जब ग़ुस्साई फ़ौज ने 184 को मारा

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सितंबर 1990 में श्रीलंका की फ़ौज ने देश के पूर्वी भाग बट्टीकलोवा में 184 अल्पसंख्यक तमिलों की हत्या कर दी थी. यह वह दौर था जब श्रीलंका में गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था.

एक ओर जहां राष्ट्रवादी सिंहली बहुसंख्यक सरकार के दमन का शिकार हो रहे थे वहीं दूसरी ओर देश के उत्तरी-पूर्वी भाग में सक्रिय अल्पसंख्यक तमिल विद्रोही अपने लिए अलग स्वतंत्र देश की मांग कर रहे थे.

बट्टीकलोवा के बिशप किंग्सले स्वामपिलै उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, "हर कोई ख़तरे में था, हर कोई डरा हुआ था."

पढ़ें फ़रहाना हैदर की विस्त़त रिपोर्ट

किंग्सले स्वामपिलै पीस कमेटी के सदस्य भी थे. स्वामपिलै के फ़ौज के कर्नल बशी फ़र्नाडो के साथ अच्छे संबंध थे.

उनके कहने पर कर्नल नरसंहार वाली जगहों को देखने पहुंचे. वहां उन्होंने लोगों के सिर और शरीर के दूसरे अंग बिखरे हुए और जलते हुए देखे.

यह पूछे जाने पर कि यह सब देखकर कर्नल की प्रतिक्रिया क्या थी? उन्होंने बताया कि कर्नल बहुत दुखी हुए थे. लेकिन वे इस बात को लेकर ज़्यादा दुखी थे कि जो हुआ वो उनकी नोटिस में लाया गया.

शांति सेना

स्वामपिलै से उनकी प्रतिक्रिया पूछने पर वे बताते है कि स्वभाविक रूप से हम काफ़ी ग़ुस्से में थे, साथ ही साथ काफ़ी दुखी भी थे कि फ़ौज ने हमारे साथ विश्वासघात किया है.

श्रीलंका में गृहयुद्ध की शुरुआत साल 1983 से हो गई थी. 1987 में तमिल बहुसंख्यक आबादी वाले देश भारत ने श्रीलंका सरकार की मदद के लिए शांति सेना भेजी.

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मगर शांति स्थापना के बजाय शांति सेना ख़ुद इस युद्ध का हिस्सा बन गई और 1989 आते-आते उन पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगने लगे.

बेहद बदनाम हो चुकी शांति सेना को 1990 में वापस बुला लिया गया.

शांति सेना के वापस जाने के बाद लिट्टे के तमिल विद्रोहियों ने उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अपना दबदबा क़ायम कर लिया.

तब जून में बट्टीकलोवा में लिट्टे ने 600 श्रीलंकाई पुलिस वालों को मार गिराया था. इसके परिणामस्वरूप ग़ुस्साई और बदले की आग में जल रही श्रीलंकाई सेना ने तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई शुरू की.

हिंसक कार्रवाई

इस सिलसिले में बट्टीकलोवा के तमिल बहुल गांवों में सेना ने आम तमिल नागरिकों पर भी हिंसक कार्रवाई की.

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Image caption वेलुपिल्लई प्रभाकरण के नेतृत्व में तमिल विद्रोही अपने लिए अलग स्वतंत्र देश की मांग कर रहे थे.

बहुत से तमिल शरणार्थी शिविर में भाग कर जान बचाने में कामयाब हुए लेकिन सेना की इस कार्रवाई में 184 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी जिसमें एक अनुमान के मुताबिक़ क़रीब 10 साल की उम्र के 47 बच्चे शामिल थे.

बिशप कहते हैं, "इस पूरी कार्रवाई को सेना की ड्यूटी के रूप में माना गया और किसी पर भी किसी तरह का कोई आरोप नहीं लगाया गया."

श्रीलंका का यह गृहयुद्ध 2009 में ख़त्म हुआ जिसमें हज़ारों आम नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

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