'जिनमें सांस थी, उन पर फिर गोली दागी'

''उन्होंने हमें लाइन में खड़ा किया. वो हमसे दो मीटर दूर खड़े थे. इसी के साथ उन्होंने तेज़ी से गोलियां चलानी शुरू कर दीं. गोलियां दागने के बाद वो यह देखने आए कि कहीं कोई ज़िंदा तो नहीं बचा है. जिनमें ज़रा भी सांस बाक़ी थी, उन पर उन्होंने फिर से गोलियां दागीं.''

ये शब्द हैं इराक़ में कुछ दिन पहले हुए नरसंहार में बचे राफ़ेद सईद के. इसमें इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों ने 80 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.

बीबीसी संवाददाता याल्दा हकीम ने उनसे अस्पताल में मुलाक़ात की, जहां उन्होंने अपने साथ गुज़रे उन ख़ौफ़नाक पलों की जानकारी दी.

पढ़ें राफ़ेद की ज़ुबानी सामूहिक हत्याकांड का ख़ौफनाक मंजर...

वो हमारे गांव के मुखिया के पास आए और बोले कि अपने हथियार जमा कर दो और तुम लोग सुरक्षित रहोगे. हमने अपने सभी हथियार इकट्ठे किए और उनकी गाड़ियों में रख दिए. अगले दिन वो फिर आए और कहा कि हम तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुंचाएंगे.

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हमने रात में खाना इकट्ठा करने की कोशिश की पर हम नहीं कर पाए क्योंकि हमारे साथ बहुत सी औरतें और बच्चे थे. हमने अपने सभी रिश्तेदारों को फ़ोन किए और बताया कि हमें घेर लिया गया है और हमारी रक्षा के लिए किसी को भेजें या प्रशासन को सूचित करें. मगर कोई नहीं आया.

ऐसे ही कुछ दिन और बीत गए. इसके बाद हथियारबंद लोगों से भरी 20 कारें गांव में आईं और वो पूरे गांव में फैल गए. उन्होंने हम सबको एक स्कूल की इमारत में इकट्ठा किया. इनमें मर्द औरतें और बच्चे सभी थे.

उनके नेता ने कहा कि इनसे पैसा, सोना और मोबाइल ले लो. हमने उन्हें सब कुछ सौंप दिया. आधा घंटे बाद उनका नेता हमारे पास फिर आया और बोला कि हम तुम्हें जाने देंगे.

इसके बाद हम सबको उन्होंने चार गाड़ियों में लाद दिया. हर गाड़ी में 10-10 लोग थे. मैं पहले काफ़िले में था. वो हमें गांव के किनारे पर ले गए.

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हर गाड़ी में चार हथियारबंद आदमी थे. उन्होंने हमें लाइन में खड़ा किया. वो हमसे दो मीटर दूर खड़े थे. इसी के साथ उन्होंने तेज़ी से गोलियां चलानी शुरू कर दीं. गोलियां दागने के बाद वो यह देखने आए कि कहीं कोई ज़िंदा तो नहीं बचा है. जिनमें ज़रा भी सांस बाक़ी थी, उन पर उन्होंने फिर से गोलियां दागीं. इसके बाद वो हमें दफ़नाने के लिए एक बुलडोज़र ले आए.

इसकी वजह से मुझ पर बहुत धूल का गुबार उड़ रहा था और मैं इसका फ़ायदा उठाकर वहां से बच निकलने में कामयाब रहा. मैं 12 घंटे तक चलता रहा और देर रात में सिंजार पर्वत पर पहुंचा.

अब मेरा परिवार मेरे साथ नहीं है. मुझे पता है कि उन्होंने उन्हें भी पकड़ रखा है और जो बचे हैं वो सभी मारे गए हैं.

मैं नहीं जानता कि मैं क्या करूं. अब तो ख़ुदा ही मेरी कोई मदद करे.

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