पाकिस्तान: 'बस सब्र का फल खाओ'

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पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में ग़ज़ा संकट पर जहां लगातार संपादकीय लिखे जा रहे हैं, वहीं इस बात को लेकर संतोष जताया गया है कि इस बार पाकिस्तान में ईद का त्यौहार शांति के साथ बीता.

लाहौर से छपने वाले नवाए वक़्त ने लिखा है- कई साल बाद ईद दहशतगर्दी से पाक.

अख़बार कहता है कि पाकिस्तान एक दशक से भी ज़्यादा समय से दहशतगर्दी की चपेट में है और इस दौरान चरमपंथी हर राष्ट्रीय त्योहार को ख़ून से नहला देते थे, लेकिन शुक्र है कि इस बार देश में ईद-उल-फ़ितर पर दहशतगर्दी की कोई वारदात नहीं हुई.

वहीं दैनिक एक्सप्रेस का गज़ा संकट पर संपादकीय है- ईद भी फ़लस्तीनियों के ख़ून से लहूलुहान. अख़बार के मुताबिक़ ईद पर ख़ुशियां मनाने के बजाय फ़लस्तीनी माएं अपने बच्चों की लाशें उठाती रहीं और विलाप करती रहीं.

अख़बार कहता है कि इसराइल की बर्बरता और फ़लस्तीनियों का दर्द बयान करते हुए संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता रो पड़े.

इस्लामाबाद में सेना

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गज़ा संकट पर ही रोज़नामा आज लिखता है कि गज़ा में सिर्फ़ अस्थायी संघर्ष विराम से काम नहीं चलेगा.

अख़बार कहता है कि 72 घंटे का संघर्षविराम लाशें उठाने और घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए पहले ही कम था कि उसका उल्लंघन भी हो गया.

बावजूद इसके अख़बार ने कहा है कि इसराइल की कार्रवाई पर विश्व समुदाय की चुप्पी हैरान करती है.

जंग ने राजधानी इस्लामाबाद में तीन महीनों के लिए सेना की तैनाती के मुद्दे पर संपादकीय लिखा है.

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अख़बार कहता है कि सुरक्षा आशंकाओं के मद्देनज़र यह क़दम उठाया गया है और इसे लेकर सेना को विवादों में घसीटना सही नहीं है.

अख़बार के मुताबिक़ उत्तरी वजीरिस्तान में सेना के अभियान के कारण राजधानी में चरमपंथी हमले कर सकते हैं.

वहीं दैनिक औसाफ़ में एक दिलचस्प कार्टून है. इसमें फल वाला पास ही खड़े एक व्यक्ति से कह रहा है- ग़रीब हो तो 'बस सब्र का फल' खाओ.

'बदलाव के संकेत'

भारतीय उर्दू अख़बारों में सहाफ़त ने धार्मिक स्वतंत्रता पर जारी होने वाली सालाना अमरीकी रिपोर्ट का ज़िक्र किया है, जिसमें इस बार नरेंद्र मोदी का नाम शामिल नहीं है.

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इससे पहले गुजरात दंगों के हवाले से उनका नाम इसमें अक्सर आता था. अख़बार के मुताबिक़ यह न सिर्फ़ मोदी के हक़ में है, बल्कि भारत और अमरीका के रिश्तों में भी बदलाव का संकेत है.

पिछले दिनों आई एक रिसर्च पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस का संपादकीय है- अब मुर्ग़े का गोश्त भी नुकसानदेह.

रिसर्च के मुताबिक़ दिल्ली और उसके आसपास बिकने वालों मुर्गों को जल्दी से जल्दी बड़ा करने के लिए एंटीबायोटिक दवाएं दी जा रही हैं.

इसके अलावा गज़ा का संकट भी भारतीय अख़बारों में छाया है.

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