क्या चूमने से पहले पूछना चाहिए?

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पिछले कुछ महीनों में इस बात को लेकर काफ़ी चर्चा रही है कि यौन व्यवहार कब अनुचित होता है और सीमा लांघकर अपराध बन जाता है.

बीबीसी संवाददाता जो फि़डजेन ने यह जानने की कोशिश की कि आपसी सहमति की लक्ष्मण रेखा कहाँ है?

क्या आपको किसी का चुंबन लेने से पहले उससे पूछना चाहिए?

कई लोग यह मानते हैं कि रिश्तों के उसूल बदल रहे हैं और ग़लतियों के परिणाम गंभीर हो सकते हैं.

इस साल की शुरुआत में ब्रिटेन के सांसद नाइजेल एवान्स पर चल रहे मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत को यह बताया गया कि एवान्स ने किसी को चूमने की कोशिश की थी, जिसने उन्हें झिड़का और तब वह पीछे हटे.

इंग्लैंड और वेल्स में आपराधिक मामलों की जाँच करने के लिए ज़िम्मेदार, क्राउन प्रोसिक्यूशन सर्विस ने कहा था कि यह आपराधिक हो सकता है. लेकिन बाद में एवान्स इन आरोपों से बरी हो गए थे.

कई सवाल

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लेकिन इस मामले ने यौन व्यवहार की सीमाओं को लेकर कई सवाल उठाए थे.

ईवनिंग स्टैंडर्ड अख़बार में यौन रिश्तों के बारे में लिखने वाली 29 साल की पत्रकार रोज़ामंड उर्विन के दिमाग़ में भी चुंबन का राजनीतिक विमर्श घूमता रहता है.

कुछ पल नज़दीकियों के...

वह कहती हैं, "मैं आजकल इस बारे में अपने दोस्तों से बात करती हूँ कि क्या असल में लोगों को क्या यह कहना चाहिए कि 'क्या मैं आपको अभी चूम सकता हूँ?' मेरे विचार से यह पूछना अच्छा रहेगा क्योंकि ऐसा कहने से असल में आप सामने वाले को कह रहे होते हैं, 'मेरी ऐसा कुछ भी करने की मंशा नहीं है जो आपको अच्छा न लगे'."

कुछ लोगों को यह पुराने ज़माने का तरीका लग सकता है लेकिन पुराने मूल्यों को अपनाने से हम शायद आपसी सहमति की आधुनिक दुविधा से निपट सकते हैं.

आपसी सहमति और इसकी परिभाषा को लेकर पूरी दुनिया में बहस चल रही है. इसी हफ्ते अमरीका के कैलीफोर्निया में विश्वविद्यालयों में एक नया क़ानून लागू करने पर बहस हो रही है. इसके अनुसार यौन संबंधों से पहले दोनों पक्षों को 'आपसी सहमति की स्वीकारोक्ति' करनी होगी.

स्पष्ट स्वीकारोक्ति

इस विधेयक में लिखा है, "आपसी सहमति से होने वाली यौन क्रिया से इसमें शामिल हर व्यक्ति को अपने पूरे होश में लिए गए निर्णय की स्पष्ट स्वीकारोक्ति करनी होगी." इसमें आगे लिखा है, "विरोध या रोकटोक की कमी का मतलब सहमति नहीं है. चुप्पी का मतलब भी सहमति नहीं है."

इसने ख़बरिया वेबसाइटों और ब्लॉग्स पर एक नई बहस छेड़ दी है. कुछ लोग यह कयास लगा रहे हैं कि यौन संबंध से पहले लिखित में अनुमति भी लेनी पड़ सकती है.

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समाज विज्ञान के प्रोफेसर फ्रैंक फुरेडी कहते हैं कि लोगों को नियमों से निर्देशित होने की बजाय अपने फैसलों पर भरोसा करना चाहिए. वह कहते हैं, "एक बार जब नियम यह निर्धारित करने लगते हैं कि क्या सही है और क्या ग़लत है तब हम जटिल समस्याओं को सुलझाने की अपनी समझ और क्षमता खो देते है."

रोज़ामंड उर्विन कहती हैं, "लोग जेन ऑस्टन की लिखी नॉवल इस लिए पसंद करते हैं क्योंकि उसका कोई भी किरदार दूसरे व्यक्ति की इच्छा और पसंद पूरी तरह से सुनिश्चित किए बिना किसी को चूमने की सोच भी नहीं सकता. "

उर्विन का मानना है कि इसी पुराने ज़माने की तमीज़ को सहमति के साथ आधुनिक तरह से अपनाना चाहिए. उनके अनुसार इससे संबंधों के जटिल और नकारात्मक पहलू से निपटा जा सकता है.

वह कहती हैं, "हम सोचते हैं कि खाने-पीने के तरीके में तमीज़ है, लेकिन तमीज़ असल में दूसरे इंसानों को समझने में है और इससे बहुत सी दिक्कतें दूर हो सकती हैं."

लोग कहते हैं कि तमीज़ से इंसान बनते हैं. शायद तमीज़ लोगों को अदालत से बाहर रहने में भी मदद कर सकती है.

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