जहां सड़कों से 'मंडरा रहा है ख़तरा'

  • 7 सितंबर 2014
नेपाल में ट्रेकिंग

नेपाल के मुख्य आकर्षण केंद्रों में से एक अन्नपूर्णा क्षेत्र में हर साल लगभग 40 हज़ार से 50 हज़ार ट्रेकर्स आते हैं और पहाड़ों के बीच से गुज़रते रास्तों, घाटियों और ख़ूबसूरत नज़ारों का आनंद उठाते हैं.

सुदूरवर्ती पहाड़ियों के छोटे-छोटे गांवों में जहां जंगलों के रास्ते दिनभर चलने के बाद ही पहुंचा जा सकता था, वहां सड़कों की पहुंच होने से अब दूरी सिर्फ़ कुछ ही घंटों में तय हो जाती है.

कुछ स्थानीय लोग इसे सहूलियत बता रहे हैं, लेकिन पर्यटन से जुड़े लोग इसे नुक़सान का सौदा बता रहे हैं.

कुल मिलाकर, सड़क प्रोजेक्ट्स स्थानीय नागरिकों, पर्यटन उद्यमियों और डेवलपर्स के बीच टकराव की वजह बन गए हैं.

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घांद्रुक गांव में पहले जंगलों के रास्ते दिन भर की चलने के बाद ही पहुंचा जा सकता था, लेकिन हाल ही में इस गांव को नज़दीकी शहर किमचे से जोड़ा गया है और अब यहां पहुंचने में सिर्फ़ डेढ़ घंटा ही लगता है.

अधेड़ उम्र के स्थानीय नागरिक खुसी बहादुर गुरंग अपने गांव में बनी सड़क पर मुस्कराते हुए कहते हैं, "सड़कों का विकास हम लोगों के लिए अच्छा है. इससे परिवहन आसान हो जाएगा."

लेकिन सड़क निर्माण पर सारे स्थानीय लोग उत्साहित नहीं है.

पर्यटन पर असर

दिलु गुरंग छोटा सा होटल चलाते हैं और उनका कारोबार ट्रेकिंग और पर्यटन पर निर्भर है.

दिलु गुरंग कहते हैं, "मुझे डर है कि अगर सड़क यहां तक पहुंच जाती है तो पर्यटन को नुक़सान पहुंच सकता है. सड़क को गांव से कुछ दूर होना चाहिए."

शांति और स्वच्छ वातावरण की तलाश में यहाँ पहुंचे पर्यटक भी इन सड़कों को लेकर बहुत ख़ुश नहीं दिखाई देते.

ऑस्ट्रेलिया से यहां आए ट्रेकर डेनिस ऐरन कहते हैं, "हम शांत और देहाती माहौल को वरीयता देंगे. जितना कम ट्रैफ़िक हो, उतना बेहतर."

ख़राब सड़कें

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कई ट्रेकिंग क्षेत्रों में सड़कें विकसित की गई हैं और वहां तक पहुंच गई हैं, जहां पहले पैदल ही जाया जा सकता था.

ट्रेकर्स का कहना है कि सड़कों का निर्माण नहीं होना चाहिए, कम से कम उन क्षेत्रों के नज़दीक तो नहीं, जो ट्रेकिंग के लिए मशहूर हैं.

काठमांडू से आए एक ट्रेकर रजत अग्रवाल कहते हैं, "हम सड़कें बनाने के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन उन्हें इस तरह से बनाया जाना चाहिए, जिससे हर किसी को लाभ हो."

क्या हैं विकल्प

अन्नपूर्णा संरक्षण क्षेत्र परियोजना के अधिकारी पारस बिक्रम सिंह का कहना है कि सड़कों का निर्माण होने से पर्यटकों की तादाद घटी है और नतीजतन स्थानीय लोगों की आय पर भी असर पड़ा है.

नेपाल की ट्रेकिंग एजेंट्स एसोसिएशन टीएएएन के अध्यक्ष रमेश प्रसाद धमाला कहते हैं, "हम स्थानीय लोगों को ट्रेकिंग क्षेत्र के संरक्षण की अहमियत समझाने में सफल नहीं हुए हैं और क्योंकि विकास लोगों का अधिकार भी है, इसलिए हम नए ट्रेकिंग रास्ते बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं."

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