पाकः अहमदिया का नोबेल क़बूल मगर जात नहीं

पाकिस्तान के नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक अब्दुस सलाम की कब्र

अब्दुस सलाम भले ही पाकिस्तान के पहले और इकलौते नोबेल पुरस्कार विजेता हों लेकिन वह एक अहमदिया थे और सिर्फ इसी वजह से उनकी कब्र पर लिखी गई इबारतों में से 'मुस्लिम' शब्द मिटा दिया गया.

अब्दुस सलाम को नोबेल पुरस्कार भौतिक विज्ञान में उनके योगदान के लिए दिया गया था.

अहमदिया संप्रदाय के लोग खुद को मुसलमान कहते हैं और कुरान को मानते हैं लेकिन रूढ़िवादी मुसलमान उन्हें 'भटका हुआ' करार देते हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि कुरान की कुछ आयतों की व्याख्या अहमदिया संप्रदाय अपने तरीके से करता है.

नौशीन अब्बास की रिपोर्ट

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Image caption 1974 में पाकिस्तान में हुई सांप्रदायिक हिंसा में अहमदिया संप्रदाय के कई लोग मारे गए थे.

पाकिस्तान में अहमदिया लोगों की तकलीफ के कई पहलू हैं.

इसकी शुरुआत 40 साल पहले उस वक्त हुई जब अहमदिया संप्रदाय के मानने वाले लोगों को पाकिस्तान में एक संविधान संशोधन के जरिए गैर-मुस्लिम करार दे दिया गया.

सिर्फ इतना ही नहीं, इस कानून के मुताबिक वे अपनी इबादतगाहों को मस्जिद का भी नाम नहीं दे सकते थे और न ही सार्वजनिक तौर पर कुरान की आयतें पढ़ सकते थे.

इस कानून को तोड़ने की सूरत में किसी अहमदिया को तीन साल तक के लिए जेल भेजा जा सकता था.

अहमदिया विरोधी इस कानून की मुखालफत करने वाले लोगों का कहना है कि इससे उनके खिलाफ हिंसा बढ़ी.

रबवाह शहर

बीबीसी ने अहमदिया संप्रदाय के मानने वाले लोगों के शहर रबवाह में कुछ लोगों से आने वाले कल को लेकर उनकी आशंकाओं के बारे में बात की.

साल 2010 में लाहौर के अहमदिया मस्जिद पर हुए हमले में बच गए उसामा मुनीर पेशे से बैंकर हुआ करते थे. लेकिन उनके अब्बा इस हमले में मारे गए.

कहा जाता है कि इस हमले के पीछे सुन्नी मुसलमानों का हाथ था. उन्होंने तय किया कि वे रबवाह शिफ्ट कर जाएंगे.

वे कहते हैं, "खुदा चाहता था कि मैं कुछ और करूं, इसलिए यहां अपने समुदाय के लिए काम करता हूं."

भेद-भाव

हुमायरा (बदला हुआ नाम) रबवाह के बाहर पढ़ाई करती हैं. वे बताती हैं कि उन्हें हर रोज़ मुश्किल पेश आती है, हर दिन भेद-भाव झेलना पड़ता है.

वे हॉस्टल में नहीं रह सकती क्योंकि वहां अहमदिया छात्रों का स्वागत नहीं होता.

हुमायरा की बड़ी बहन ने बताया कि अहमदिया छात्रों को हॉस्टल न दिए जाने की शुरुआत तब हुई थी जब वे पढ़ाई कर रही थीं.

हुमायरा का कहना है कि उन्हें और अहमदिया संप्रदाय की नौजवान पीढ़ी को इस भेद-भाव के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है.

धार्मिक असहिष्णुता

मिर्ज़ा खुर्शीद अहमद पाकिस्तान में अहमदिया संप्रदाय के नेता हैं.

उन्हें लगता है कि पाकिस्तान में अहमदिया लोगों के लिए हालात दिनबदिन और खराब होते जा रहे हैं.

अहमद का कहना है कि जब सरकार किसी एक वर्ग को अधिकारों से वंचित करती है तो इससे धार्मिक असहिष्णुता बढ़ती है.

नौजवान नस्ल

Image caption अहमदिया संप्रदाय की जड़े भारतीय पंजाब के क़ादीयान में है.

चौधरी हमीदुल्लाह रबवाह में सालों से रह रहे हैं और उन्हें यकीन है कि अहमदिया संप्रदाय के लिए हालात एक दिन ज़रूर बदलेंगे.

लेकिन वे ये भी कहते हैं कि नौजवान नस्ल को बुरे वक्त के लिए तैयार रहना चाहिए.

वे कहते हैं, "अहमदिया विरोधी कानून ने पाकिस्तान में एक चलन शुरू कर दी है और आने वाले कल में इसका दंश किसी भी समुदाय को झेलना पड़ सकता है."

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