आईएस के ख़िलाफ़ हवाई हमले कितने वैध?

  • मार्क वेलर
  • अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रोफ़ेसर, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी

अमरीका और उसके सहयोगी देशों ने सीरिया और इराक़ में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ हवाई हमले किए हैं, लेकिन अब इन हमलों की वैधता पर सवाल उठ रहे हैं.

यह सही है कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) के डर से पिछले कुछ दिनों में लाखों कुर्द सीरिया से भागकर तुर्की में दाख़िल हुए हैं और इराक़ में भी इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों पर आम नागरिकों की हत्या किए जाने के आरोप लगे हैं.

लेकिन इराक़ और सीरिया में आईएस के ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय सेना के हमले कितने वैध हैं, इसे लेकर क़ानूनी राय बंटी हुई है.

पढ़ें, मार्क वेलर का विश्लेषण

इराक़ सरकार ने अंतरराष्ट्रीय सेनाओं को आईएस के ख़िलाफ़ लड़ाई में साथ देने का न्यौता दिया था.

जब तक यह अभियान इराक़ की सीमा में चल रहा है, तब तक सामूहिक आत्मरक्षा के अंतरराष्ट्रीय अधिकार पर निर्भरता की कोई जरूरत नहीं है.

अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए इराक़ सरकार देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे हथियारबंद आंदोलन से निपटने के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल कर सकती है.

यह सच है कि सरकार को उस क्षेत्र के लिए विदेशी सेना बुलाने का अधिकार नहीं है, जिस क्षेत्र में उसके ख़िलाफ़ भारी जन असंतोष हो और अधिकांश हिस्से पर वह नियंत्रण गंवा चुकी हो.

अपनी जनता का विश्वास खो चुकी सरकार को विदेशी सैन्य ताक़तों के दख़ल के दम पर ख़ुद को सत्ता में बनाए रखने का अधिकार नहीं है.

उदाहरण के तौर पर, इस साल की शुरुआत में यूक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच की रूस के सैन्य दखल के ख़िलाफ़ अपील की कोई वैधता नहीं थी.

यह अपील उन्होंने उस वक़्त की थी, जब उनके शासन के ख़िलाफ़ जनता ग़ुस्से में थी और वह देश का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार गंवा चुके थे.

इसी तरह, पश्चिमी देशों ने सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद को रूस की ओर से प्रत्यक्ष सैन्य आपूर्ति जारी रखने की निंदा की थी. पश्चिमी देशों ने इराक़ में सेना भेजने के लिए ईरान की भी निंदा की थी.

हालात अलग

लेकिन ये स्थितियां इराक़ के हालात से बिल्कुल अलग हैं.

आईएस एक धार्मिक आंदोलन है जो हथियारबंद अभियान के दम पर ख़ुद को कुछ हिस्सों में काबिज़ करना चाहता है.

आरोप है कि आईएस आतंक, पलायन और नापंसद लोगों की हत्याएं कर नियंत्रित आबादी पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है.

इराक़ में हाल में सरकार का पुनर्गठन किया गया है और सुनिश्चित किया गया है कि इराक़ के सभी वर्ग- सुन्नी, शिया और कुर्द इसमें अपना प्रतिनिधित्व देख सकें.

तो इराक़ की सरकार को तब तक सैन्य सहायता मिलती रह सकती है, जब तक इस पर इराक़ सरकार की सहमति है.

सीरिया में हालात जटिल

सीरिया में आईएस के ठिकानों पर हमले के हालात ज़्यादा जटिल हैं. सीरिया की सरकार ने ऐसे अभियान की औपचारिक सहमति नहीं दी है, और अगर वह सहमति देती भी है तो उसकी नेकनीयती पर सवाल उठते.

राष्ट्रपति असद ने तो यह भी दावा किया है कि ऐसी कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का गंभीर उल्लंघन होगी.

हालाँकि, ब्रिटेन समेत कई देशों ने सीरिया के विपक्षी राष्ट्रीय गठबंधन को 'सीरिया के लोगों का वैध प्रतिनिधि' माना है, लेकिन उन्होंने इसे सीरिया सरकार के रूप में मान्यता नहीं दी है.

इसका मतलब है कि गठबंधन को सीरिया की ज़मीन पर विदेशी सैन्य अभियान की सहमति देने का अधिकार नहीं है.

दोषी कौन?

इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस ने भी 1986 के निकारागुआ मामले में भी हथियारबंद विद्रोहियों को समर्थन देने के लिए अमरीका को अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन का दोषी माना था.

इस तरह, सीरिया के ख़िलाफ़ इराक़ आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल तभी कर सकता है, जब आईएस सीरिया सरकार के प्रत्यक्ष एजेंट की तरह काम करे और उसके नियंत्रण में हो.

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