जारी है पाकिस्तान में 'राजनीति का सर्कस'

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जब तीन हफ़्ते पहले पहली बार सरकार विरोधी प्रदर्शनकारी इस्लामाबाद पहुंचे थे तो वो सरकार को गिराने को लेकर वे बहुत उत्साहित नज़र आ रहे थे.

लाखों लोग नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ नारे लगाते हुए जोशीले अंदाज़ में हवा में मुट्ठियां भांज रहे थे.

लेकिन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अब भी अपनी जगह पर क़ायम है. लेकिन इसने मुल्क में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल पैदा किया है.

पढ़िए इलियास ख़ान का ख़ास विश्लेषण

इनमें से अधिकतर की दिलचस्पी अब इस विरोध में कम हो गई है.

ये प्रदर्शनकारी अब बुरी तरह से थक चुके हैं. उनकी चाहत अब घर जाने की है.

वे सैकड़ों मील का सफ़र तय करके अपने पीछे अपने परिवार को छोड़ इस्लामाबाद पहुंचे हैं.

अंपायर फ़ौज

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उन्हें एक महीना हो गया घर छोड़ कर आए हुए.

सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच होने वाले इस टकराव को ख़त्म करने की जि़म्मेदारी सत्ता में बैठे लोगों और प्रदर्शन कर रहे लोगों के ऊपर है लेकिन इमरान ख़ान के मुताबिक़ एक तीसरा पक्ष भी अपंयार के रूप में हो सकता है.

वह जब तीसरे अंपायर की बात करते हैं तो इसे लेकर वे साफ़ नहीं है लेकिन कई पाकिस्तानी इस अंपायर को फ़ौज के रूप में देखते हैं.

इस राजनीतिक परिदृश्य ने दुनिया के सामने फिर से एक पहेली पेश कर दी है.

पाकिस्तान को एक ऐसे देश के रूप में देखा जाता है जो राजनीतिक अस्थिरता, चरमपंथी हमले, अलगाववादी विद्रोह और आर्थिक पतन के दौर से गुजर रहा है.

सैन्य तख़्तापलट

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लेकिन यह एक ऐसा देश भी है जिसने अराजकता को ख़ारिज किया है, जो अपनी इच्छा शक्ति के बलबूते पर आतंकवाद को हरा सकता है.

जिसके एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति होने के दावे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से लिया जाता है और जो अपने से 10 गुणा बड़े देश भारत से दक्षिण एशिया क्षेत्र में कुटनीतिक स्तर पर लगातार मुक़ाबला कर रहा है.

70 और 90 के दशक में चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ व्यापक स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे.

1976 में विवाद की जड़ में चुनावी धांधली थी और 90 के दशक में भ्रष्टाचार के आरोप विरोध के केंद्र में था.

इन दोनों ही मौकों पर सरकार गिर गई थी. 1977 में सैन्य तख्ता पलट हुआ.

1990 के दौरान राष्ट्रपति सेना की मदद से एक के बाद एक चार चुनी हुई सरकारों को गिराने में कामयाब रहे.

'राजनीति का सर्कस'

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अभी के हालात 1977 की तरह के बने हुए हैं जहां राष्ट्रपति को सरकार को गिराने का विशेषाधिकार नहीं है और इसलिए अगर सेना दख़ल देना चाहती है तो उसे सीधे सैन्य तख्तापलट का रास्ता अख्तियार करना होगा.

विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे दोनों नेताओं के अपने-अपने एजेंडे हैं.

इमरान ख़ान जहां चुनाव सुधार के साथ फिर से चुनाव चाहते है वहीं ताहिर-उल-क़ादरी नैतिक सुधारों के पैरोकार है.

इन दोनों नेताओं की पुकार अब तक सरकार ने अनसुनी की है और इस बीच पाकिस्तान में हर रोज़ बकौल भूतपूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो 'राजनीति का सर्कस' जारी है.

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