पाकिस्तान का 'जादूगर डॉक्टर'

डॉ. अदीब रिज़वी, पाकिस्तान
Image caption डॉ. अदीब रिज़वी और उनकी टीम ने पाकिस्तान का पहला किडनी ट्रांसप्लांट किया था.

पाकिस्तान का पब्लिक हेल्थ सिस्टम काफ़ी अव्यवस्थित है. पाकिस्तानी स्वास्थ्य तंत्र भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है.

लेकिन कराची में एक ऐसा अस्पताल है जो लाखों लोगों को मुफ़्त में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराता है.

यह अस्पताल डॉक्टर अदीब रिज़वी के सपने और मेहनत का नतीजा है जो आराम से अपने दूसरे साथियों की तरह निजी अस्पताल खोलकर जीवन जी सकते थे लेकिन उन्होंने समाजसेवा की राह चुनी.

डॉ. रिज़वी ने सिंध इंस्टिट्यूट ऑफ़ यूरोलॉजी एंड ट्रांसप्लांट(एसआईयूटी) की शुरुआत ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सर्विस से प्रेरित होकर की थी.

एसआईयूटी कराची सिविल अस्पताल का एक हिस्सा. पिछले 40 सालों में यहाँ हज़ारों मरीजों का अंग प्रतिरोपण हो चुका है. वहीं सैकड़ों लोगों को यहां प्रतिदिन मुफ़्त डायलिसिस सुविधा प्रदान की जाती है.

पढ़ें शाहज़ेब जिलानी का लेख विस्तार से

Image caption एसआईयूटी में अब तक हज़ारों लोगों को मुफ़्त अंग प्रतिरोपण हो चुका है.

अदीब रिज़वी को महज़ 17 साल की उम्र में हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से भारत छोड़कर पाकिस्तान आना पड़ा था.

1950 के दशक में उन्होंने अपना ज़्यादातर समय पाकिस्तान के कराची में मेडिकल की पढ़ाई करते हुए बिताया.

वो याद करते हैं, "उन दिनों मैं काफ़ी समय तक अस्पतालों में घूम-घूम कर देखा करता था कि वहाँ क्या चल रहा है."

उस दौर में उनके अनुभवों ने उनपर गहरा प्रभाव डाला जिसका असर ताउम्र रहा.

वो कहते हैं, "मैंने देखा कि जो लोग पैसे नहीं दे पाते उनके संग बेहद अपमानजनक बरताव किया जाता था. मैंने देखा कि बूढ़ी महिलाएँ अपने आभूषण गिरवी रखकर दवा ख़रीद रहीं थीं."

कराची के मेडिकल डिग्री कॉलेज में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. रिज़वी एक फ़ेलोशिप के तहत सर्जरी की पढ़ाई करने ब्रिटेन चले गए. उसके बाद, अगले एक दशक तक उन्होंने ब्रिटेन के अस्पतालों में काम किया.

डॉ. रिज़वी कहते हैं, "मैं ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस(एनएचएस) से प्रेरित था. इससे मुझे अहसास हुआ कि मुफ़्त चिकित्सा सेवा प्रदान करना संभव है." रिज़वी बताते हैं कि उनके दोस्त कहते थे, "ये नहीं हो सकता."

दो विकल्प

जब रिज़वी 1971 में पाकिस्तान वापस आए और कराची सिविल अस्पताल में यूरोलॉजी (मूत्र विज्ञान) विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के रूप में जुड़े तो उनके साथियों को उनकी बातें दिवास्वप्न जैसी लगती थीं.

पाकिस्तान आने पर रिज़वी के पास दो विकल्प थे, या तो वो अपना प्राइवेट अस्पताल खोलें या फिर ख़स्ताहाल सरकारी अस्पताल में नौकरी करें.

वो चाहते तो अपने कई दूसरे समकालीन उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टरों की तरह सरकारी नौकरी के समांतर अपना वैभवशाली साम्राज्य भी बना सकते थे.

वो कहते हैं, "मुझे इन सब चीज़ों ने कभी आकर्षित नहीं किया. मुझे हमेशा से लगता था कि अगर कोई बदलाव लाना है तो मुझे सार्वजनिक क्षेत्र के लिए पूरी तरह समर्पित होना पड़ेगा. क्योंकि जब आम सार्वजनिक क्षेत्र में काम करते हैं तो आम आम लोगों की मदद कर रहे होते हैं."

मदद और उपाय

Image caption डॉ. रिज़वी अंग प्रतिरोपण की बारीकियाँ सीखने ब्रिटेन और अमरीका गए.

डॉ. रिज़वी ने शुरुआत अपने कुछ निजी दोस्तों और शुभचिंतकों से आर्थिक मदद ले कर की. जनसेवा के लिए उत्सुक कुछ डॉक्टरों और उनके सहयोगियों ने अपनी टीम बनाई.

अपनी सेवा के विस्तार के लिए उन्होंने हर संभव उपाय अपनाए. अपना छोटा सा यूरोलॉजी विभाग खोलने के लिए उन्होंने ब्रिटेन से सैकेंड-हैंड डायलसिस मशीन ख़रीदी.

उनके समर्पण और कड़े परिश्रम का ही परिणाम था कि उन्हें शीघ्र ही उन्हें जनता की मदद और स्वैच्छिक योगदान मिलने लगा.

