इस्लामिक स्टेट को कैसे हराया जा सकता है?

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सुन्नी चरमपंथी गुट इस्लामिक स्टेट (आईएस) के कारण आज इराक़ फिर संकट में घिरा है.

ये गुट जहां सीरिया के बहुत से हिस्सों पर नियंत्रण कर चुका है, वहीं इराक़ में मोसूल समेत कई शहर उसके अधीन हो चुके हैं और इसीलिए अमरीका ने वहां हवाई हमले करने का फ़ैसला किया है.

इराक़ के दूसरे सबसे बड़े शहर मोसूल पर क़ब्ज़ा करने के बाद आईएस ने अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में ख़लीफ़ा के राज यानी इस्लामिक स्टेट की घोषणा की है.

लेकिन इस गुट को कैसे रोका जाए, आइए इस बारे में पढ़ते चार जाने-माने विश्लेषकों की राय.

'कई साल तक चुनौती बना रहेगा आईएस'

ब्रायन फिशमैन (न्यू अमरीका फाउंडेशन): इस्लामिक स्टेट को हवाई हमलों से कमज़ोर किया जा सकता है लेकिन उसे हराया तभी जा सकेगा जब उसके सुन्नी समर्थक उसके ख़िलाफ़ हो जाएं. इसके लिए सीरिया और इराक़ में जिम्मेदार सरकारें होनी ज़रूरी हैं.

इराक़ी प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी तो हट गए लेकिन इससे समस्या नहीं सुलझेगी. ये बस इराक़ में ऐसी सरकार स्थापित करने की दिशा में पहला कदम हो सकता है जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो.

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Image caption कुर्द बलों का कहना है कि उन्हें अमरीकी हवाई हमलों से मदद मिली है

सच कहूं तो मुझे नहीं लगता कि मलिकी के उत्तराधिकारी इस काम को करने के इच्छुक या इसमें समर्थ हैं, लेकिन इसमें जोखिम है जिसे स्वीकार करना होगा.

आईएस को युद्ध और डर से ताक़त मिलती है. इस गुट को रोकने के लिए स्थिरता को मज़बूत करना होगा. तुरत-फुरत इस्लामिक स्टेट को हराए जाने की संभावना नहीं दिखती लेकिन इसके लिए एक रणनीति बनानी होगी और उस पर काम करना होगा.

'ईरान और अमरीका एक ही लक्ष्य'

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Image caption ईरानी राष्ट्रपति हसन रुहानी के लिए आईएस के कारण क्षेत्र में बढ़ती अस्थितरता एक चुनौती है

मोहम्मद अली शबानी (ईरानी राजनीतिक विश्लेषक): ईरान और अमरीका के बीच बहुत सारे मुद्दों पर मतभेद है लेकिन जब बात आईएस की आती है तो उनका एक ही लक्ष्य है.

सीरिया और ईरान की सरकारों के बीच ईरान सैन्य और ख़ुफ़िया सहयोग को बेहतर करने में मदद कर सकता है.

अगर आईएस को इराक़ में कड़ी टक्कर दी जाती है तो वो सीरिया से हटने लगेगा. अगर इराक़ी अधिकारी अपने पत्ते ठीक से फेंकें तो वो एक बार फिर अमरीका और ईरान के बीच बातचीत की ज़मीन तैयार कर सकते हैं.

ईरान और अमरीका के बीच मैदान-ए-जंग बनने की बजाय पुल बनने का इराक़ को कहीं ज़्यादा फ़ायदा होगा.

अगर इराक़ी और कुर्द बल एकजुट होकर काम करें और उन्हें ईरान और अमरीका से मदद मिले तो आईएस के ख़िलाफ़ हमले कहीं ज़्यादा कारगर होंगे और इस्लामिक स्टेट के स्थानीय और क्षेत्रीय समर्थकों को कमज़ोर किया जा सकता है.

'क्षेत्रीय रणनीति की ज़रूरत'

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Image caption आईएस में चरमपंथियों में बहुत से विदेशी भी शामिल हैं

जेन केनिनमोंट (चैटम हाउस): आईएस से निपटने के लिए अमरीकी हवाई हमलों से कहीं अहम नूरी अल मलिकी का प्रधानमंत्री पद छोड़ना है.

नए प्रधानमंत्री हैदर अल-अबादी में प्रतिद्वंद्वी धड़ों शिया, सुन्नी और कुर्दों को साथ लेकर चलने और उनके बीच राजनीतिक आम राय बनाने की कितनी क्षमता है, इस बात पर इराक़ का आने वाला घटनाक्रम बहुत हद तक निर्भर करेगा.

सुन्नी चरमपंथियों ने ही 2007-08 में आईएस के पूर्ववर्ती अल क़ायदा को हराया था. बावजूद इसके नूरी अल मलिकी की सरकार ने सुन्नियों को ही संभावित आतंकवादी कहकर निशाना बनाया था. हालांकि आईएस की दूसरों को बर्दाश्त न करने की विचारधारा लोकप्रिय नहीं है, लेकिन इराक़ सरकार भी उतनी ही अलोकप्रिय है.

आईएस को हराने के लिए ज़रूरी है कि उसे मिलने वाली आर्थिक सहायता को रोकने के लिए एक क्षेत्रीय रणनीति बनाई जाए और सबसे अहम सीरिया के संकट को सुलझाया जाए. वहीं से इसके ज़्यादातर लड़ाके कट्टरपंथी बने हैं.

आईएस को न तो ईरान पसंद है और न ही सऊदी अरब. तो क्या ये दोनों क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी एक साझा हित के लिए एकजुट होंगे और अबादी की मदद करेंगे.

'सुन्नी और कुर्दों को साथ लेना जरूरी'

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Image caption आलोचकों का कहना है कि नूरी अल मालिकी की नीतियों के कारण आईएस जैसे गुटों को पनपने का मौक़ा मिला

एंथनी कॉर्डसमैन (सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़): इस्लामिक स्टेट को सैन्य रूप से नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से हराना होगा.

नई सरकार को सुन्नी और कुर्दों को साथ लेकर चलना होगा, उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं होगा और देश की राजनीतिक शक्ति और तेल संपदा पर सबका हक़ है.

अमरीका इस काम में बस मदद कर सकता है, लेकिन कामयाबी तभी मिलेगी जब इराक़ी एकजुटता के इच्छुक होंगे. हालांकि फिर भी ये नहीं कहा जा सकता है कि सफलता निश्चित है.

नूरी अल-मलिकी जिस तरह देश को विभाजन और गृह युद्ध की तरफ़ ले गए, उसे देखते हुए आईएस को हराना इतना आसान नहीं है. अगर उसे हरा भी दिया गया या वो ध्वस्त हो गया तो भी इराक़ विभाजित हो सकता है.

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