आख़िर कहां से मिल रही है जेहादियों को ताक़त

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9/11 को हुए अल क़ायदा के हमले को 13 साल बीत चुके हैं. अल क़ायदा, उसके समर्थक और दूसरे जेहादी समूह आज भी सक्रिय हैं.

सवाल है कि कौन हैं ये? और कई देशों के सामूहिक अथक प्रयासों के बावजूद उनकी ताकत कम क्यों नहीं हो रही?

1989 में अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत संघ की वापसी के बाद ओसामा बिन लादेन ने अब्दुल्ला आज़म के साथ मिलकर 'अल क़ायदा' नाम का संगठन बनाया. मगर आज अल क़ायदा का मूल स्वरूप बाकी नहीं बचा है.

ओसामा बिल लादेन पाकिस्तान में साल 2011 में ढूंढ निकाला गया और फिर मार दिया गया.

बिन लादेन के वारिस, एकांतप्रिय और साधारण व्यक्तित्व के मालिक आयमन अल जवाहिरी, जो मिस्र में सर्जन थे, अब भी फ़रार हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वे यदा-कदा ऑनलाइन अपना बयान जारी करते रहते हैं.

आयमन अल जवाहिरी से जेहादियों की शिकायत है कि वे तेज़ी से घटती मौजूदा घटनाओं के मुक़ाबले अप्रासंगिक होते जा रहे हैं.

रणनीति

पिछले एक दशक में अल क़ायदा नेता और कमांडर बड़ी संख्या में या तो हिरासत में ले लिए गए या मार दिए गए. कई की मौत विवादास्पद मानवरहित हवाई ड्रोन हमले में हुई.

मूल अल क़ायदा के बचे हुए सदस्यों के बारे में माना जा रहा है कि वे साल 2001 में अफ़ग़ानिस्तान से भागकर पाकिस्तान के क़बायली इलाक़ों में बस गए.

मगर दुनिया में चरमपंथियों का मुक़ाबला करने वालों के पास खुशी मनाने का कोई ख़ास कारण नहीं बचा है.

उन्होंने अल क़ायदा को समूल नष्ट करने की जगह उनमें फूट डालने और तितर-बितर करने की रणनीति अपनाई.

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इसका असर यह हुआ कि अल क़ायदा को मध्य पूर्व, अफ़्रीका और एशिया में कई अलग-अलग संगठनों का रूप धारण करना पड़ा. यूरोप में जेहादी समर्थक बड़ी संख्या में मौजूद हैं.

नतीजा ये कि चरमपंथी हमले लगातार जारी हैं, भले ही वे हमले 9/11 जितने विध्वंसक न हों.

चुनौतियां

ऐसे में यह जानना अहम है कि वैश्विक स्तर पर जेहादियों की एकजुटता और ताकत का क्या राज है? कुछ ऐसे कारक हैं जो बताते हैं कि क्यों अल क़ायदा की स्थिति विश्व के देशों में आज भी कमज़ोर नहीं हुई.

सहारा से लेकर दक्षिणी फिलीपींस तक कई स्थानीय और क्षेत्रीय संकट हैं, जिनके कारण जेहादी संगठनों की ताक़त बरक़रार है.

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उदाहरण के लिए नाइजीरिया में बोको हराम ने उत्तरी नाइजीरिया में मुसलमानों के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन शुरू किया, जो साल 2009 के बाद हिंसक हो उठा.

यमन में, अरब प्रायद्वीप में अल क़ायदा अशांति और सुरक्षा पर 2011 के अरब स्प्रिंग के उभार से जो अशांति और सुरक्षा संकट पैदा हुए उनका लाभ उठाने में कामयाब रहा.

असंतोष

चरमपंथ को बढ़ावा देने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है, ख़राब प्रशासन और उसके प्रति जनता का असंतोष.

मुस्लिम बहुल देशों में सरकार और उनकी सुरक्षा सेनाओं को भ्रष्ट, हिंसक और अपमानजनक बताया जा रहा है. इन परिस्थितियों में जेहादियों के समर्थकों और अनुनायियों की संख्या में इज़ाफ़ा होना स्वाभाविक है.

और यह मुद्दा जेहादियों के समर्थन में लोगों को आगे लाने का फिर से एक महत्वपूर्ण कारक बना.

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पाकिस्तान और यमन में कई अमरीकी ड्रोन हमले किए गए. इसमें बड़ी संख्या में जेहादियों के लिए योजना बनाने वाले मारे गए. इन हमलों में महिलाओं और बच्चों सहित कई नागरिकों की भी मौत हुई. इसकी वजह से भी जनता में सरकार के प्रति असंतोष पनपा.

व्यक्तिगत मसले

अब इराक़ जेहादियों के निशाने पर है. अरब दुनिया के अधिकांश लोग इसे इलाक़े की समस्याओं के समाधान के रूप में देखने लगे हैं.

चरमपंथियों के साथ आने वाले कई लोग संगठन से तब जुड़े, जब उन्हें लगा कि उनके धर्म के खिलाफ भेदभाव और अपमान की नीति अपनाई जा रही है.

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अल क़ायदा के कई कट्टर अनुनायी ऐसे युवा हैं, जो पश्चिम के नफ़रत भरे नज़रिए का शिकार हैं. वे अल क़ायदा को रोल मॉडल की तरह देखते हैं.

यूरोप के कुछ जेहादी या तो धर्मांतरण कर रहे हैं या युवावस्था में कठिन समय गुजार रहे हैं और कई पुलिस के साथ संघर्ष में मुसीबत झेल रहे हैं.

दूसरी ओर, जेल में ज़्यादा समय रहने के कारण जेहादी अधिक कट्टर हो उठते हैं. और क़रीब-क़रीब सभी जेहादियों में सरकार के प्रति नकारात्मक नजरिया पैदा हो जाता है.

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