अल्ताफ़ की नामज़दगी पेशी के बाद तय होगी

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मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट के नेता अल्ताफ़ हुसैन को अभियुक्त के रूप में नामज़द किया जाए या नहीं, इसका फ़ैसला उनके अस्पताल से छुट्टी मिलने और अदालत में पेशी के बाद लिया जाएगा.

हुसैन को मंगलवार को लंदन में हवाला के एक मामले में हिरासत में लिया गया था.

इंग्लैंड में किसी को गिरफ़्तार करने के बाद मामला अदालत में जाता है और तय किया जाता है कि मामले में गिरफ़्तार व्यक्ति को अभियुक्त के रूप में नामज़द किया जाए या नहीं.

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इसके लिए 36 घंटे का वक़्त निर्धारित है. ग़ौरतलब है कि भारत में यह निर्धारित वक़्त 24 घंटे का होता है. अल्ताफ़ को अस्पताल से छुट्टी मिलने के उपरांत वापस पुलिस स्टेशन जाने के बाद ये 36 घंटे शुरू होंगे.

अपील

हुसैन को हिरासत में लेने पर बीबीसी उर्दू के संवाददाता अदिल शाहज़ेब ने बताया कि मूवमेंट के वकील ने स्कॉटलैंड यार्ड से दरख़्वास्त की थी कि चूंकि हुसैन का पहले से ही अस्पताल में भर्ती होना तय है इसलिए उन्हें रिहा किया जाए.

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शुरू में यार्ड ने यह कहकर उनकी अपील ठुकरा दी थी कि उसकी अपनी मेडिकल टीम अल्ताफ़ हुसैन की जांच करके तय करेगी कि उन्हें अस्पताल भेजा जाए या नहीं.

जांच के बाद स्कॉटलैंड यार्ड के अफ़सरों ने ख़ुद ही उन्हें अस्पताल पहुँचाया है. हुसैन चूँकि डायबिटीज़ के मरीज़ है इसलिए लंदन के समय के मुताबिक़ 11 बजे उनकी जाँच होनी है.

इस वज़ह से जिस मामले में उन्हें हिरासत में लिया गया है उस मामले में अब तक उनसे पूछताछ नहीं हो पाई है.

एमक्यूएम के सूत्रों से पता चला है कि अस्पताल में ही यह तय होगा कि उन्हें वापस पुलिस स्टेशन ले जाकर मामले की पूछताछ की जाए या मेडिकल आधार पर रिहा किया जाए.

इस्लामाबाद के वरिष्ठ पत्रकार एहतेशामुल हक़ ने बीबीसी हिंदी से विशेष बातचीत में हुसैन को हिरासत में लिए जाने के मद्देनज़र पाकिस्तान के हालात के बारे में कहा, "यहां कल वित्त वर्ष 2014-15 का बजट पेश हुआ है लेकिन हुसैन को हिरासत में लिए जाने के बाद मीडिया में यह मसला बजट के मुद्दे पर हावी हो गया है. यहाँ यह पहली बार हुआ है."

नुक़सान

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Image caption 1992 से ही अल्ताफ़ हुसैन लंदन से अपनी पार्टी का संचालन कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि एक आकलन के अनुसार हुसैन को हिरासत में लिए जाने के मद्देनज़र सिंध के शहरी क्षेत्र कराची, हैदराबाद और सक्कर में भड़की हिंसा में 150 करोड़ रुपए का नुक़सान हुआ है और अगर हुसैन को ज़मानत नहीं मिलती है तो और ज़्यादा हिंसा भड़कने का ख़तरा बना रहेगा.

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हुसैन साल 1991 से लंदन में रह रहे हैं. वे हमेशा कहते रहे हैं कि पाकिस्तान लौटने पर उनकी जिंदगी को ख़तरा हो सकता है. 1992 से ही वे लंदन से अपनी पार्टी का संचालन कर रहे हैं.

एमक्यूएम में सबसे ज़्यादा संख्या मोहाजिरों की है और यही इसके सबसे बड़े समर्थक भी हैं. मोहाजिर उन उर्दू भाषी मुसलमानों को कहा जाता है, जो विभाजन के समय भारत से आकर पाकिस्तान में बस गए थे.

हुसैन पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने मोहाजिरों की भावनाओं को राजनीतिक दिशा दी. इसके लिए उन्होंने 1984 में एमक्यूएम पार्टी की स्थापना की थी.

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