'झूठ, कपट का पुलिंदा हाफ़िज़ सईद'

  • 1 जुलाई 2014
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हाफ़िज़ सईद जैसे लोगों के साथ समस्या यह है कि उनके पास कुछ भी नया, रचनात्मक और सकारात्मक कहने को नहीं है. वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चरमपंथी संगठन के तौर पर जाने जाने वाले लश्कर-ए-तैयबा और इसके नए अवतार जमात-उद-दावा के प्रमुख हैं.

उनकी घिसी-पीटी बातें छल-कपट से भरी हैं. बीबीसी से बातचीत में उनका वही पुराना रूप नज़र आया है. हाफ़िज़ सईद और उनके अनुयायियों को इसका अहसास नहीं है कि वो जिस धर्म को मानते हैं, उसमें झूठ और कपट गुनाह माने जाते हैं.

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अगर वो अपने धर्म के इतने सच्चे अनुयायी हैं और अगर उन्हें इस बात का विश्वास है कि उनकी जनसभाओं में घृणा और हिंसा पर की गई बातें सही हैं, तो वो अपने साक्षात्कारों में क्यों नहीं अपनी और अपनी संस्था की असलियत बताते?

हाफ़िज़ सईद का यह कहना कि लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा का कोई ताल्लुक़ नहीं है, सच से परे है.

'काल्पनिक'

यह पूरी तरह काल्पनिक है और जमात-उद-दावा के ख़ूनी कामों पर पर्दा डालने जैसा है.

यह सच है कि जमात-उद-दावा कुछ कल्याणकारी कामों से जुड़ी संस्था है, लेकिन इसका मुख्य काम है हिंसात्मक जेहाद का निर्यात.

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स्कूलों, अस्पतालों में सहायता कामों में हाथ बंटाना अतिवादी इस्लाम के ज़हरीले और कुटिल एजेंडे को आगे बढ़ाना है.

हिंसा भड़काना, घृणा फैलाना, जेहादी प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाना हाफ़िज़ सईद के भाषणों का मुख्य हिस्सा होता है. कई ऑडियो और वीडियो टेप इस बात के सुबूत हैं.

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उनकी यह सफ़ाई कि इस बात का सबूत नहीं है, आधा सच है क्योंकि वो और उनकी संस्था क्या काम कर रहे हैं इस पर गुप्त सूचनाओं की कोई कमी नहीं है. ऐसे सबूत नहीं हैं जो अदालत में रखे जा सकें. हाफ़िज़ सईद इसी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं.

प्रतिबंध

पाकिस्तानी अदालतों द्वारा हाफ़िज़ सईद को छोड़ दिए जाने पर नासमझ ही भरोसा करेंगे. पाकिस्तानी अधिकारियों ने हाफ़िज़ सईद के मामले पर कभी भी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया है. कभी भी अदालतों में हाफ़िज़ सईद के ख़िलाफ़ मज़बूत सबूत पेश नहीं किए गए.

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और अगर ऐसा होता भी, तो इसकी संभावना कम है कि हाफ़िज़ सईद की ज़बरदस्त शोहरत देखते हुए पाकिस्तान की ‘स्वतंत्र न्याय व्यवस्था’ का कोई न्यायाधीश हाफ़िज़ सईद को जेल भेजने की हिम्मत करेगा.

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यह बात सभी जानते हैं कि एक दशक पहले लश्कर-ए-तैयबा पर प्रतिबंध लगने से पहले तक लश्कर और जमात एक ही संस्था थी. इसके बावजूद अमरीका को जमात-उद-दावा को चरमपंथी संगठन घोषित करने में इतना वक़्त लगा.

शायद इसका कारण यह है कि अमरीका मोदी सरकार से नज़दीकी बढ़ाना चाहता है पर इसके बावजूद जमात उद दावा को अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठन घोषित किए जाने का स्वागत होना चाहिए.

(ये सुशांत सरीन के निजी विचार हैं)

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