पांच हज़ार अफ़ग़ानों की मौत की सूची

युद्ध अपराध में मारे गए अफ़ग़ान

नीदरलैंड्स में एक वकील ने 1978 में मारे गए पांच हज़ार अफ़ग़ानों की सूची सार्वजनिक की तो अतीत के कई राज़ खुले और पता लगा कि नरसंहार में शामिल कई लोग अब यूरोप के विभिन्न देशों में रह रहे हैं.

एक साल पहले सार्वजनिक हुई इस सूची ने अफ़ग़ानिस्तान में शोक की लहर दौड़ा दी थी.

ये वे लोग थे जो 1978 में अफ़गानिस्तान में साम्यवादी सरकार के तख़्तापलट के दौरान मारे गए थे. ख़ास बात यह है कि जिनके हाथ इस नरसंहार के खून से रँगे हैं उनमें से कुछ अब भी यूरोप में रह रहे हैं.

सूची इंटरनेट पर डालने से कौन से राज़ फ़ाश हुए, पढ़ें

वकील के मुताबिक नीदरलैंड्स और यूरोप के दूसरे देशों में रह रहे कई अफ़ग़ान नागरिकों के ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों में मुक़दमा चलाने के पर्याप्त सबूत हैं.

संदिग्ध नहीं जानते थे कि उनकी जांच की जा रही है और इस बात का पता तब चला जब अदालत का फ़ैसला आने से पहले एक ऐसे ही संदिग्ध की मौत हो गई.

अदालत की कागजी कार्रवाई में उनका नाम सिर्फ़ 'कमांडर ओ' दर्ज था, लेकिन सूची सार्वजनिक होने के बाद उनका पूरा नाम अमानुल्लाह उस्मान होने का पता चलता है.

नीदरलैंड्स में, उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के ख़ुफ़िया पुलिस के पिछले जीवन के बारे में इस विश्वास के साथ कुछ नहीं बताया कि शरण लेने की अर्जी में यह उनकी मदद करेगा.

उन्होंने तर्क दिया कि अगर वह अपने अतीत की जानकारी सार्वजनिक कर देते, तो उन्हें अफ़ग़ानिस्तान लौटाया जा सकता था, जहां उनकी जान को ख़तरा था. लेकिन उस्मान को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि यहां उनके ख़िलाफ़ युद्ध अपराध का मुकदमा चलेगा.

गुनाह कबूल

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यह पूछे जाने पर कि उनकी हिरासत में क्या किसी व्यक्ति के साथ अत्याचार किया गया, उस्मान ने कहा, "बिल्कुल, और मैं ही उस अत्याचार के लिए ज़िम्मेदार था. अफ़ग़ानिस्तान में चीज़ें इसी तरह से चलती हैं."

उस्मान के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए बड़े पैमाने पर सबूत इकट्ठा किए गए. इसमें वे दस्तावेज़ भी शामिल थे जिन पर कमांडर उस्मान के दस्तख़त थे.

उस्मान की मौत के बाद सरकारी वकील थिस बर्जर ने सबूतों के कुछ हिस्सों को सार्वजनिक कर दिया था ताकि पीड़ितों के रिश्तेदारों को जानकारी हासिल हो सके.

इसमें 1978 और 1979 में मारे गए करीब 5,000 लोगों की सूची भी शामिल थी.

इस सूची के सार्वजनिक होने का अफ़ग़ानिस्तान पर भारी असर पड़ा और मृतकों की याद में कई शोक सभाएँ आयोजित हुईं.

कुछ ख़ुशकिस्मत

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सूची में शामिल कुछ लोग बचने में कामयाब रहे. जिनके दोस्त ताक़तवर थे, उन्हें मौत देने की बजाय छोड़ दिया गया. ऐसे ही एक व्यक्ति को बाद में इस सूची में जोड़ा गया जिन्होंने अपना नाम सय्याफ़ उर्फ़ अब्दुल रसूल बताया.

सय्याफ़ किसी ज़माने में कुख्यात गुरिल्ला लीडर हुआ करते थे. उन्होंने ही ओसामा बिन लादेन को अफ़ग़ानिस्तान आने का न्यौता दिया था.

हालांकि वो 1990 के दशक में युद्ध अपराधों में किसी तरह से भी शामिल होने से इनकार करते हैं. उस साल हुए राष्ट्रपति चुनाव में वह सफल नहीं हो सके थे.

ख़ौफनाक रातें

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नरसंहार के इस दौर में बच निकलने में कामयाब रहे हबीब रहमान. 1979 में वह एक साल तक अत्याचार सहने के बाद ऑस्ट्रेलिया में जा बसे थे.

उन्होंने इंटरनेट पर जारी की गई इस सूची में जब अपना नाम देखा तो एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान में उसी जगह पुल-ई-चर्की लौटे जहां उन्हें क़ैद में रखकर भारी यातनाएं दी गई थीं.

हबीब बताते हैं, "वे हर रात आते थे, आधी रात के बाद नाम पुकारते थे और लोगों को मारते थे. अगर आपका नाम सूची में नहीं है तो आप अगले 24 घंटे के लिए ज़िंदा रहते थे."

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