पानी बचाने की जुगत में क्यों हैं कारोबारी

  • 22 सितंबर 2014
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पर्यावरणविद् तो दशकों से पानी की बर्बादी को लेकर आगाह करते रहे हैं. इस मामले में संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े भी कुछ चौंकाने वाले हैं.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, दुनिया की आबादी में तीन में से दो व्यक्ति पानी की कमी वाले इलाक़ों में रह रहे हैं और साल 2030 तक यह स्थिति बढ़कर दो में से एक व्यक्ति हो जाएगी.

पानी की कमी का असर कारोबार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ेगा, ठीक से नहीं पता लेकिन इतना ज़रूर है कि ऊर्जा की तरह पानी भी कारोबार के लिए बेहद ज़रूरी है.

तो दुनियाभर के कारोबारी अपने मुनाफ़े को क़ायम रखते हुए इस समस्या से निपटने के लिए क्या जुगत भिड़ा रहे हैं?

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क्या पृथ्वी पर पर्यावरण के लिए जलवायु परिवर्तन से भी बढ़कर कोई समस्या है? नेस्ले के चेयरमैन पीटर ब्राबेक की मानें तो एक समस्या है जो इससे भी बड़ी है.

ब्राबेक ने जुलाई में फ़ाइनेंशियल टाइम्स से कहा था, "मैं ये नहीं कर रहा हूं कि जलवायु परिवर्तन अहम नहीं है, मैं कह रहा हूं कि जलवायु परिवर्तन के बिना हम पानी की कमी से जूझ रहे हैं और मैं समझता हूँ कि यह पहली प्राथमिकता होनी चाहिए."

पानी की तकनीक की सलाहकार एजेंसी ब्लूटेक रिसर्च के मुख्य कार्यकारी पॉल ओ कैलाग़न के मुताबिक, "कारोबार के जोखिम के लिहाज़ से अब पूछा जाने लगा है कि अगर पानी नहीं होगा तो फिर क्या होगा?"

नई तकनीक

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अपने बचाव और लागत में कमी के लिए काग़ज़ उद्योग से लेकर तेल-गैस सेक्टर की कंपनियां नई तकनीक अपनाने लगी हैं.

उदाहरण के तौर पर नेस्ले के अमरीका में विसकॉन्सिन स्थित पित्ज़ा फ़ैक्ट्री में कूलिंग टावर्स में पानी की खपत कम करने के लिए कंपनी ने जीई वाटर के साथ क़रार किया है.

नेस्ले का कहना है, "जीई के साथ क़रार के बाद फ़ैक्ट्री में इस्तेमाल किए गए पानी का दोबारा इस्तेमाल हो पा रहा है और इससे लगभग 74 लाख गैलन पानी की बचत हो रही है."

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खाद्य और पेय पदार्थ तैयार करने में भी पानी की जमकर बर्बादी होती है और इस पानी को बाहर करने में न केवल पैसा खर्च होता है, बल्कि ख़तरनाक गैसें भी निकलती हैं.

कबाड़ का इस्तेमाल

लेकिन अमरीकी कंपनी न्यूट्रिन्सिक ने इसका भी जवाब खोज निकाला है. कंपनी इस पानी का इस्तेमाल जानवरों का खाना तैयार करने में कर रही है.

पानी की सबसे अधिक खपत की बात करें तो 70 फ़ीसदी ताज़ा पानी खेती में इस्तेमाल होता है.

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किसान रबड़ के लंबे पाइपों से सिंचाई की 'ड्रिप' तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन यह काफ़ी ख़र्चीली है.

इंस्टाकिट ने हाल ही में भारत के लिए पहली बार 'वन एकड़ ऑल इन वन' नाम से ड्रिप तकनीकी पेश की है.

कंपनी का कहना है कि, "पूरा सिस्टम तीन बक्सों में आता है. इसे किसान ख़ुद ब ख़ुद तीन घंटे में लगा सकते हैं और जहां ज़रूरत हो इस्तेमाल कर सकते हैं."

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