बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा?

  • 19 सितंबर 2014
इमेज कॉपीरइट AP

मिशीगन में रह रहीं भारतीय डॉ सोनल सराइया और उनके साथियों ने पता लगाया कि सूअर के मांस की पट्टियों को बच्चों की नाक में लगाने से नाक से बहने वाला ख़ून रोका जा सकता है.

इसके लिए उन्हें इस साल का 'इग नोबल' पुरस्कार मिला है.

जबकि एक और भारतीय नरेन रामाकृष्णन और उनके साथियों ने बिल्लियों के काटने और उसके तनाव से संबंध को लेकर खोजबीन की.

इमेज कॉपीरइट Reuters

यह नकली नोबल प्राइज़ उतना ही मशहूर है जितना असली. अमरीका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में ये पुरस्कार एक सालाना समारोह में दिए गए. पुरस्कार विज्ञान हास्य पत्रिका ''ऐनल्स ऑफ़ इम्प्रॉबेबल रिसर्च'' की तरफ़ से दिए जाते हैं.

मिशीगन के डेट्रॉयट मेडिकल सेंटर में डॉ सराइया और उनके साथियों ने पड़ताल की कि नाक से ख़ून बहना बच्चों की जान को ख़तरा पैदा कर सकता है लेकिन सुअर के मांस की पट्टियों का इस्तेमाल करके ख़ून को रोका जा सकता है.

डॉ सराइया के मुताबिक़ "हम कुछ आउट ऑफ़ दि बॉक्स सोच रहे थे. तब हमने विचार किया और सोचा कि पुराने ज़माने में लोग इसे लेकर क्या करते थे."

उनके मुताबिक़ उन्होंने चार साल के बच्चे की नाक पर दो बार यह प्रयोग किया.

उधर, नरेन रामाकृष्णन को जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके साथियों के साथ पुरस्कृत किया गया है. उन्होंने बिल्लियों के काटने और तनाव के बीच रिश्तों का पता लगाया है.

उनके पेपर में कहा गया है कि "ताज़ा डेटा अध्ययन बताते हैं कि बिल्लियों के काटने और इंसान के तनाव के बीच एक संबंध हो सकता है."

उनके शोध में दिखाया गया कि "ख़ासकर महिलाओं में बिल्लियों के काटने का तनाव से सीधा रिश्ता देखा गया. इससे पता चलता है कि ऐसे मरीज़ों को होने वाले तनाव का अध्ययन किया जाना चाहिए."

इमेज कॉपीरइट AP

जापान के कियोशी माबुची की टीम ने प्रयोगशाला में इसकी पड़ताल की कि केले के छिलके में कितना घर्षण होता है और उस पर इंसान का पैर पड़ना कितना ख़तरनाक साबित हो सकता है.

कितासातो यूनिवर्सिटी के इस ग्रुप को उनकी खोज के लिए भौतिकी में इग नोबल दिया गया. यह खोज पहली नज़र में बेतुकी लग सकती है, पर गहराई से देखें तो इसके पीछे मज़ाक से परे एक गंभीर सोच दिखाई देती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार