चीन के इतिहास में तियेनएनमेन से जुड़ी 25 बातें

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साल 1989 में चीन में हुए तियेनएनमेन दमन को 25 साल बीत चुके हैं. बुधवार को इसकी 25वीं बरसी है. क्या आज भी उस घटना की कोई प्रासंगिकता बची है?

लोकतांत्रिक सुधारों की मांग को लेकर तियेनएनमेन चौक पर लोखों लोग प्रदर्शन कर रहे थे. यह प्रदर्शन हफ़्तों तक चला. चार जून 1989 को चीनी प्रशासन ने बीजिंग की सड़कों पर सैकड़ों लोगों का संहार कर इसे कुचल दिया.

ऐसी 25 वजहें जिनकी वजह से चीन के तियेनएनमेन चौक पर घटे दमन की घटना को याद करना ज़रूरी है.

  1. चीन में तियेनएनमेन दमन को याद करना राष्ट्र विरोधी गतिविधि नहीं है. इसका मतलब मात्र इतना है कि चीन की सियासत इसे स्वीकार कर रही है, या इससे इंकार कर रही है.
  2. अधिकारियों ने चीन में ग़लत बात फैलाई. प्रदर्शन कर रहे छात्र प्रतिक्रांति की साज़िश नहीं रच रहे थे. संघर्ष करने वाले अधिकांश प्रदर्शनकारी एक समझदार और स्वच्छ पार्टी के नेतृत्व वाला मज़बूत राष्ट्र चाहते थे.
  3. पार्टी के मध्यक्रम के मौजूदा अधिकांश अधिकारी और कंपनी प्रबंधक साल 1989 में लोकतांत्रिक सुधार के लिए प्रदर्शन करने वालों की भूमिका में थे.
  4. कभी भी पार्टी की क्षमताओं को कम करके मत आंकिए. कई विश्लेषक मानते हैं कि 1989 के बाद इतना लंबा अरसा गुज़र जाने पर पार्टी दोबारा खड़ी नहीं हो सकती.
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  5. साथ ही, लेकिन पार्टी की क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ा कर भी मत देखिए. पार्टी 25 साल बाद भी इस मुद्दे पर संवाद खड़ा करने में असफल रही कि आधुनिक चीन की राजनीति कैसी हो.
  6. 1989 में पार्टी के पास एक ऐसा नेता था जो नियम-क़ानूनों के प्रति गंभीर था. झाओ जियांग के पतन के बाद पार्टी के अधिकारों को सीमित करने के मुद्दे पर चर्चा ही बंद हो गई. अब सारा ध्यान निरंकुशता को और कारगर बनाने पर केंद्रित है.
  7. तियेनएनमेन पर ध्रुवीकरण हुआ और चीन के राजनीतिक उदारवादी कमज़ोर पड़ते चले गए. व्यवस्था के भीतर वे विकृति और समझौते का शिकार हुए जबकि बाहर अप्रासंगिक होते चले गए. अंततः हाशिए पर धकेल दिए गए.
  8. लोकतांत्रिक सुधारों के लिए प्रदर्शन करने वालों को हॉंगकॉंग में तब एक छोटी सफलता मिली जब ब्रितानी सरकार ने वहां आंशिक लोकतंत्र की नींव रखी.
  9. पदच्युत कर दिए गए पार्टी प्रमुख झाओ जियांग ने कहा था, "आज नहीं तो कल दुनिया 4 जून का फिर से मूल्यांकन करेगी... "
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  10. तथ्यों को दबाने के लिए 25 साल से चल रहे प्रोजेक्ट ने सुरक्षा तंत्र को न्यायिक प्रक्रिया और मानवाधिकारों को अनदेखा करने का एक और कारण दे दिया.
  11. 1986 के दमन की याद में चीन के इंटरनेट पर 4 और 6 को खंगालने का एक मौका.
  12. जनता की स्मृतियों को झकझोरने की एक कोशिश. 25 सालों में कई युवा उन चेहरों को भूल चुके हैं जिन्हें याद रखना चाहिए.
  13. पार्टी ख़ुद को निर्दोष समझती है. यह साबित हो चुका है कि देश को संपन्न होने के लिए आज़ाद होने की ज़रूरत नहीं.
  14. इससे पहले भी और बाद में, चीन में पार्टी ही सर्वेसर्वा है. अधिकांश नागरिक चाहते हैं कि पार्टी में सुधार आए. वे न तो तब चाहते थे कि पार्टी ख़त्म हो और न अभी ऐसा चाहते हैं.
  15. पार्टी के भीतर कई ऐसे सदस्य और नेता हैं जो आज़ाद मीडिया और स्वतंत्र न्यायालय में विश्वास रखते हैं.
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  16. भूलना ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी है. जिन्होंने याद रखने की कोशिश की उन्हें नज़रबंदी, "जबरन छुट्टी" का सामना करना पड़ा.
  17. यह चीन की राजनीतिक आशा और निराशा से जुड़े घटनाचक्रों का हिस्सा है. कुछ लोग देश में आई उन्नति के कारण उस दमन को सही ठहराते हैं, लेकिन संभवतः इस सिलसिले को तोड़ने में यह उन्नति शायद ही सहायक हो.
  18. पार्टी की ओर से 1989 के बाद जनमत बनाने के लिए आंकड़े जारी किए गए. इन आंकड़ो का सबक़ हैः भ्रष्टाचार, घर की क़ीमतें, प्रदूषण जैसी समस्याओं से आगे बढ़ जाना.
  19. पार्टी के नियमों और संस्थाओं की अनदेखी हुई. फ़ैसले टाल दिए गए. 25 साल के बाद भी शीर्ष स्तर पर फ़ैसले लेने में आज भी अस्पष्टता है.
  20. पार्टी के लिए काला दिन होने के बावजूद वो विदेशियों से किसी तरह का राजनीतिक सबक़ नहीं लेगा. इसके बावजूद कि चीन आज एक धनी और ताक़तवर देश है.
  21. कई युवाओं के लिए चार जून का कोई अस्तित्व नहीं है. चीन की राजनीति के लिए इस तारीख़ का कोई अस्तित्व नहीं है. युवा इस बात से अनजान हैं कि एक पीढ़ी ने अपने विचारों के लिए क़ुर्बानी दी थी.
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  22. चीन की सफलता, चाहे वो पैसों के रूप में हो या दर्जे के रूप में, वैसी दिखाई जाती है जैसी है ही नहीं, और इसका असली रूप छिपा लिया जाता है.
  23. चीन की 1989 के बाद की पीढ़ी अपनी मर्ज़ी से मतदान कर सकती है. यदि घर बैठे ही उन्हें स्वच्छ हवा, भोजन और आज़ादी मिले तो वे क्यों राजनीति को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करें?
  24. चीनी लेखक लु जून ने एक दशक पहले लिखा था 'जितना भी ख़ून बहा है, ज़ाया नहीं जाएगा. जितना वक़्त बीतेगा, असर उतना ही ज़्यादा होगा.
  25. अगर पार्टी फिर से वही सब दोहराना चाहती है तो वह ऐसा कर सकती है.

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