'दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सबसे ज़्यादा शरणार्थी'

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दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार साल 2013 के दौरान युद्ध और उत्पीड़न के कारण अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होने वाले लोगों की कुल संख्या बढ़कर पाँच करोड़ से ज़्यादा हो गई है, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ने ये बात कही है.

यूएनएचसीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार पाँच करोड़ 12 लाख की कुल संख्या एक साल पहले के आँकड़ों से 60 लाख ज़्यादा है.

यूएनएचसीआर के उच्चायुक्त एंटोनियो गुटेरेस ने बीबीसी को बताया कि यह बढ़ोत्तरी सहायता करने वाली संस्थाओं के लिए एक 'नाटकीय चुनौती' है.

सीरिया, केंद्रीय अफ़्रीका और दक्षिणी सूडान में संघर्ष की वजह से शरणार्थियों की संख्या बढ़ी है.

वो कहते हैं, "संघर्षों में काफ़ी वृद्धि हो रही है और इसके साथ-साथ ऐसा प्रतीत होता है मानो पुराने संघर्ष समाप्त होते नहीं दिखते."

विशेष चिंता उन 63 लाख लोगों को लेकर जताई जा रही है जो सालों से शरणार्थी हैं, कुछ मामलों में तो एक दशक से भी ज़्यादा वक़्त से.

आंतरिक विस्थापन की चुनौती

ऐसे लोग जो लंबे समय से शरणार्थियों वाली परिस्थिति में रह रहे हैं, उनमें पच्चीस लाख से ज़्यादा संख्या अफ़ग़ान लोगों की है.

दुनिया में अब भी सबसे अधिक शरणार्थी अफ़ग़ानिस्तान के हैं, पड़ोसी देश पाकिस्तान दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा शरणार्थियों का मेज़बान है, एक अनुमान के अनुसार यहां करीब 16 लाख शरणार्थी हैं.

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पूरी दुनिया में लगभग भुला दिए गए संकटों के हज़ारों शरणार्थियों ने अपने जीवन का बेहतरीन हिस्सा शरणार्थी कैंपों में बिता दिया. थाईलैंड की म्यांमार से लगती सीमा पर म्यांमार के करीब 1,20,000 लोग कारेन समुदाय के हैं जो 20 साल से ज़्यादा समय से शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र कहता है कि शरणार्थियों को ज़बरदस्ती वापस नहीं भेजा जाना चाहिए और तब तक वापस नहीं जाना चाहिए जब तक कि ऐसा करना सुरक्षित न हो, और उनके पास वापसी के लिए घर न हो.

लेकिन केन्या के दादाब कैंप में रहने वाले तीन लाख से ज़्यादा शरणार्थियों में से बहुत से लोगों के लिए यह बहुत दूर की कौड़ी है.

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी मानती है कि कुछ कैंप लगभग स्थायी हो गए हैं, उनके अपने स्कूल, अस्पताल और काम-धंधा है. लेकिन ये कैंप घर नहीं है और कभी भी नहीं हो सकते.

लेकिन दुनिया में शरणार्थियों की संख्या से कहीं ज़्यादा उन लोगों की संख्या है जो आंतरिक तौर पर विस्थापित (आईडीपी) हैं, जो अपने घरों से भागने को मजबूर हुए लेकिन अपने देश के भीतर ही रहे.

विकासशील देशों पर ज़्यादा दबाव

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ऐसा माना जाता है कि अकेले सीरिया में 65 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए हैं. इस संघर्ष के कारण कई परिवारों को एक से ज़्यादा बार अपना बोरिया बिस्तर समेटने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

इन शिविरों में भोजन, पानी, आवास और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल बेहद सीमित है, ऐसा इस वजह से है क्योंकि वे एक संघर्ष वाले क्षेत्र में रह रहे हैं, सहायता उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं के लिए उन तक पहुंचना मुश्किल है.

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक़ दुनिया में तीन करोड़ तीस लाख से ज़्यादा लोग आंतरिक तौर पर विस्थापित हैं.

शरणार्थियों और आंतरिक रूप से विस्थापन करके नए क्षेत्रों की तरफ़ जाने वाले लोगों की बड़ी संख्या से संसाधनों पर दबाव पड़ता है, इससे मेज़बान देश में अस्थिरता भी पैदा हो सकती है.

सीरिया में जारी संघर्ष के दौरान लेबनान, जॉर्डन और तुर्की ने अपनी सीमाओं को खुला रखा. लेबनान में अभी 10 लाख से ज़्यादा सीरियाई शरणार्थी हैं, इसका अर्थ है कि लेबनान की एक चौथाई जनसंख्या सीरियाई है. इससे देश में आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दबाव तनाव का कारण बन रहा है.

संयुक्त राष्ट्र इस बात को लेकर चिंतित है कि शरणार्थियों की देखरेख की जिम्मेदारी तेज़ी से उन देशों पर बढ़ रही है, जिनके पास बेहद सीमित संसाधन हैं.

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विकासशील देश दुनिया के शरणार्थियों की 86 प्रतिशत संख्या के मेजबान हैं, जबकि दुनिया के संपन्न देश मात्र 14 फ़ीसदी शरणार्थियों को शरण दे रहे हैं.

यूरोप से ज़्यादा उम्मीद

यूरोप में शरण माँगने वालों और आप्रवासियों की बढ़ती आशंका के बावजूद यह खाई तेज़ी से बढ़ रही है. दस साल पहले संपन्न देश 30 प्रतिशत शरणार्थियों के मेज़बान थे, वहीं विकासशील देशों में शरणार्थियों का आँकड़ा 70 फ़ीसदी था.

एंटोनियो गुटेरेस मानते हैं कि यूरोप ज़्यादा योगदान दे सकता है और उसे ऐसा करना चाहिए. उन्होंने कहा, "मैं सोचता हूँ कि यह महत्वपूर्ण है कि यूरोप पूरी तरह से अपनी ज़िम्मेदारियों को समझे."

वो आगे कहते हैं, "मैं सोचता हूं कि यह भी साफ़ है कि यूरोप में स्वीडन, जर्मनी जैसे अच्छे उदाहरण मौजूद हैं, जिन्होंने काफ़ी उदारता दिखाई है. लेकिन हम यूरोपीय संघ से ऐसी साझी अभिव्यक्ति चाहते हैं."

'दुनिया हिंसक हो रही है'

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लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के लिए सबसे निराश करने वाली बात है कि उनमें से अधिकांश को ज़्यादा शरणार्थियों के साथ समायोजन करने के लिए कहा जाता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद या तो संघर्षों का समाधान करने में अक्षम है या फिर उनको शुरू होने से रोक नहीं पा रही है.

एंटोनियो गुटेरेस कहते हैं, "दुनिया ज़्यादा हिंसक हो रही हैं और ज़्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं, लेकिन सहायता एजेंसियों के पास परिस्थिति का सामना करने के लिए न तो पर्याप्त क्षमता है और न संसाधन, सुरक्षा परिषद को निष्क्रिय देखना, जब सारे संघर्षों का उदय हो रहा है, यह ऐसी बात है जिसका कोई मायने समझ नहीं आता."

वो आगे बताते हैं, "इतने सारे लोगों की पीड़ा, बेगुनाह लोगों को मरते हुए देखना, मासूमों को अपना घर छोड़कर भागते हुए देखना, इतने सारे निरीह लोगों का अपनी ज़िंदगी को पूरी तरह बिखरते हुए देखना और दुनिया का इसको रोक पाने में असमर्थता वाली परिस्थिति मुझे निराश करती है."

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