इराक़ संकट: अमरीकी जहाज़ी बेड़े की तैनाती

  • 15 जून 2014
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रक्षा मंत्री चक हेगेल ने अमरीकी वायुपोत यूएसएस जार्ज एच डब्लयू बुश को फा़रस की खाड़ी की तरफ़ जाने का हुक्म जारी किया है.

रक्षा विभाग के एक अधिकारी का कहना था कि ये राष्ट्रपति बराक ओबामा को इराक़ में कार्रवाई करने के फ़ैसले की स्थिति में मदद कर सकता है.

ओबामा ने शुक्रवार को कहा था कि वो इराक़ में दिन ब दिन मज़बूत होते जा रहे सुन्नी विद्रोहियों के खिलाफ़ कार्रवाई पर फैसला ले सकते हैं. हालांकि ओबामा ने साफ़ कर दिया था कि अमरीका इराक़ में अपनी फौज नहीं भेजने जा रहा है.

विद्रोहियों को रोकने की कोशिश

खुद को इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक़ एंड द लूवेंट बुलाने वाले सुन्नी विद्रोहियों ने हाल के दिनों में तिकरित और मोसुल के क्षेत्रों में क़ब्ज़ा कर लिया है.

इराक़ी प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी ने राजधानी बग़दाद के उत्तर में मौजूद शहर समारा में अपने सैन्य कमांडरों को संबोधित किया है. उन्होंने कहा कि ये विद्रोहियों के खिलाफ़ यहीं से लड़ाई का आगाज़ होगा.

शियाओं और कुर्द लड़ाकों से मिलने वाली मदद से प्रोत्साहित होकर इराक़ी फ़ौजें सलाहद्दीन और दियाला प्रांतों में जिहादी सेना को रोकने की कोशिश कर रहे हैं.

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इस बीच इराक़ में संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी निकोलाई मलादेनोफ़ ने कहा है कि हमले करते वक़्त इराक़ी फौज को संयम से काम लेना चाहिए ताकि वो आम शहिरयों और विद्रोहियों में फर्क़ को अच्छी तरह से साफ़ हो सके. मलादेनोफ़ मोसुल और एरबील के बीच मौजूद एक शरणार्थी शिविर में बात कर रहे थे.

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि इस वक़्त इराक़ी सुरक्षा बलों को ज़मीनी हक़ीकत को ध्यान में रखकर बहुत सोच समझकर क़दम उठाना चाहिए. जा़हिर है कि इस वक्त अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत है, इस वक़्त क्षेत्रीय सहायता की आवश्यक्ता है. लेकिन मैं कहूंगा कि इस वक्त जरूरी है कि इराक की आंतरिक स्थिति से निपटा जाए और पड़ोसियों से इस तरह मदद मांगी जाए जिससे क्षेत्र पर मंडरा रहे ख़तरे की बात साफ हो जाए. कल तक जो सीरिया में था आज इराक़ में हो रहा है लेकिन ये यहीं तक सीमित नही रहेगा."

'अमरीकी हितों के लिए ख़तरा'

ओबामा ने भी कहा है कि इराक़ पर मंडरा रहा ख़तरा सिर्फ़ उस तक ही सीमित नहीं बल्कि क्षेत्र और अमरीका के हितों के लिए भी ख़तरा है.

दूसरी ओर ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि वो इस्लामी विद्रोहियों के खिलाफ़ लड़ाई में अमरीका के साथ सहयोग करने को तैयार हैं.

रूहानी का कहना था कि वो दोनों इराक़ की सुरक्षा बहाल करने की दिशा में काम कर सकते हैं लेकिन ये उन्हीं हालात में मुमकिन है कि अमरीका इराक़ और दूसरी जगहों पर आतंकवादियों का सामना करे.

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एक प्रेस वार्ता में ईरानी राष्ट्रपति ने कहा है कि अगर इराक़ उनसे मदद मांगता है तो वो सहायता करने के लिए तैयार हैं, "हो सकता है कि अमरीका भी इस मामले में मदद करना चाहता हो. हालांकि मुझे नहीं मालूम की वो क्या करना चाहते हैं. लेकिन हमारे लिए अहम बात ये है कि इराक़ एक देश के तौर पर क्या चाहता है, वहां की सरकार क्या चाहती है और अगर हम इराक़ी हुकूमत की मदद कर सकते हैं तो हम ऐसा करने के लिए तैयार हैं."

ईरान और अमरीका के बढ़ते संबंध

ईरान और अमरीका हाल तक एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे थे. लेकिन ईरान में हसन रूहानी की हुकूमत के आने के बाद से संबंधों में पहले के मुक़ाबले बेहतरी आई है और दोनों मुल्कों के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत भी जारी है.

दूसरी तरफ़ मध्य पूर्व में अमरीका के सबसे करीबी मित्र देश सऊदी अरब को अमरीका और ईरान के बीच बढ़ती नज़दीकियां पसंद नहीं हैं.

सऊदी अरब सीरिया के मामले पर भी अमरीका के क़दम से खुश नहीं है. क्षेत्र में शिया और सुन्नी समुदायों का भेद भी तनाव की एक मुख्य वजह रहा है. इराक़ की मलिकी हुकूमत में शियाओं का बोलबाला है जबकि सद्दाम हुसैन के दौर में सुन्नी सत्ता पर हावी थे.

सऊदी अरब भी शियाओं का मित्र नहीं बताया जाता.

सुन्नी विद्रोहियों के एक नेता अब्दुररहमान अल जुअई ने फलुजा में बीबीसी को बताया कि सुन्नी खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं.

उनका कहना था, "क्या हो रहा है कि पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रो में मौजूद इलाक़ों, ख़ासतौर पर सुन्नी बाहुल शहरों, में इस तल्ख़ सच्चाई और अनदेखी के खिलाफ़ आम लोग उठ खड़े हुए हैं, ये हालात तब से जारी हैं जब से मुल्क पर अमरीका का हमला हुआ है."

लेकिन कहा ये भी जा रहा है कि ये अल क़ायदा से जुड़े एक संगठन से निकला है और इसे सद्दाम हुसैन के समय के कुछ अधिकारियों का संरक्षण भी प्राप्त है.

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