माया एंजेलो तुम थी, तुम हो, तुम रहोगी!

  • 29 मई 2014
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माया एंजेलो को कई तरह से याद किया जा सकता है. नृत्य के शौकीन उन्हें एक कुशल नर्तकी, फिल्मों में दिलचस्पी लेने वाले लोग उन्हें एक भाव-प्रणव अभिनेत्री और लेखक और मानवाधिकार में विश्वास रखने वाले उन्हें एक महान लेखिका और प्रखर मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में याद करते हैं.

माया एंजेलो ने बुधवार को अंतिम सांस ली. वो लंबे अरसे से बीमार चल रही थीं. उनकी मौत की ख़बर जंगल की आग की तरह फैली और जल्द ही सोशल मीडिया पर माया के बारे में लिखा जाने लगा. यही प्रत्यक्ष प्रमाण है माया एंजेलो की लोकप्रियता का.

जब माया एंजेलो ने लिखा था, ‘आई नो वाई द केज़्ड बर्ड सिंग्स’ तो निश्चय ही उन्होंने बंदी पक्षी की देह में ख़ुद उतर कर उसके एहसासों को महसूस किया होगा.

काले गुलाम की पड़पोती

आज के तथाकथित शालीन और आधुनिक युग में जब दलितों और अल्पसंख्यकों का जीवन स्याह बना हुआ है तब माया एंजेलो के समय में इसका क्या स्वरूप रहा होगा इस बात का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है.

4 अप्रैल 1928 को जन्मी अमरीकी लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता, फिल्म-निर्देशिका, गायिका, अभिनेत्री माया एंजेलो, एक गरीब काले गुलाम की पड़पोती थीं.

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माया एंजेलो ने अमरीका के मिसौरी के सेंट लुइस में नौसेना में दंत चिकित्सक बेली जॉनसन और नर्स विवियन (बक्सटर) जॉनसन के घर जन्म लिया.

वे माता-पिता की छत्रछाया में केवल तीन साल ही रहीं, क्योंकि बाद में उन दोनों का तलाक़ हो गया. माता-पिता ने माया को उनकी दादी के पास भेज दिया.

संघर्षमय जीवन

माया एंजेलो के आगे का जीवन बेहद संघर्षमय रहा जो उन्होंने अपने बूते जिया. माया का जीवन कई विषम घटनाओं से प्रभावित रहा.

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इन घटनाओं, जो अक्सर दुर्घटनाएं ही हुआ करती थीं, ने माया के जीवन को नया आयाम दिया.

होश संभालने के बाद माया ने अपनी व्यक्तिगत सत्ता को ज़ोरदार तरीके से पेश करते हुए कई बड़े काम किए.

उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में अपनी पैठ बनाई और एक महत्वपूर्ण हस्ती बन कर दुनिया के मानचित्र पर उभरीं.

बलात्कार की शिकार

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Image caption माया एंजेलो की पहचान उनके संस्मरण 'आई नो वाई द केज़्ड बर्ड सिंग्स' से बनी.

नस्लवादी समाज में एक काली लड़की होने की वजह से वो कई तरह के बुरे नस्ली अनुभवों से गुज़रीं, ज़ाहिर था उस दौर में सभी काले लोगों की पीठ पर गुलामी के चाबुक के अनगिनत निशान थे.

अपनी दादी और चाचा के साथ कुछ साल रहने के बाद सात साल की उम्र में माया अपनी माँ विवियन से मिलने शिकागो गईं. वहां माँ के प्रेमी ने मासूम बच्ची माया के साथ बलात्कार किया.

इस भयावह घटना की वजह से माया एंजेलो लगभग पांच साल तक गूंगी गुड़िया बनी रहीं. उसके बाद के वर्ष माया की ज़िंदगी में काफी उथल-पुथल भरे रहे.

उनके जीवन में क्रांतिकारी मोड़ तब आया जब 1950 के दशक के अंत में वो, काले लेखकों के संगठन में शामिल हुईं.

वहीं पर माया की मुलाकात एक चर्चित काले लेखक जेम्स बाल्डविन से हुई जो बाद में भाई, दोस्त और सलाहकार बन उनके दुख-सुख में भागीदार बनते रहे.

वहां वो रोसा गे, जॉन ओलिवर किल्लेंस, डॉ जॉन हेनरिक क्लार्के, विल्लर्ड मूर और वाल्टर क्रिसमस जैसे ख्यातिनाम लेखकों, विचारकों और कार्यकर्ताओं के संपर्क में आईं.

उन्होंने मार्टिन लूथर किंग और मेलकॉम एक्स जैसे प्रसिद्ध काले नेताओं के साथ भी काम किया था.

क्रांतिकारी मोड़

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माया के जीवन का दूसरा क्रांतिकारी मोड़ वर्ष 1969 में आया.

एक डिनर पार्टी पूरी तरह अपनी लय में थी. इसमें माया एंजेलो के करीबी दोस्त लेखक जेम्स बाल्डविन, कार्टूनिस्ट जूल्स फ़ेइफ़्फेर और उनकी पत्नी, प्रसिद्ध प्रकाशन संस्थान रेंडम हाउस के मालिक रॉबर्ट लूमिस शामिल थे.

पार्टी में खाना-पीना और बातचीत चल रही थी. तभी रेंडम हाउस के मालिक रॉबर्ट ने माया एंजेलो के जीवन की विविधताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित किया.

माया को यह सुझाव पसंद आया और उन्होंने तुरंत ही अपनी स्वीकृति दे दी.

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माया ने मन ही मन निश्चय किया कि ऐसा करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी एक काली स्त्री के जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी पा सके. अपने जीवन के गुज़रे हुए घटनाक्रमों को वर्तमान में लाकर माया कागज़ के पन्नों पर दर्ज करने लगीं.

इस तरह उनकी विश्वविख्यात आत्मकथा, 'आई नो व्हाई द केज्ड बर्ड सिंग्स' सामने आई. इस आत्मकथा ने ही उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाया.

माया एंजेलो को याद करने के बहाने हम जीवन के संघर्षों की शिलाओं पर एक बार फिर सिर झुकाते हैं.

(विपिन चौधरी माया एंजेलो की जीवनी 'मैं रोज़ उदित होती हूँ' की लेखिका हैं.)

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