संभावनाएं दिखाता है. हो सकता है कि यह चीन की सरकार और वीगर चरमपंथियों के बीच संघर्ष को ही बढ़ाने की सिर्फ समन्वित कोशिश न हो बल्कि इस इलाके में हान और वीगर आबादी के बीच व्यापक ध्रुवीकरण के लिए ऐसा किया जा रहा हो.

दूसरा, वीगर चरमपंथी व्यापक हिंसा वाले चरमपंथ के मॉडल को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हों, जिसे हम अल-क़ायदा और उसी किस्म की हिंसा से जोड़ कर देखते हैं.

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सबसे मुख्य सवाल है कि ऐसा अभी ही क्यों हो रहा है?

दो संभावनाएं हैं जो एक दूसरे से जुड़ी हैं. पहला चीन के उस नज़रिये से संबंधित है, जिसमें शिनजियांग की हिंसा को 'आक्रामक बाहरी प्रभाव' के रूप में देखा जाता है.

यह उन चरमपंथी इस्लामी समूहों के संभावित प्रभाव पर केंद्रित है, जिन्हें चीन हालिया हमलों के लिए ज़िम्मेदार मानता है. इनमें पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) और तुर्किस्तान इस्लामिक पार्टी (टीआईपी) शामिल हैं.

'तालिबान का असर'

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जानकारों के मुताबिक ईटीआईएम की गतिविधि एक संक्षिप्त समयांतराल, 1990 के दशक के अंत से 2000 के दशक की शुरुआत, के बीच थी और 2003 में वज़ीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना के एक अभियान में इसके नेता हसन माहसुम की मौत के बाद यह संगठन कमज़ोर पड़ गया.

इसकी जगह 2005 में टीआईपी का उदय हुआ और माना जाता है कि इस समूह के 200 से 400 चरमपंथी उत्तरी वज़ीरिस्तान के मीर अली के पास मौज़ूद हैं. यह समूह पाकिस्तानी तालिबान और इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज़्बेकिस्तान (आईएमयू) के साथ मिलकर काम करता है.

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ईटीआईएम के उलट, टीआईपी ज़्यादा सुर्खियों में रहता है क्योंकि इसके नेता शिनजियांग की घटनाओं की लगातार ज़िम्मेदारी लेते रहे हैं. (उदाहरण के लिए, टीआईपी ने कुनमिंग और उरुमचि रेलवे स्टेशनों पर हुए हमलों के समर्थन में बयान जारी किया.) इसके अलावा यह चीनी शासन के ख़िलाफ़ 'जिहाद' छेड़ने के आह्वान को फैलाने के लिए इंटनेट का इस्तेमाल करता है.

हालांकि टीआईपी की वास्तविक क्षमता अभी बहुत स्पष्ट नहीं है. इस समूह की शिनजियांग से भौगोलिक दूरी, संसाधनों की कमी और चरमपंथियों की छोटी संख्या के कारण यह संभव है कि शिनजियांग में इसका प्रभाव सिर्फ़ प्रचारात्मक हो.

दूसरी संभावना शिनजियांग में चीन की नीति और बढ़ती हिंसा के बीच संबंधों को लेकर है.

चीन की नीति

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1949 में जब इस क्षेत्र को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (पीआरसी) में शामिल किया गया, तभी से बीजिंग का लक्ष्य शिनजियांग को राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एकीकृत करने और ग़ैर हान आबादी को 'एकताबद्ध और बहु-नस्लीय' चीनी राज्य में शामिल करने का रहा है.

इसे हासिल करने के लिए त्रिस्तरीय रणनीति को अपनाया गया- दमन, पाबंदी और निवेश.

विशेष रूप से 1990 के दशक की शुरुआत से ही, बीजिंग ने व्यापक पैमाने पर सरकार नीत आधुनिकीकरण परियोजना को लागू किया. क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बाकी देश और पड़ोसी मध्य एशिया से जोड़ने के लिए निर्माण और बुनियादी ढांचे में अरबों डॉलर झोंके गए.

यह सब इस धारणा के तहत किया गया कि आर्थिक विकास वीगर असंतोष को ख़त्म कर देगा.

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राज्य नियंत्रित आधुनिकीकरण के बावजूद वीगर असंतोष और बढ़ा है. शिनजियांग में हान चीनी आबादी को बसने के लिए प्रोत्साहित किए जाने की नीति और अंतरजातीय और शहरी-ग्रामीण आर्थिक ग़ैरबराबरी ने असंतोष में घी का काम किया.

इसी दौरान बीजिंग ने वीगर विपक्ष की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति को दबाने के लिए सेना और पुलिस के इस्तेमाल की इच्छा को त्यागा नहीं और न ही वीगरों की धार्मिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को नियंत्रित करने और निगरानी करने की अपनी कोशिशें छोड़ीं.

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एक ताज़ा उदाहरण है जो इन दोनों प्रवृत्तियों को दिखाता है- रेडियो फ़्री एशिया ने 20 मई को ख़बर दी कि आक्सू के पास अलाकाघा शहर में प्रशासन ने हिंसात्मक तरीके से एक प्रदर्शन को दबा दिया. यह प्रदर्शन महिलाओं और स्कूली छात्राओं को हिरासत में लिए जाने के विरोध में था. इन महिलाओं और छात्राओं को हिजाब पहनने के कारण हिरासत में लिया गया था. प्रदर्शन में चार लोग मारे गए.

बीजिंग का व्यवहार

इस दृष्टिकोण के मुताबिक मुख्य समस्या यह है कि असमानता पैदा करने वाले राज्य प्रायोजित आधुनिकीकरण और सरकार की दमनकारी प्रवृत्तियों से वीगरों को जो शिकायतें हैं उन्हें ज़ाहिर करने का कोई प्रभावी या "वैध" ज़रिया नहीं है.

चीन ने वीगर विद्वान इल्हाम तोहती के साथ जो व्यवहार किया वो इस दृष्टिकोण की एक मिसाल है.

उदारवादी तोहती ने शिनजियांग की स्वतंत्रता नहीं बल्कि उसे अधिक स्वायत्तता देने की मांग की थी. उन्हें इसी साल 15 जनवरी को बीजिंग में राष्ट्रीयताओं के लिए केंद्रीय विश्वविद्यालय में 'अलगाववाद भड़काने' में भूमिका के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया.

एक विशेष ओहदे से अपनी गतिविधि चलाने वाले इस तरह के उदारवादी आलोचक, जो राज्य द्वारा स्थापित वैध बहसों के दायरे में काम करते थे, उन्हें इतनी तेज़ी से जिस तरह चुप करा दिया गया उससे पता चलता है कि शिनजियांग में औसत वीगरों की आवाज़ें कितने हाशिये पर हैं.

इस संदर्भ में, आबादी के एक हिस्से के चरपमंथ की ओर झुकाव को बहुत हैरानी से नहीं देखना चाहिए.

(डॉक्टर माइकल क्लार्क ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफिथ विश्वविद्यालय के ग्रिफिथ एशिया इंस्टीट्यूट में शोधकर्ता हैं. वो 'शिनजिंयांग एंड चाइनाज़ राइज़ इन सेंट्रल एशिया-अ हिस्ट्री' के लेखक हैं.)

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