स्कॉटलैंड: सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है अभी

  • 21 सितंबर 2014
डेविड कैमरून और एलेक्स सैलमोंड इमेज कॉपीरइट Getty

स्कॉटलैंड के लोगों ने स्वतंत्र नहीं होने का और ब्रिटेन के साथ रहने का अपना फ़ैसला दे दिया है और दोनों पक्षों ने इसे स्वीकार भी कर लिया है.

तो क्या बस बात ऐसी ही है. बिल्कुल नहीं.

इसका कारण यह है कि 15 लाख से ज़्यादा ब्रितानी नागरिकों ने यूनाइटेड किंगडम के साथ नहीं रहने के पक्ष में राय जताई है.

स्कॉटलैंड के सबसे बड़े शहर ग्लासगो में अधिकतर लोगों ने आज़ादी का समर्थन किया है.

ब्रिटेन के तीन प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता ना सिर्फ़ स्कॉटलैंड बल्कि इंग्लैंड, वेल्स और साथ ही साथ उत्तरी आयरलैंड के लिए भी अब महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलावों की बात कर रहे हैं.

नहीं मिला है जवाब

इन राजनीतिक दलों ने स्कॉटलैंड की संसद को ज़्यादा अधिकार देने की समयसारिणी पर सहमति तो जताई है, लेकिन प्रस्तावों पर एकमत होने से अभी बहुत दूर हैं.

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स्कॉटलैंड के फ़र्स्ट मिनिस्टर एलेक्स सेलमंड भले ही मतों की लड़ाई में हार गए हों लेकिन उन्होंने अभी शायद पराजय नहीं मानी है.

सेलमंड कहते हैं, "हम जनमत संग्रह में पराजित हुए हैं, लेकिन राजनीतिक पहल के आगे बढ़ाते रहेंगे."

इंग्लैंड के क़ानून के लिए वोट

प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने भी सुधारों का वादा किया है जिसके तहत उन्होंने कहा था कि 'इंग्लैंड के लोग इंग्लैंड के क़ानून' के लिए वोट दें.

यह वादा कंज़रवेटिव पार्टी के घोषणापत्र में भी था. यह नारा इंग्लैंड में बहुत लोकप्रिय हुआ था और है भी.

यह इंग्लैंड में सांसदों की दो श्रेणियां बना सकता है, यानी सरकार के पास कुछ क़ानूनों को पास कराने के लिए बहुमत होगा, और कुछ के लिए नहीं.

1977 में पूछे गए उस सवाल का जवाब आज भी नहीं मिला है.

सवाल था कि क्यों ब्लैकबर्न के सांसद को स्कॉटलैंड में इंग्लैंड के मामलों पर वोट देना चाहिए जबकि ब्लैकबर्न का सांसद लैंकशायर में स्कॉटलैंड के मुद्दे पर वोट नहीं दे सकता.

हो सकता है कि इस जनमत संग्रह ने स्कॉटलैंड में एक विवाद को अभी ख़त्म कर दिया हो हालांकि इसने ब्रिटेन में शक्ति कहां निहित है इस ज्वलंत सवाल को खड़ा कर दिया है.

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