क्या भारत 'मोडीफ़ाई' करेगा नेपाल नीति?

  • 2 अगस्त 2014
इमेज कॉपीरइट AFP

नेपाल और भारत के बीच 1800 किलोमीटर लंबी खुली और अनियंत्रित सीमा है. दोनों देशों की साझी संस्कृति और सभ्यता है और यही वजह है कि उनके रिश्ते भी राजनीति और अर्थव्यवस्था से कहीं आगे हैं.

ऐसे में उच्च राजनीतिक स्तर पर यात्राएं भी सामान्य से अलग ही होनी चाहिए. फिर भी अगले हफ़्ते मोदी की नेपाल यात्रा 17 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय यात्रा होगी.

इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि दोनों तरफ़ कई मुद्दे हैं. ख़ासकर नेपाल में इस दौरान निराशा बढ़ी है.

इसलिए जब मोदी नेपाली प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के साथ बातचीत के लिए बैठेंगे, तो उनके सामने द्विपक्षीय महत्व के कई मुद्दे होंगे.

पढ़ें मोदी की नेपाल यात्रा पर विश्लेषकों की राय

उनकी यात्रा से पहले नेपाली बुद्धिजीवियों और विश्लेषकों ने पांच ऐसे बिंदुओं की ओर इशारा किया, जिन्हें वे अहम समझते हैं.

1. राजनीतिक रिश्ते

द्विपक्षीय मुद्दों को लेकर नेपाल का दौरा करने वाले आख़िरी भारतीय प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल थे, जो 1997 में आए थे. अटल बिहारी वाजपेयी 2002 में सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने काठमांडू आए थे.

नेपाली विश्लेषक मानते हैं कि इस अंतराल में भारतीय नेतृत्व ने नौकरशाही और ख़ुफ़िया तंत्र को नेपाल से जुड़े मामलों में दखलंदाज़ी की छूट दी, जिसने नेपालियों में एक नकारात्मक भावना की ज़मीन तैयार की.

इमेज कॉपीरइट EPA

उनके मुताबिक़ मोदी का दौरा इस ग़लती को सुधार सकता है और एक बार फिर द्विपक्षीय संबंधों को राजनीतिक स्तर तक ला सकता है, जो होना चाहिए.

2. पुराने/अधूरे समझौतों पर अमल

नए वादों के बजाय बेहतर होगा कि भारत पुराने वादों को निभाए. ऐसी कई परियोजनाएं हैं जिन पर बड़े-बड़े समझौतों के बावजूद कार्यवाही नहीं हुई है.

पिछले हफ़्ते भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की यात्रा के बाद जारी संयुक्त प्रेस बयान देखने से पता चलता है कि ऐसे कितने वादे अभी तक निभाए नहीं गए हैं- पंचेश्वर बहुद्देशीय परियोजना से लेकर तराई की सड़कों और सीमा पार रेलवे संपर्क कायम करने तक.

3. बिजली व्यापार समझौता

वह समझौता जो सच में नेपाल की अर्थव्यवस्था बदल सकता है, तो वह है बिजली व्यापार समझौता (पीटीए). वर्तमान में नेपाल अरबों रुपए के व्यापारिक घाटे से जूझ रहा है. इसे भारत को पनबिजली बेचकर पूरा किया जा सकता है.

फिलहाल दोनों देश समझौते के मसौदे को लेकर बातचीत में जुटे हैं. भारत की तरफ़ से भेजे गए मसौदे की कुछ शर्तों में इस्तेमाल की गई संदिग्ध शब्दावली की वजह से विवाद खड़ा किया था. नेपालियों के एक वर्ग ने इसे देश के जल संसाधनों पर भारत के आधिपत्य जमाने की कोशिश की तरह देखा था.

इमेज कॉपीरइट AFP

हालांकि स्वराज ने पिछले हफ़्ते नेपाली पक्ष को आश्वस्त किया था कि भारत केवल वही बिजली खरीदना चाहता है जो नेपाल की घरेलू ज़रूरत से ज़्यादा है. इस बाबत समझौता होता है तो इसका स्वागत होगा.

4. ‘असमान’ क़रार में सुधार

नेपाल और भारत के संबंधों की आधारशिला है 1950 की दोस्ती का क़रार. मगर नेपालियों का बड़ा वर्ग इसे असमान मानता है. इससे ऐसी ताक़तों को बल मिलता है जो इसका सियासी फ़ायदा उठाना चाहती हैं. ऐसे अहम द्विपक्षीय क़रार को राजनीतिक फ़ुटबॉल बनाने की इजाज़त नहीं मिलनी चाहिए.

सुषमा स्वराज के दौरे में दोनों सरकारें पहली बार अपने विदेश सचिवों को क़रार में ज़रूरी बदलाव सुझाने का आदेश देने पर सहमत दिखीं. इस दिशा में मोदी की प्रतिबद्धता से इस मुद्दे को सुलझाने में मदद मिलेगी.

5. सीमा विवाद का समाधान

नेपाली काफ़ी समय से भारत की तरफ़ से अपनी सीमा में अतिक्रमण की शिकायत करते रहे हैं. इनमें से ख़ासकर कालापानी और सुस्ता इलाक़े का विवाद चिंता का विषय रहा है.

भारतीय कहते हैं कि 98 फ़ीसदी सीमा विवाद सुलझ गया है. मगर इसका पूर्ण समाधान ऐसी ताक़तों को नाकाम करेगा जो इसके सहारे संबंधों में रोड़े अटकाना चाहती हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार