पाकिस्तान को देर क्यों लगी निमंत्रण कबूलने में?

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पाकिस्तान ने कई दिनों से चल रही इन अटकलों पर शनिवार को विराम तो लगा दिया कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में जाएंगे या नहीं, लेकिन इस बात को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर इस फ़ैसले में उन्हें इतनी देर क्यों लगी?

चर्चाएं ये भी थीं कि पाकिस्तान में सरकार के तमाम अंग और ख़ासकर सेना शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री के शिरकत करने के ख़िलाफ़ है.

इन आशंकाओं को तब और बल मिला, जब शनिवार को पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री और नवाज़ शरीफ़ के भाई शहबाज़ शरीफ़ ने सेना प्रमुख जनरल राहील से मुलाक़ात की और इस बारे में उनकी राय ली.

बीबीसी उर्दू के हारुन रशीद का कहना है कि इस फ़ैसले में देरी की वजह यही है कि पाकिस्तान सरकार ने इस बारे में काफ़ी सोच-विचार किया है.

हारुन रशीद कहते हैं, “विदेश मंत्रालय तो पहले ही इसके पक्ष में था. सरकार ने दूसरे पक्षों से भी राय ली और सेना प्रमुख से शहबाज़ शरीफ़ की मुलाक़ात भी इसी सिलसिले में हुई. पाकिस्तान में इसे एक अच्छा फ़ैसला माना जा रहा है.”

हालांकि पाकिस्तान की विपक्षी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने नवाज़ शरीफ़ के मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के फ़ैसले का स्वागत किया है, लेकिन कई ऐसे दल और संगठन भी हैं, जो इसके विरोध में हैं.

हारुन रशीद कहते हैं, “पाकिस्तान में जब से यह निमंत्रण आया है, ज़्यादातर लोग तो यही चाह रहे थे कि प्रधानमंत्री को जाना चाहिए, लेकिन कुछ मजहबी पार्टियां इसके ख़िलाफ़ हैं. उनका रवैया अभी भी वही पुराना है. जमात-उद-दावा की ओर से तो इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने की भी बात की जा रही है.”

'फ़ौज की रजामंदी'

हारुन रशीद का कहना है कि धार्मिक पार्टियों का अपना एजेंडा है और वो हमेशा ही भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशों का विरोध करते हैं, इसलिए इसका कोई बहुत मतलब नहीं है.

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सेना की राय लेने के मसले पर हारुन का कहना है कि सेनाध्यक्ष से सलाह ज़रूर ली गई है, लेकिन सार्वजनिक रूप से सेना की ओर से ऐसी कोई आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई थी.

वह कहते हैं, “सार्वजनिक रूप से तो सेना ने इस पर अपनी कोई राय नहीं रखी है. काफ़ी समय से उन्होंने अपनी नीति बना रखी है कि चुनी हुई सरकार ही लोगों के सामने बात रखे. ज़ाहिर है, यदि नवाज़ शरीफ़ की ओर से यह बयान सामने आया है, तो यक़ीनन फ़ौज की भी रज़ामंदी रही होगी.”

'पाकिस्तान में फ़ौज अहम'

इस निमंत्रण और नवाज़ शरीफ़ की रज़ामंदी को लेकर भारत में पाकिस्तान मामलों के जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान सरकार बिना फ़ौज की सहमति के भारत के साथ रिश्तों को लेकर कोई क़दम नहीं उठा सकती.

पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रह चुके जी पार्थसारथी कहते हैं कि पाकिस्तान में फ़ौज की अपनी प्राथमिकताएं हैं और वहां के राजनीतिक दलों की सोच कुछ अलग है. नवाज़ शरीफ़ दो बार तख्तापलट का शिकार हो चुके हैं इसलिए फौज की सहमति उनके लिए बहुत ज़रूरी है.

बीबीसी से बातचीत में जी पार्थसारथी ने कहा, “कभी आपने सुना है कि एक चुना हुआ मुख्यमंत्री सेनाध्यक्ष के पास राय लेने जाए? यह तो बहुत अजीब बात है. जिस सरकार के कामकाज में सेना की इतनी दखलंदाज़ी हो, उससे बहुत उम्मीद करना बेमानी है, फिर भी यदि बातचीत आगे बढ़ती है और कुछ सकारात्मक परिणाम आते हैं, तो यह दोनों देशों के लिए बेहतर होगा.”

पार्थसारथी इस बात पर भी सवाल उठाते हैं कि इस मुद्दे को सिर्फ़ पाकिस्तान पर क्यों केंद्रित किया जा रहा है.

उनका कहना है, “सार्क के सात सदस्य देश हैं. सबको शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए निमंत्रण गया है, लेकिन सिर्फ़ पाकिस्तान के बारे में ही इस पर चर्चा हो रही है.”

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