सुना है जंगलों का भी दस्तूर होता है..

पुलवामा में बाढ़

नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ़ भारत और पाकिस्तान में कश्मीरी बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं.

सैकड़ों लोगों की जानें गईं और लाखों लोग बेघर हो गए.

करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुक़सान हुआ.

इस प्राकृतिक आपदा में भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों की सरकारों ने एक-दूसरे के बाढ़ प्रभावितों को मदद की पेशकश की, लेकिन दोनों ने अपने तरीके से इसे 'ठुकरा' दिया.

पढ़िए डायरी विस्तार से

कोई तूफ़ान आ जाए, कोई पुल टूट जाए तो किसी लकड़ी के तख़्ते पर गिलहरी, सांप, बकरी और चीता एक साथ होते हैं.

सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है.

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ज़ोरा निगाह की इस नज़्म पर मैं और आप वाह-वाह तो कर सकते हैं, पर भारत और पाकिस्तान के सरकारी लाल बुझक्कड़ों को ये पूरी तरह समझा नहीं सकते.

वरना तो आज नियंत्रण रेखा के दोनों ओर पाकिस्तान और भारत बाढ़ से घिरे एक-दूसरे के कश्मीरियों के लिए तंबू, कंबल, बुल्डोज़र, खान-पान, साफ़ पानी अदल-बदल भेज रहे होते.

जब अक्तूबर 2005 में नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ आए भूकंप में हज़ारों लोग मरे या घायल हुए तब मनमोहन सरकार ने पाकिस्तान को मानवीय सहायता की पेशकश की थी, लेकिन पाकिस्तान ने यह कहकर टाल दिया कि भारत अगर किसी तीसरे देश के ज़रिए चीजें भिजवा दे तो बहुत खुशी होगी.

'नो थैंक्यू'

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इस बार नरेंद्र मोदी ने बाढ़ से जूझने वालों के लिए मदद का संदेशा भिजवाया तो पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने 'नो थैंक्यू' कहते हुए भारत को उल्टा ऑफ़र दे डाला कि अगर उसे बाढ़ के संदर्भ में कोई भी राहत चाहिए तो पाकिस्तान हाज़िर है.

भारत ने कहा, "हम आपकी हमदर्दी की कद्र करते हैं, नो थैंक्यू."

लोमड़ी-सारस की कहानी

लोमड़ी और सारस के दरम्यान बात-बेबात बैर रहता था. शेरू महाराज ने एक दिन दोनों को बुलाकर समझाया कि हर वक़्त की दुश्मनी भी अच्छी नहीं होती.

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कभी-कभी एक-दूसरे की दावत भी किया करो. इससे दिल नरम हो जाएंगे.

चुनांचे, लोमड़ी और सारस ने शेर के कहने पर ज़ाहिरी तौर पर सुलह तो कर ली, लेकिन दिल का मैल इतनी जल्दी भला कहां साफ होता है.

लोमड़ी ने सारस को अपनी कछार में लंच पर आमंत्रित किया और पतला शोरबा परात में डालकर सारस के आगे रख दिया.

अपनी-अपनी बारी

सारस ने शोरबा सुड़कने की बहुत कोशिश की लेकिन लंबी चोंच आड़े आ गई. लोमड़ी ने कहा- भाई सारस, परेशान मत हो, मैं तुम्हें शोरबा पीना सिखाती हूं.

ये कहकर लोमड़ी अपनी लंबी जीभ निकालकर सारा शोरबा लपलप पी गई.

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सारस ने इस आवभगत पर लोमड़ी का शुक्रिया अदा किया और लोमड़ी को डिनर का न्यौता देते हुए वह भूखे पेट अपने निवास की ओर लौट गया.

शाम को लोमड़ी बन-ठनकर सारस के यहां पहुंची.

सारस ने गोश्त के टुकड़े एक सुराही में डालकर लोमड़ी के सामने रख दिए. अब लोमड़ी की थूथनी भला सुराही के तंग गले के अंदर भला कहां जाती.

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यहीं सारस ने मुस्कराते हुए कहा- मैडम आप परेशान न हों, मैं आपको सुराही में से बोटियां निकालना सिखाता हूं.

यह कहकर सारस ने अपनी पतली लंबी चोंच सुराही में डाली और एक-एक बोटी निकालकर खा गया.

लोमड़ी ने डिनर के लिए सारस का शुक्रिया अदा किया और भूखे पेट पर हाथ फेरती, मन ही मन सारस को गालियां देती हुई अपनी कछार की ओर लौट गई.

हम पागल नहीं हैं भैया

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इस कहानी का भारत और पाकिस्तान की सरकारों के मन में छिपी सकारात्मक भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है.

फिर भी कोई मुझसे पूछे कि मैंने ये घिसी-पिटी कहानी आख़िर क्यों सुना दी?

तो मेरा जवाब यही है- हम पागल नहीं हैं भैया, हमारा दिमाग़ ख़राब है.

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