इराक़ क्यों लौटना चाहती हैं कुछ नर्सें?

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इराक़़ी शहर तिकरीत में बिगड़ते हालात के बीच वहाँ फंसी अधिकांश भारतीय नर्सें जल्द से जल्द अपने परिवार के पास लौटना चाहतीं हैं, जबकि कुछ ऐसी भी हैं, जो वापस नहीं आना चाहतीं.

यही नहीं, कुछ ऐसी भी हैं, जो इराक़ वापस जाकर काम करना चाहती हैं. हालांकि वो इराक़ में लगातार बिगड़ रही स्थितियों से चिंतित ज़रूर हैं.

उनके लिए दुविधा इस बात को लेकर है कि इन हालात में इराक़ लौटना ठीक होगा या नहीं.

अगर वो वापस जाती हैं, तो उन्हें नहीं पता कि उनके साथ क्या होगा क्योंकि वहां भारत के 40 कामगारों का अपहरण कर लिया गया है.

अगर ये नर्सें वापस इराक़ नहीं जातीं, तो इनके लिए बड़ा सवाल है कि वो लाखों के कर्ज़ का भुगतान कैसे करेंगी, जो उन्होंने अपनी पढ़ाई के लिए लिया है, या फिर नौकरी लगाने के एवज़ में भर्ती एजेंसियों से ले रखा है.

नसरिया अस्पताल से छुट्टी पर भारत आई सिंधु कहती हैं, “हम सब इराक़ में खराब होते जा रहे हालात से बेहद तनाव में है, लेकिन मैं वहां काम करने के लिए वापस जाना चाहती हूं''

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28 वर्षीय सिंधु 10 जून को अस्पताल से छुट्टी लेकर केरल में पथानामथिट्टा में अपने घर तिरुमाला लौट आई.

'सरकार नहीं जाने देगी'

एक दिन बाद ही वहां के चरमपंथी संगठन आईएसआईएस ने एक के बाद इराक़ी शहरों पर क़ब्ज़ा करना शरू कर दिया.

सिंधु का वापसी टिकट 26 जून का है. लेकिन उन्हें नहीं लगता कि भारत सरकार उन्हें इराक़ जाने देगी क्योंकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने लोगों को इराक़ की यात्रा से बचने की सलाह दे रखी है.

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सिंधु कहती हैं, "नसरिया में मेरे दोस्त रोज़ फोन करके कहते हैं कि मुझे वापस आ जाना चाहिए क्योंकि वहां कोई समस्या नहीं है. मैं ख़ुद को दिमाग़ी तौर पर तैयार नहीं कर पा रही हूं. हम सब तनाव में हैं क्योंकि इस नौकरी को हासिल करने के लिए हमने डेढ़ लाख रुपए एजेंसी को दिए हैं."

सिंधु आगे बताती हैं, "मेरी मां की किडनी खराब है. उन्हें हर हफ़्ते तीन बार डायलिसिस की ज़रूरत पड़ती है. मेरे पिता एक मामूली किसान हैं. उन्होंने मेरी पढ़ाई के लिए कर्ज़ लिया था. मेरे कुछ दोस्त ब्याज भी लेते हैं. मैंने इस अस्पताल की नौकरी से अपनी पढ़ाई का कर्ज़ उतार दिया है."

सिंधु डायलिसिस की प्रक्रिया की जानकार नर्स हैं. दिल्ली में वह सिर्फ़ 11,000 रुपए कमाती थीं, लेकिन नसरिया में उन्हें 850 डॉलर मिलते हैं. सिंधु को सऊदी अरब, कुवैत या फिर क़तर में नौकरी नहीं मिल सकती क्योंकि उनके पास नर्सिंग का डिप्लोमा है, जबकि इन देशों में इसके लिए डिग्री ज़रूरी है.

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फोन पर बात करते हुए सिंधु भावुक हो जाती हैं. वो कहती हैं कि उन्हें नहीं पता कि क्या किया जाए.

कर्ज़ का सवाल

सिंधु की दोस्त सोनिया जोमोन कोट्टयम की रहने रहने वाली हैं लेकिन उनकी स्थितियां थोड़ी अलग हैं. सोनिया ने पढ़ाई के लिए एक बैंक से कर्ज़ लिया था.

इस अस्पताल में 2013 के अगस्त महीने से काम कर रहीं सोनिया कहती हैं, " एजेंसी को देने के लिए जो डेढ़ लाख रुपए उधार लिए थे, वो मैंने चुका दिए हैं."

सोनिया को भारत मे काम करने में कोई दिक़्क़त नहीं है पर वह इससे चिंतित हैं कि भारत में मिलने वाली मामूली तनख़्वाह से पढ़ाई के लिए लिया गया कर्ज़ कैसे चुकेगा.

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लेकिन सिंधु की तरह सोनिया वापस इराक़ जाने के बारे में नहीं सोच रहीं. वह उस वक़्त तक इंतज़ार करना चाहती हैं, जब तक इराक़ शांत नहीं हो जाता.

सोनिया और सिंधु की स्थितियों में अंतर है क्योंकि सोनिया शादीशुदा हैं जबकि सिंधु अविवाहित.

तिकरीत में काम करने वाली नर्सों ने केरल सरकार से मांग की है कि उनके कर्ज़ या तो माफ़ कर दिए जाएं या फिर सरकार उनका भुगतान कर दे ताकि वो युद्धरत इराक़ से निकलकर वापस अपने देश आ सकें.

सिंधु कहती हैं कि अगर केरल सरकार कर्ज़ चुकाने का फैसला कर भी लेती है तो भी उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होने वाला क्योंकि उन्होंने सारे कर्ज़ लोगों से लिए हैं न कि किसी बैंक से, जिसे वह सरकार को दिखा सकें.

केरल के आप्रवासी मामलों के मंत्री केसी जोज़फ़ ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमारी पहली प्राथमिकता केरल के सभी लोगों की सुरक्षित घर वापसी है. इस वक़्त कर्ज़ का मुद्दा गौण है."

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