भारत-पाकिस्तान पर लटकी 'महंगाई की तलवार'

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पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में जहां रमज़ान से पहले बढ़ती महंगाई की चर्चा है, वहीं भारत के उर्दू अख़बार कहते हैं कि कमज़ोर मॉनसून से आम लोगों पर महंगाई की मार बढ़ सकती है.

लाहौर से छपने वाले नवाए वक़्त का संपादकीय है- रमज़ान से पहले महंगाई का तूफ़ान.

अखबार कहता है कि रमज़ान से चंद दिन पहले ज़रूरी चीज़ों की किल्लत हो गई है, ख़ासकर चीनी और आटा नहीं मिल रहे हैं. ये हालात तब हैं जब पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ ने रमज़ान में महंगाई पर क़ाबू रखने के लिए पांच अरब रुपए के पैकेज का ऐलान किया है.

आजकल ने इस पर एक कार्टून के ज़रिए तंज़ किया है. इसमें एक फटेहाल इंसान को यह सोचते दिखाया गया है कि यह क़ुरबानी और त्याग का महीना है जबकि एक कारोबारी सोच रहा है कि यह पैसा बनाने का महीना है.

दुनिया की नामी यूनिवर्सिटीज़ में पाकिस्तान की एक भी यूनिवर्सिटी न होने पर जंग ने लिखा है कि बदक़िस्मती है कि पाकिस्तान समेत ज़्यादातर इस्लामी देशों में शिक्षा को पर्याप्त अहमियत नहीं दी जाती और यही पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह है.

अख़बार के अनुसार भारत और ईरान के कई विश्वविद्यालय टाइम्स हायर एजुकेशन की तरफ़ से तैयार इस सूची में शामिल हैं.

विडंबना

वहीं उत्तरी वज़ीरिस्तान में जारी सैन्य अभियान पर भी कई पाकिस्तानी अख़बारों ने संपादकीय लिखे हैं.

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एक्सप्रेस ने जहां अभी तक पाकिस्तानी सेना की कामयाबी का ज़िक्र किया है, वहीं यह भी लिखा है कि दहशतगर्दों के ठिकाने ख़त्म करने के लिए अभी तक तो अफ़ग़ानिस्तान ने कदम नहीं उठाए हैं, लेकिन अभी यह ऑपरेशन शुरू ही हुआ है, तो अभी अफ़ग़ानिस्तान के सहयोग को लेकर कुछ भी स्थायी तौर पर कहना मुश्किल है.

वहीं दैनिक इंसाफ़ कहता है कि सैन्य अभियान तो जारी है, लेकिन असल समस्या वह मानवीय विडंबना है जो क़बायली इलाक़ों में लोगों के बेघर होने से पैदा हुई है.

अख़बार कहता है कि सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वालों में बच्चे और महिलाएं हैं और अभी तक सरकार और सरकारी संस्थाएं बेघरों तक पूरी तरह मदद पहुंचाने में नाकाम रहे हैं.

'जनता होगी बेहाल'

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उधर, भारत में अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने की अटकलों पर हमारा समाज लिखता है कि नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि जिस नेता पर कोई ग़ैक़ानूनी तरीक़ा अपनाने का आरोप होगा, वह बरी होने के बाद ही किसी पद की उम्मीद करे, लेकिन अमित शाह पर तुलसीराम प्रजापति और सोहराबुद्दीन फर्ज़ी मुठभेड़ केस में गंभीर आरोप हैं.

इस बार मॉनसून कमज़ोर रहने की भविष्यावाणियों पर राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि फ़सल ख़राब हुई तो जनता बेहाल हो जाएगी.

अख़बार कहता है कि महंगाई की मार तो पहले से ही पड़ रही है, ऐसे में फ़सल ठीक न होने पर ग़रीब के लिए दो वक़्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होगा.

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