क्या भारत इसराइल के साथ है?

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ग़ज़ा में संयुक्त राष्ट्र के एक स्कूल पर इसराइली बमबारी की निंदा करते हुए संयुक्त राष्ट्र के एक प्रवक्ता अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और प्रेस कॉन्फ़्रेंस में रो पड़े.

उन्होंने कहा कि ग़ज़ा की त्रासदी अब एक ऐसे चरण में पहुंच गई है जहां शब्द नहीं बल्कि आंसू ही इस दर्द को बयां कर सकते हैं.

चंद दिनों पहले जब भारतीय संसद में विपक्षी दलों ने ग़ज़ा की स्थिति पर एक प्रस्ताव मंज़ूर करने के लिए सरकार से बहस कराने की मांग की तो सरकार का कहना था कि ग़ज़ा की स्थिति पर बहस देश के हित में नहीं है क्योंकि इसके दोनों ही पक्षों से भारत के दोस्ताना रिश्ते हैं.

सभापति के हस्तक्षेप से सदन में बहस तो हुई लेकिन सरकार ने किसी तरह का प्रस्ताव पास करने से साफ़ इनकार कर दिया.

फ़लस्तीन से पुराने रिश्ते

सरकार का रुख़ यही था कि हमास को संघर्ष विराम के लिए तैयार होना चाहिए. पिछले दिनों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से एक पत्रकार ने ग़ज़ा पर इसराइली हमले के बारे में भारत के पक्ष को लेकर जब सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि भारत सरकार फ़लस्तीनियों की संघर्ष का समर्थन करती है और इसराइल भारत का एक क़रीबी दोस्त है.

भारत फ़लस्तीनियों का बहुत क़रीबी दोस्त रहा है और एक फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण के उनके संघर्ष में भारत ने साथ दिया है लेकिन भारत में फ़लस्तीनियों के लिए ये समर्थन कम होता जा रहा है.

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भारत अब इसराइल का एक भरोसेमंद सहयोगी है वो इसराइल से सैन्य साज-सामग्री ख़रीदने वाला सबसे बड़ा देश है.

रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में ही नहीं डेयरी, सिंचाई, ऊर्जा और बहुत से तकनीकी क्षेत्रों में इसराइल भारत के साथ साझेदारी कर रहा है.

भाजपा इसराइल के समर्थन में

पिछले कुछ सालों में इसराइल भारत के बहुत क़रीब आया है. भारत में जिस तरह फ़लस्तीनियों के लिए सहानुभूति है उसी तरह आबादी के एक बड़े हिस्से में शुरू से ही इसराइल का समर्थन भी रहा है.

भाजपा और हिंदू संगठन इसराइल के समर्थन में रहे हैं और अब भी हैं.

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दक्षिणपंथी विचारक और विश्लेषक फ़लस्तीनियों का समर्थन करने को मुसलमान वोट हासिल करने की सियासत के तौर पर देखते हैं.

फ़ेसबुक, ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया पर ऐसे लोग काफ़ी सक्रिय हैं.

भारत अगर चाहता तो वो हमास की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए ये कह सकता था कि ग़ज़ा में इसराइली बमबारी से जिस बड़े पैमाने पर आम लोग मारे गए हैं और जिस तरह शहरी इलाकों, अस्पतालों और स्कूलों को निशाना बनाया जा रहा है उसे कतई मंज़ूर नहीं किया जा सकता और इसका कोई शांतिपूर्ण हल निकलना चाहिए.

अपनी ख़ामोशी से भारत ये साफ़ संदेश देना चाहता है कि वो इस संघर्ष में अगर इसराइल के साथ नहीं है तो कम से कम इसराइल के ख़िलाफ़ भी नहीं है.

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