बाढ़ः भारत-पाक के लिए क्या हैं सबक़?

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हर साल आने वाली अचानक बाढ़ की समस्या बढ़ती ही जा रही है. हर आपदा के बाद भारत और पाकिस्तान का प्रशासन सबक़ लेकर क़दम उठाने के बजाए सो जाता है.

बाढ़ से सरहद के दोनों ओर अब तक साढ़े चार सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और राहत एवं बचाव को लेकर दोनों ही देशों की सरकारें आलोचना की शिकार हो रही हैं.

लेकिन हर साल त्राहि-त्राहि करने के अलावा सरकारें कुछ ठोस नहीं करतीं.

बाढ़ की त्रासदी तब और भयावह हो जाती है जब दोनों देशों के बाक़ी हिस्से सूखे की चपेट में आ जाते हैं. पर्यावरणविदों का कहना है कि ऐसा जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है.

दोनों तरफ़ भारी तबाही मचाने वाली यह बारिश तब आई, जब मॉनसून के ख़त्म होने के बारे में लोग अनुमान लगा रहे थे.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या को दूर करने के लिए बांधों और जलाशयों का निर्माण बेहद ज़रूरी है.

पढ़िए बीबीसी संवाददाता एंड्रयू नॉर्थ का विश्लेषण

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हाल में बाढ़ की एक और त्रासदी के बाद विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान और भारत को ज़्यादा से ज़्यादा बांध और जलाशय बनाने चाहिए.

हर साल आने वाली ये आपदाएं तब और ज़्यादा दुखद बन जाती हैं, जब दोनों ही देशों में साल के ज़्यादातर वक़्त बारिश कम होती है.

अबतक 450 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और सरहद के दोनों ही तरफ़ काफ़ी तबाही मचाने के बाद कश्मीर और पंजाब क्षेत्र में पिछले 10 दिनों से जमा पानी अब बर्बाद हो जाएगा.

आलोचकों का कहना है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें पिछली आपदाओं से सबक़ लेकर ऐहतियाती इंतज़ाम करने में नाकाम रही हैं कि मॉनसून की बारिश का प्रबंधन कैसे किया जाए, जबकि बाढ़ का संकट अब बार-बार आने लगा है.

राहत की कोशिशों को लेकर दोनों देशों की सरकारों को शिकायतों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन पानी के विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में अहम बात यह होगी कि बाढ़ के पानी के संरक्षण के लिए एक बेहतर व्यवस्था की जाए.

हाल में आई आपदा में जिस पानी से पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में तबाही मची वह उन नदियों से आई थी जिनका उद्गम भारत के हिमालय क्षेत्र में है, जहां ज़्यादा ही बारिश होती रही है.

'जल जेहाद' के आरोप

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पानी इतनी तेज़ी से बढ़ रहा था कि पाकिस्तान के अधिकारियों ने बांध उड़ा कर पानी प्रवाह का रुख़ शहरी क्षेत्रों से मोड़ने की युक्ति अपनाई, लेकिन इससे कृषि क्षेत्र में भी बाढ़ का ख़तरा बढ़ गया और हज़ारों लोग विस्थापित हुए.

पाकिस्तान में कुछ लोगों ने भारत को इस जल-प्रवाह को नियंत्रित न करने के लिए दोषी ठहराया. कुछ चरमपंथियों ने लंबे समय के बैर का बदला 'जल जेहाद' के ज़रिए निकालने के आरोप तक लगाए.

जल मामलों के विशेषज्ञ और पाकिस्तानी वकील अहमर बिलाल सूफ़ी का कहना है कि उनका देश भी सीमाओं के भीतर नदियों का प्रबंधन करने के लिए उतना ही दोषी है, क्योंकि यह भी पानी पर नियंत्रण करने के लिए ज़्यादा बांध बनाने और पानी संरक्षण करने में नाकाम रहा है.

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सूफ़ी की बातों में वज़न है, क्योंकि वो सिंधु जल आयोग पर पाकिस्तानी अधिकारियों को सलाह देते हैं. वर्ष 1960 में इस आयोग का गठन दोनों देशों के बीच जल साझा करने की संधि के तहत किया गया था.

हाल में आए बाढ़ संकट से पहले दोनों पक्षों की मुलाक़ात भी हुई थी और विडंबना की बात यह है कि इसमें नए भारतीय बांध परियोजना पर पाकिस्तान के एतराज़ जताए जाने के मसले पर भी चर्चा हुई थी.

लेकिन दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों के बीच एक आशा का संकेत यह है कि यह संधि अब तक बरक़रार है और इसकी बैठकें होती रहती हैं.

बेहतर जलनिकासी व्यवस्था

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विशेषज्ञों का कहना है कि भारत भी अपने क्षेत्र के जल प्रबंधन के प्रति उदासीन रहा है.

यहां के अधिकारियों पर भी यह आरोप लगते रहते हैं कि वे मॉनसून के पानी को बर्बाद होने देते हैं. भारतीय लोगों को इस बात का बख़ूबी अंदाज़ा है कि यहां बिजली उत्पादन की कितनी कमी है और इस समस्या के समाधान में पनबिजली परियोजना का अहम योगदान हो सकता है.

बेहतर जलनिकासी व्यवस्था की भी सख़्त ज़रूरत है साथ ही बाढ़ के ख़तरे की आशंका वाले क्षेत्र में निर्माण कार्य पर नियंत्रण होना चाहिए. दिल्ली की पर्यावरणविद् सुनीता नारायण कहती हैं, "भारत जल निकासी की व्यवस्था को लेकर बेपरवाह है. बारिश का पानी कचरे और नालियों तक ही सीमित रह जाता है या फिर उनका अस्तित्व ही नहीं रहता."

लेकिन ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि ऐसी आपदाओं का क़हर अब बेहद सामान्य और अप्रत्याशित होता जा रहा है जो कई वैज्ञानिकों के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन का नतीजा है.

पांच हज़ार मौतें

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भारत और पाकिस्तान में जिस बारिश से बाढ़ का क़हर मचा है वह सामान्य की बजाए काफ़ी देर से हुई, जब माना जा रहा था कि मॉनसून की अवधि लगभग ख़त्म हो चुकी है.

इसी तरह एक अनुमान के मुताबिक़ पिछले साल बारिश के शुरू होने से पहले भारत में जून महीने में आई आकस्मिक बाढ़ में फंसने से 5,000 लोगों की मौत हो गई.

वर्ष 2010 में सिंधु नदी के किनारे टूटने से मध्य पाकिस्तान में 2,000 लोग मारे गए. हर साल लगभग इससे सैकड़ों लोग मारे जाते हैं.

वर्ष 2010 की आपदा के बाद पाकिस्तान ने एक न्यायिक जांच कराने की पहल की, जिसके तहत ऐसी आपदा के असर को कम करने के लिए कई सिफ़ारिशें की गई थीं.

इस जांच में हिस्सा लेने वाले पाकिस्तान के जल विशेषज्ञ नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, "लेकिन उस वक़्त से अब तक कुछ नहीं हुआ है."

वह कहते हैं, "ऐसी आपदा के बाद हम फिर सबकुछ भूलकर चैन की नींद सो जाते हैं."

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