पाकिस्तान: हंगामा है क्यों बरपा..

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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद लगभग बीस दिनों से सियासी ताक़त का अखाड़ा बनी है.

ये संकट ऐसे मोड़ पर आ पहुंचा है कि हर रोज़ आशंकाओं के बादल गहरा रहे हैं.

एक पाले में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ हैं तो दूसरी तरफ़ विपक्षी नेता इमरान ख़ान और धार्मिक नेता ताहिरुल क़ादरी. ये दोनों प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के इस्तीफ़े पर अड़े हैं.

हालांकि प्रधानमंत्री ने साफ़ किया है कि वो न तो इस्तीफा देंगे और न ही छुट्टी पर जाएंगे.

इस पूरे संकट में सबसे दिलचस्पी के साथ नज़रें पाकिस्तानी सेना पर टिकी हैं. इस राजनीतिक संकट को समझने के लिए पढ़िए इससे उपजे अहम सवाल और उनके जवाब:

क्यों शुरू हुआ संकट ?

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इमरान ख़ान और क़ादरी का लक्ष्य अब भले ही एक दिखता हो लेकिन उन्होंने अलग अलग मांगों के साथ 14 अगस्त को नवाज़ शरीफ़ सरकार के ख़िलाफ़ मार्च की शुरुआत की थी.

इमरान ख़ान पिछले साल मई में हुए आम चुनावों में धांधली का आरोप लगाते हैं और इसी आधार पर वो नवाज़ शरीफ़ की जीत और उनकी सरकार को जाली बताते हैं.

इन चुनावों में 342 वाली राष्ट्रीय संसद के लिए नवाज़ शरीफ़ की पार्टी के 166 सदस्य चुने गए जबकि 35 सांसदों के साथ इमरान ख़ान की तहरीके इंसाफ़ पार्टी तीसरे नंबर पर रही.

चुनावों में दूसरा स्थान पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को मिला जिसके 45 सांसद चुने गए, जो इस पूरे संकट में तटस्थ नज़र आती है.

आम चुनावों के बाद ही इमरान ख़ान ने धांधली के आरोप लगाने शुरू कर दिए थे. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर कथित धांधली से जुड़ी उनकी शिकायतों को नहीं सुना गया तो वो देशव्यापी आंदोलन करेंगे.

हालांकि इन्हीं चुनावों में पाकिस्तान के चार में एक प्रांत ख़ैबर पख़्तून ख्वाह में इमरान ख़ान की पार्टी की सरकार बनी.

इमरान कितने कामयाब?

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इमरान की पार्टी ने चार संसदीय निवार्चन क्षेत्रों में धांधली का आरोप लगाया और सरकार से वोटों की दोबारा गिनती करने की मांग की, जिस पर शुरुआत में सरकार ने कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया.

इमरान के दावों को उस वक़्त बल मिला जब हाल में चुनाव आयोग के एक पूर्व अधिकारी अफज़ल ख़ान ने चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगाए.

इसी मुद्दे पर इमरान का मौजूदा सरकार विरोधी आंदोलन टिका है. हालांकि कोई जांच समिति इन चार सीटों पर फ़ैसला इमरान ख़ान के हक में भी दे दे तो उससे नवाज़ शरीफ़ की सरकार के लिए कोई ख़तरा नहीं होगा.

कई विश्लेषक मानते हैं कि नवाज़ शरीफ़ अगर शुरू में ही इमरान ख़ान की शिकायतों पर ध्यान देते तो ये संकट यहां तक नहीं पहुंचता.

वैसे पाकिस्तान में पिछले आम चुनाव इसलिए ख़ास रहे कि पहली बार एक निर्वाचित सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा करके एक चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंपी थी.

इमरान के आलोचक उन पर अति महत्वकांक्षी होने का आरोप लगाते हैं और कहते हैं कि चुनावों में उम्मीद के मुताबिक कामयाबी हासिल न कर पाने से वो हताश हैं.

वहीं उनकी पार्टी में भी कई नेता उन पर अलोकतांत्रिक कदम उठाने के भी आरोप लगाते हैं. कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि इमरान को अब तक इस धरने से क्या मिला है.

क्या चाहते हैं क़ादरी?

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पाकिस्तानी आवामी तहरीक के नेता ताहिरुल कादरी का संबंध तो पाकिस्तान से ही है लेकिन वो लंबे समय से कनाडा में रह रहे हैं.

पिछले साल हुए आम चुनावों से पहले उन्होंने पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था, तो अब वो नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे हैं.

इस साल जब वो जून में पाकिस्तान आए तो उससे पहले ही लाहौर में उनके समर्थकों पर हुई पुलिस की कार्रवाई में 11 लोग मारे गए थे.

इस मामले में पुलिस ने एक मामला दर्ज किया है जिसमें नवाज़ शरीफ़ का नाम भी आया है.

कादरी इस मामले में नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा चलाना चाहते हैं और इस एफ़आईआर से संतुष्ट नहीं हैं.

अपने भाषणों में वो जहां राजनीति और राजनेताओं को बराबर निशाना बनाते हैं, वहीं पाकिस्तानी सेना की तारीफ़ करते नहीं थकते हैं.

वो इस्लाम और अध्यात्म पर कई किताबें लिख चुके हैं. वो कई देशों की यात्राएं कर चुके हैं और फरवरी 2012 में उन्होंने चार हफ़्ते का भारत दौरा भी किया.

क्या कर सकती है सेना?

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इस पूरे संकट में सेना पर सबकी नजरें टिकी हैं. पाकिस्तान में इससे पहले ऐसे कई मौक़ों पर सेना सरकार अपने हाथ में ले चुकी है.

इससे पहले 1999 में नवाज़ शरीफ़ का तख्तापलट कर जनरल परवेज मुशर्रफ ने सत्ता संभाली थी.

फिलहाल शरीफ़ सत्ता में हैं और मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चल रहा है. बताया जाता है कि सेना इससे ख़ुश नहीं है.

वहीं भारत से रिश्तों और तालिबान चरमपंथियों से बातचीत की नवाज़ शरीफ़ सरकार की कोशिशों पर भी सेना और सरकार की अलग अलग राय को लेकर अटकलें लगती रही हैं.

हालांकि अभी तक सेना यही कह रही है कि दोनों पक्ष राजनीतिक गतिरोध को बातचीत के जरिए सुलझाएं.

वैसे इमरान ख़ान और कादरी जिस तरह नवाज़ के इस्तीफ़े पर अड़े हैं, उसे देखते हुए बातचीत की राह मुश्किल है.

ऐसे में, तेज़ी से बदलते घटनाक्रम में आशंकाओं और अटकलों पर विराम लगाना मुश्किल दिखता है.

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