धीरे-धीरे डॉ. रिज़वी के वार्ड में एक-एक कर अत्याधुनिक सुविधाएँ जुड़ने लगीं, वो भी मुफ़्त.

वो कहते हैं, "मैंने कभी सरकारी या किसी संस्थान से आर्थिक मदद का इंतज़ार नहीं किया. ये सब कुछ मैंने योजना बना कर नहीं किया. हमारा विस्तार बहुत स्वाभाविक ढंग से हुआ. हम मरीजों की ज़रूरतों के हिसाब से बढ़ते गए."

1970 के दशक के अंतर तक उनके संस्थान में किडनी (गुर्दा) के सैकड़ों मरीजों का डायलसिस होने लगा था. तभी डॉ. रिज़वी और उनकी टीम को अहसास हुआ कि ऐसा ज़्यादा समय तक नहीं चल सकता और अब अंग प्रतिरोपण की तरफ़ क़दम बढ़ाने का समय है.

पहला प्रतिरोपण

उस समय पाकिस्तान के किसी भी अस्पताल में गुर्दे के ट्रांसप्लांट (प्रतिरोपण) की सुविधा नहीं थी. एक बार फिर डॉ. रिज़वी और उनकी टीम से लोगों ने कहा कि यह नामुमकिन है.

वो कहते हैं, "मुझे कहा गया कि मुझे चुपचाप यूरोलॉजिस्ट के रूप में काम करते रहना चाहिए. लोग मुझसे कहते थे कि मैं अच्छी खासी प्राइवेट प्रैक्टिस कर सकता था लेकिन मैं अपना समय बर्बाद कर रहा हूँ."

डॉ. रिज़वी फिर भी अपने फ़ैसले पर अडिग रहे. ट्रांसप्लांट सर्जरी से जुड़ी नवीनतम तकनीकी सीखने के लिए वो पहले ब्रिटेन फिर अमरीका गए.

1980 के दशक की शुरुआत में वापस आने के बाद उन्होंने ट्रांसप्लांट सर्जरी के लिए डॉक्टरों, नर्सों, टेक्निशियनों और अन्य कर्मचारियों की टीम बनानी शुरू की.

एक अस्पताल की छत पर उन्होंने प्रयोगशाला बनाई और वहाँ अपने साथियों को प्रशिक्षित करने के लिए कुत्तों, बंदरों समेत कई जानवरों की सर्जरी की.

डॉ. रिज़वी और उनकी टीम की यह परियोजना आधिकारिक नहीं थी. बहुत से लोगों को पता भी नहीं था कि वहाँ क्या होता है.

वो कहते हैं, "अस्पताल वाले हमें बर्दाश्त कर लेते थे क्योंकि मैंने वहाँ थोड़ी बहुत स्वायत्तता हासिल कर ली थी. और जब तक मैं उनसे कोई आर्थिक मदद न मांगू तब तक वो मुझे मेरा काम करने देते थे."

प्रशिक्षिण

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption (फाइल फ़ोटो)

डॉ. रिज़वी ने अपनी टीम को समझाया कि मनुष्यों की सर्जरी करते समय उन्हें बहुत ज़्यादा सावधानी बरतनी होगी. इसीलिए वो इस बात पर जोर देते थे कि सर्जरी के प्रशिक्षिण के दौरान किसी भी जानवर की मौत न हो.

परीक्षणों का यह दौर कुछ सालों तक चला.

दिसंबर, 1985 में डॉ. रिज़वी और उनकी टीम ने पाकिस्तान का पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट किया.

करीब हफ़्ते भर बाद जब पाकिस्तान की सरकार और मीडिया को इसकी भनक लगी तो इसे राष्ट्रीय उपलब्धि की तरह लिया गया.

उनकी पहली सर्जरी बेहत कामयाब रही. वो मरीज अगले 18 साल तक सामान्य जीवन जी सका.

उसके बाद डॉ. रिज़वी की टीम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

एसआईयूटी में अब तक पाँच हज़ार अंग प्रतिरोपण हो चुके हैं. साथ ही, यहाँ प्रतिदिन तक़रीबन 750 डायलिसिस सेशन होते हैं.

भविष्य

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption (फाइल फ़ोटो)

धीरे-धीरे एसआईयूटी को मिलने वाली आम मदद भी तेज़ी से बढ़ने लगी.

डॉ. रिज़वी कहते हैं, "हमने 40 साल पहले आठ बिस्तर वाले अस्पताल से शुरुआत की थी. आज हमारे पास 800 बिस्तर हैं. तब हमारे पास एक छोटा सा कमरा था. आज हमारे पास दो बहुमंजिला इमारतें हैं और तीन अन्य अभी बन रही हैं."

बढ़ती उम्र में भी डॉ. रिज़वी पूरी तरह सक्रिय हैं. उन्हें अपनी टीम के कार्य पर नाज़ है लेकिन वो यह भी कहते हैं कि अभी हमें बहुत आगे जाना है.

पाकिस्तान की ख़राब जनस्वास्थ्य सेवाओं और बढ़ती जनसंख्या के कारण एसआईयूटी जैसे संस्थानों पर दबाव काफ़ी बढ़ता जा रहा है.

डॉ. रिज़वी कहते हैं, "मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे न रहने पर भी, समाजसेवा को समर्पित डॉक्टरों की नई पीढ़ी इस संस्थान को आगे ले जाएगी."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार