आईएसआईएस के सामने बेबस नहीं है इराक़

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यदि आजकल आप अख़बार पढ़ें या टीवी की ख़बरें देखें तो यह आसान सा लगेगा कि आईएसआईएस एक विजयी फ़ौज है और जैसे जैसे ये बग़दाद की ओर बढ़ रही है रास्ते में आने वाले हर चीज़ पर क़ब्ज़ा कर रही है: शायद वैसे ही जैसे 1975 में वियत कांग साइगॉन की ओर बढ़ रहा था.

यह सच है कि आईएसआईएस इराक़ की राजधानी बग़दाद से महज़ कुछ ही मील की दूरी पर है.

गोली-बारूद की ख़रीदारी

बग़दाद में बंदूक़ों और गोलियों की क़ीमतें तीन गुना बढ़ गई हैं और आप एक कलाश्निकोव राइफ़ल बड़ी मुश्किल से ही ख़रीद सकते हैं. इसका कारण शिया स्वयंसेवकों की ओर से हो रही भारी मांग है.

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10,000 लड़ाकों वाले एक संगठन के लिए बग़दाद पर क़ब्ज़ा करने और उसे बरक़रार रखने के लिए ज़रूरी है कि शिया इराक़ी पूरी तरह हार मान लें, जोकि अकल्पनीय है. ख़ासकर उन बर्बर तस्वीरों को देखने के बाद तो यही लगता है जिन्हें आईएसआईएस लड़ाके ट्विटर और वेबसाइट पर लगातार डाल रहे हैं.

ईरान का प्रभाव

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ईरान ने अपने 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' के अल-कुर्द्स के ब्रगेडियर जनरल क़ासिम सोलेमानी को इराक़ भेजा है. सोलेमानी इस बात के प्रतीक हैं कि ईरान, इराक़ में अपने प्रभाव को संरक्षित रखना चाहता है.

पश्चिमी देशों के राजनयिक वर्तमान समस्याओं के लिए इराक़ के शिया प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी के ईरान की ओर झुकाव को ज़िम्मेदार मानते हैं.

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ह्वाइट हाउस या ब्रिटेन के बयानों से साफ़ ज़ाहिर है कि वे विवेकपूर्ण तरीक़े से ईरान को जगाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो इस समस्या को हल करने में छोटी सी ही सही अपनी भूमिका निभा सके.

असलियत ये है कि सभी यह मानते हैं कि ईरान ही वह अकेली विदेशी ताक़त है जो, परिस्थितियों के गंभीर होने पर, इराक़ को बचा सकता है. यह बात सभी जानते हैं कि इस मामले में हस्तक्षेप न तो ब्रिटेन करेगा न ही अमरीका.

आईएसआईएस का उभार

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केवल एक साल पहले अधिकांश लोगों का विश्वास था कि इराक़ एकजुट राष्ट्र के रूप में उभरेगा. कुर्दों का उत्तर-पूर्वी हिस्से पर क़ब्ज़े का मक़सद आज़ादी था, इसके बावजूद इस बात पर वे समहत हैं कि कुर्द इराक़ का हिस्सा रहेगा.

इराक़ के बाक़ी हिस्सों में सुन्नियों को शियाओं का शासन नापसंद होता चला गया और इराक़ में रहना शक्ति संतुलन को झुठलाने जैसा था.

मगर अब आईएसआईएस के उभार ने सब कुछ बदल दिया.

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आठ साल पहले अल-क़ायदा के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने वाले कई सुन्नी, विशेषकर रूढ़िवादी, इस बात से बिलकुल ख़ुश नहीं हैं कि आईएसआईएस उनके शहरों और क़स्बों पर क़ब्ज़ा करे. ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने अमरीकी फ़ौजो को इराक़ से निकलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

लेकिन शिया स्वयंसेवकों की ओर से किए जा रहे मौजूदा मुक़ाबले का ख़तरा ये है कि इससे साधारण सुन्नी पीड़ित होंगे और उन्हें ये महसूस होगा कि आईएसआईएस ही अकेला संगठन है जो उनकी रक्षा कर सकता है.

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